हिमाचल प्रदेश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में सेब की खेती को 'लाल सोना' का दर्जा दिया जाता है, लेकिन इस साल मौसम के अनिश्चित और खतरनाक मिजाज ने इस पूरे क्षेत्र को गहरे संकट में डाल दिया है। प्रदेश में करीब 5,500 से 6,000 करोड़ रुपये का सेब कारोबार स्थापित है, जिससे लाखों बागवान परिवारों के अलावा स्थानीय आढ़ती, मजदूर, पैकेजिंग इकाइयां और ट्रांसपोर्टर अपनी आजीविका चलाते हैं। हालांकि, इस वर्तमान सीजन में कभी सूखी सर्दी, कभी बेमौसमी बारिश, अनियंत्रित तापमान, ओलावृष्टि और अतिवृष्टि ने सेब के बागानों को व्यापक स्तर पर नुकसान पहुंचाया है। पिछले साल प्रदेश ने 3 करोड़ से ज्यादा पेटियों का रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन दर्ज किया था, जबकि इस बार कुल उत्पादन घटकर पौने 2 करोड़ पेटियों के आसपास ही सिमट जाने की आशंका जताई जा रही है।
फूल आने से लेकर फल पकने तक मौसम की दोहरी मार
बागवानी विशेषज्ञों और स्थानीय किसानों के अनुसार, सेब की फसल पर छाए इस संकट की शुरुआत सर्दियों के मौसम से ही हो गई थी। सेब के पौधों में स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण फल लगने के लिए जितने जरूरी चिलिंग आवर्स की आवश्यकता होती है, वह कम तापमान न मिलने के कारण पूरे नहीं हो सके। इसके तुरंत बाद जब पेड़ों में फ्लावरिंग यानी फूल आने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब बेमौसमी बारिश और अचानक हुए तापमान में उतार-चढ़ाव ने पंखुड़ियों को भारी नुकसान पहुंचाया। फूल सेट होने और फल बनने के चरण में पहुंचने पर ओलावृष्टि और अतिवृष्टि ने बची-खुची उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इस प्रतिकूल मौसम के कारण बागानों में फफूंद और अन्य बीमारियों का प्रकोप काफी बढ़ गया, जिसके परिणामस्वरूप पेड़ों के पत्ते समय से बहुत पहले ही झड़ने लगे। मुख्य रूप से अल्टरनेरिया और मार्सीलोना जैसी हानिकारक फंगल बीमारियों ने सेब के पेड़ों की उत्पादन क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
आंकड़ों की ज़बानी: मंडियों में आवक में भारी कमी
बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी द्वारा साझा किए गए आंकड़ों से सेब उत्पादन में आई भारी गिरावट का स्पष्ट खाका सामने आता है। पिछले साल इसी समयावधि तक राज्य की विभिन्न फल मंडियों में 82 लाख से अधिक सेब की पेटियां पहुंच चुकी थीं। इसके विपरीत, इस वर्ष 19 अगस्त तक मंडियों में केवल करीब 36 लाख पेटियां ही पहुंच सकी हैं। सीजन की शुरुआत में बागवानी विभाग ने करीब सवा 2 करोड़ पेटियों के उत्पादन का शुरुआती अनुमान लगाया था, लेकिन अब बदलते जमीनी हालातों को देखते हुए इस आंकड़े तक पहुंचना भी नामुमकिन नजर आ रहा है। सामान्य और भरपूर फसल वाले वर्षों में हिमाचल प्रदेश आसानी से 3 करोड़ से अधिक सेब पेटियों का उत्पादन करता है। इस बार उत्पादन घटकर आधे से भी कम रहने की आशंका ने पूरी सप्लाई चेन से जुड़े हितधारकों में भारी बेचैनी पैदा कर दी है।
कीमतें बेहतर, लेकिन बढ़ी लागत ने छीना बागवानों का मुनाफा
उत्पादन में भारी कमी आने की वजह से बाजार में सेब की सीमित आपूर्ति हो रही है, जिससे मंडियों में अच्छी गुणवत्ता वाले सेब की कीमतें तो काफी ऊंची बनी हुई हैं। राजधानी शिमला की प्रमुख फल मंडियों में प्रीमियम क्वालिटी के रॉयल सेब को करीब 3,000 से 3,500 रुपये प्रति पेटी तक के भाव मिल रहे हैं। वहीं, मध्यम दर्जा वाली फसल 2,200 से 2,500 रुपये प्रति पेटी और हल्की क्वालिटी का सेब लगभग 1,500 से 2,000 रुपये प्रति पेटी की दर से बिक रहा है। कई अन्य मंडियों में 1,800 से 3,200 रुपये प्रति पेटी का दायरा भी देखा जा रहा है। इसके बावजूद, बागवानों का साफ तौर पर कहना है कि ऊंची बाजार दरों का कोई वास्तविक आर्थिक लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है। 20 से 22 किलो की एक मानक पेटी तैयार करने में खाद, रासायनिक कीटनाशक, फफूंदनाशक दवाइयों, मजदूर की दिहाड़ी, पैकिंग सामग्री और ढुलाई भाड़े के खर्च इतने अधिक बढ़ चुके हैं कि बढ़ी हुई कीमतें बढ़ी हुई लागत के सामने अपर्याप्त साबित हो रही हैं।
बागवानों की जुबानी: भारी गिरावट की जमीनी हकीकत
शिमला जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले बागवानों के व्यक्तिगत अनुभव इस संकट की गहराई को बयां करते हैं। शिमला के बागवान नरेंद्र ठाकुर ने बताया कि पिछले साल उनके बागीचे से करीब 1,000 पेटियां सेब की निकली थीं, लेकिन इस बार पूरी मशक्कत के बाद केवल 200 पेटियां ही तैयार हो पाई हैं। इसका सीधा मतलब है कि उनके बागीचे के कुल उत्पादन में लगभग 80 फीसदी की सीधी गिरावट दर्ज की गई है। उनका कहना है कि हालांकि बाजार में दाम अच्छे मिल रहे हैं, परंतु कीटनाशक दवाओं, मजदूरी और परिवहन पर हुए भारी खर्च के कारण अंत में उनके हाथ में कोई शुद्ध मुनाफा नहीं बच पा रहा है। इसी प्रकार, एक अन्य बागवान हेम चंद वर्मा के बागीचे में भी पिछले साल की तुलना में इस बार महज 50 फीसदी फसल ही बची है।
लागत निकालने के संघर्ष में जुटी 70 वर्षीया महिला बागवान
फागू क्षेत्र की 70 वर्षीय महिला बागवान अनारकली की कहानी भी हिमाचल के ग्रामीण बागवानों की साझा पीड़ा को दर्शाती है। अनारकली को मंडियों में अपनी फसल के लिए करीब 2,800 रुपये प्रति पेटी तक का भाव तो मिला है, लेकिन उत्पादन पिछले वर्ष के मुकाबले आधा रह जाने से वह बेहद परेशान हैं। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती बागवानी लागतों के कारण अपनी बुनियादी लागत निकालना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस विषम स्थिति से उबरने के लिए उन्होंने मांग उठाई है कि सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करते हुए खाद, कीटनाशक दवाइयों और अन्य कृषि-बागवानी सामग्रियों पर सब्सिडी बढ़ानी चाहिए तथा प्रभावित किसानों को राहत पैकेज प्रदान करना चाहिए।
फल मंडियों में आवक की स्थिति और दागी सेब का संकट
शिमला की भट्टाकुफर फल मंडी के कारोबारियों और आढ़तियों का कहना है कि इस बार पूरा सेब सीजन लगभग आधा रह गया है। मंडियों में सेब की कुल आवक सामान्य से बहुत कम है। हालांकि उच्च श्रेणी के रॉयल सेब की मांग और दाम दोनों बेहतर हैं, परंतु हल्की या औसत क्वालिटी के सेब को उम्मीद के मुताबिक खरीदार नहीं मिल पा रहे हैं। लगातार खराब मौसम, ओलावृष्टि और बेमौसमी बारिश की वजह से सेब की बाहरी त्वचा पर दाग और धब्बे पड़ गए हैं, जिससे बागवानों को विवश होकर दागी और प्रभावित फसल को भी बिकने के लिए बाजार में लाना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, समय से पहले फल टूटने या खराब होने के डर से कुछ इलाकों से हरे और अपरिपक्व सेब भी मंडियों में पहुंचने लगे हैं, जिससे समग्र गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन: सेब अर्थव्यवस्था पर मंडराता दीर्घकालिक खतरा
फल-फूल सब्जी उत्पादक संघ के प्रदेशाध्यक्ष हरीश चौहान के अनुसार, यह संकट किसी एक विशेष मौसम की अस्थायी बारिश या ओलावृष्टि तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में मौसम का चक्र और पैटर्न लगातार अनियमित होता जा रहा है। सर्दियों के समय में पर्याप्त बर्फबारी और ठंड न पड़ना, वसंत ऋतु में अचानक तापमान का बढ़ना, फ्लावरिंग के समय अवांछित बारिश होना और फल पकने की अवस्था में अचानक तेज ओलावृष्टि व अतिवृष्टि होना अब एक आम प्रवृत्ति बनती जा रही है। चिलिंग आवर्स की कमी और प्रतिकूल मौसम के कारण सेब के पेड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट रही है, जिससे बीमारियों का हमला बढ़ जाता है। फंगल संक्रमण और कीटों के प्रकोप को रोकने के लिए बागवानों को बार-बार महंगी स्प्रे दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत कई गुना बढ़ जाती है और उत्पादन घट जाता है। इस प्रकार, बागवान इस समय उत्पादन में गिरावट, बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन के अनिश्चित जोखिम की तिहरी चुनौती से जूझ रहे हैं।





















