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चीफ जस्टिस सूर्यकांत की मौजूदगी पर उपजे विवाद के बीच नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी ने 34वां दीक्षांत समारोह वापस लियाभारत
28 अग॰ 2026, 12:59 pm (2 घंटे पहले)· 5

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की मौजूदगी पर उपजे विवाद के बीच नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी ने 34वां दीक्षांत समारोह वापस लिया

नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी ने 12 सितंबर को होने वाले अपने 34वें वार्षिक दीक्षांत समारोह को रद्द कर दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे अपरिहार्य परिस्थितियां बताया है, जबकि चीफ जस्टिस सूर्यकांत और बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की उपस्थिति को लेकर 165 ग्रेजुएट छात्रों ने आपत्ति जताई थी।

नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) ने 12 सितंबर को आयोजित होने वाले अपने 34वें वार्षिक दीक्षांत समारोह को आधिकारिक रूप से रद्द कर दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने गुरुवार को छात्रों को भेजे गए एक ईमेल में इस फैसले की मुख्य वजह 'अपरिहार्य परिस्थितियों' को बताया है। यह महत्वपूर्ण निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत के चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की प्रस्तावित मौजूदगी को लेकर छात्रों और पूर्व छात्रों के एक समूह ने तीखी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि, दीक्षांत समारोह रद्द होने की घोषणा के तुरंत बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस कार्यक्रम को निरस्त करने का छात्रों के विरोध या इससे जुड़े विवाद से कोई संबंध नहीं है।

दीक्षांत समारोह की समयसीमा और रद्दीकरण की आधिकारिक घोषणा

विश्वविद्यालय द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, संस्थान ने 3 अगस्त को ही छात्रों को सूचित किया था कि 12 सितंबर को 34वां वार्षिक दीक्षांत समारोह आयोजित करने की योजना पर विचार चल रहा है। हालांकि, बाद की परिस्थितियों और प्रशासनिक समीक्षा के बाद विश्वविद्यालय को अपना यह पूर्व निर्धारित कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। गुरुवार को छात्रों को ईमेल के माध्यम से दीक्षांत समारोह रद्द किए जाने की औपचारिक सूचना दी गई। विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि अपरिहार्य कारणों से 12 सितंबर को यह भव्य समारोह आयोजित कर पाना संभव नहीं हो सकेगा, जिसके चलते इस साल दीक्षांत समारोह का पारंपरिक मंच तैयार नहीं हो पाएगा।

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छात्रों के लिए डिग्री प्राप्त करने की प्रक्रिया और उपलब्ध विकल्प

दीक्षांत समारोह रद्द होने के बाद विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि इस निर्णय का असर छात्रों की डिग्री जारी करने की प्रक्रिया पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। इस शैक्षणिक वर्ष में पास होने वाले सभी स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों को उनकी डिग्री और प्रमाणपत्र समय पर प्रदान किए जाएंगे। छात्रों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए एनएलएसआईयू प्रशासन ने डिग्री प्राप्त करने के लिए दो विकल्प उपलब्ध कराए हैं। पहले विकल्प के तहत छात्र एनएलएसआईयू कैंपस जाकर खुद अपने शैक्षणिक दस्तावेज और डिग्री प्राप्त कर सकते हैं। वहीं दूसरे विकल्प के तहत जो छात्र कैंपस आने में असमर्थ हैं, वे कूरियर के माध्यम से अपनी डिग्री सीधे अपने पते पर मंगवा सकते हैं। इस प्रकार समारोह रद्द होने के बावजूद छात्रों को अपनी डिग्री के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

मुख्य न्यायाधीश और बीसीआई अध्यक्ष के निमंत्रण पर छात्र विरोध

दीक्षांत समारोह रद्द किए जाने के साथ ही सीजेआई सूर्यकांत और बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की उपस्थिति से जुड़ा विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस मामले में संस्थान के 165 ग्रेजुएट छात्रों के हस्ताक्षर वाला एक संयुक्त बयान जारी किया गया था, जिसमें दोनों प्रमुख पदाधिकारियों को समारोह में आमंत्रित किए जाने पर सवाल उठाए गए थे। छात्रों ने तर्क दिया था कि इन अधिकारियों के हाथों औपचारिक रूप से डिग्री प्राप्त करना उचित नहीं होगा, इसलिए उन्होंने उनकी प्रस्तावित उपस्थिति पर औपचारिक विरोध जताया था। उल्लेखनीय है कि सीजेआई सूर्यकांत एनएलएसआईयू के पदेन चांसलर हैं और बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा विश्वविद्यालय की जनरल काउंसिल के प्रमुख हैं। एनएलएसआईयू के वार्षिक दीक्षांत समारोह में देश के चीफ जस्टिस की उपस्थिति एक स्थापित परंपरा रही है। इसके अलावा एनएलएसआईयू के छात्रों ने हैदराबाद स्थित नाल्सार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों के उस विरोध का भी समर्थन किया था, जिसमें उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में सीजेआई को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर चिंता जाहिर की थी।

विश्वविद्यालय का रुख, दबाव की खबरों का खंडन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

विवाद की पृष्ठभूमि के बीच एनएलएसआईयू प्रशासन ने पूरी स्थिति पर अपना रुख साफ करते हुए कहा है कि दीक्षांत समारोह रद्द करने का फैसला छात्रों के विरोध या सीजेआई से जुड़े विवाद के कारण नहीं लिया गया है। विश्वविद्यालय के अनुसार यह निर्णय उसकी गवर्निंग बॉडीज, चांसलर और छात्र प्रतिनिधियों के बीच हुई व्यापक चर्चा और सहमति के बाद लिया गया है। संस्थान ने उन मीडिया खबरों का भी सिरे से खंडन किया है जिनमें छात्रों पर बयान वापस लेने का दबाव बनाने की बात कही जा रही थी। एनएलएसआईयू ने स्पष्ट किया कि छात्रों को अपना विरोध पत्र वापस लेने के लिए बाध्य नहीं किया गया और न ही किसी छात्र के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक या दंडात्मक कार्रवाई की गई है। विश्वविद्यालय ने दोहराया कि वह अपने छात्रों की बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का पूरा सम्मान और समर्थन करता है तथा छात्र अपनी राय व्यक्त करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

सवाल-जवाब

एनएलएसआईयू का 34वां दीक्षांत समारोह क्यों रद्द किया गया?
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार दीक्षांत समारोह को अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण रद्द किया गया है।
समारोह रद्द होने के बाद छात्रों को डिग्री कैसे मिलेगी?
छात्र एनएलएसआईयू कैंपस जाकर खुद डिग्री ले सकते हैं या फिर कूरियर के जरिए अपने पते पर मंगवा सकते हैं।
दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में किन अधिकारियों की मौजूदगी पर विवाद था?
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की मौजूदगी पर 165 छात्रों ने सवाल उठाए थे।
क्या विश्वविद्यालय ने विरोध करने वाले छात्रों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की है?
नहीं, एनएलएसआईयू ने स्पष्ट किया है कि किसी भी छात्र पर दबाव नहीं बनाया गया है और न ही कोई दंडात्मक कार्रवाई की गई है।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·51 मिनट पहले

एक प्रतिष्ठित विधि विश्वविद्यालय द्वारा मुख्य न्यायाधीश और बार काउंसिल अध्यक्ष के निमंत्रण पर छात्रों के विरोध के बाद दीक्षांत समारोह रद्द करना न्यायपालिका, बार और अकादमिक जगत के बीच बढ़ते तनाव का गंभीर संकेत है। यद्यपि प्रशासन ने इसे अपरिहार्य कारणों से जोड़ा है, लेकिन इस घटना से यह सवाल जरूर उठता है कि क्या वैचारिक असंतोष और संस्थागत नेतृत्व के बीच संवादहीनता आने वाले समय में कानूनी शिक्षा के परिसरों को और अधिक प्रभावित करेगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·51 मिनट पहले

यह घटना परिसरों में छात्र असंतोष और संस्थागत नेतृत्व के बीच बढ़ते वैचारिक अंतराल को दर्शाती है। यदि शीर्ष संवैधानिक पदों और छात्र निकायों के बीच इस तरह की असहजता सार्वजनिक मंचों पर सामने आती रही, तो यह अकादमिक स्वतंत्रता और विधि परिसरों की स्वायत्तता पर गंभीर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। प्रशासन द्वारा इसे 'अपरिहार्य परिस्थितियों' बताना इस गहरे होते गतिरोध को टालने का एक तात्कालिक प्रयास प्रतीत होता है, लेकिन भविष्य में ऐसे संस्थानों में संवाद की कमी प्रशासनिक और शैक्षणिक दोनों दृष्टियों से चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।

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