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नागपुर से 1800 किलोमीटर दूर चलकर हिमाचल के रेणुका चिड़ियाघर पहुंचा रॉयल बंगाल टाइगर का जोड़ाहिमाचल प्रदेश
21 सित॰ 2026, 8:45 am (2 घंटे पहले)· 3

नागपुर से 1800 किलोमीटर दूर चलकर हिमाचल के रेणुका चिड़ियाघर पहुंचा रॉयल बंगाल टाइगर का जोड़ा

महाराष्ट्र के नागपुर से 43 घंटे का सफर तय कर रॉयल बंगाल टाइगर का एक जोड़ा हिमाचल प्रदेश के सिरमौर स्थित श्री रेणुका जी चिड़ियाघर पहुंच गया है, जिससे एक दशक से खाली पड़े बाड़े में फिर रौनक लौटेगी।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित श्री रेणुका जी चिड़ियाघर में करीब दस वर्षों के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर बड़ी बिल्ली की गूंज सुनाई देगी। महाराष्ट्र के नागपुर स्थित बाला साहेब ठाकरे गोरेवाड़ा अंतरराष्ट्रीय प्राणी उद्यान से रॉयल बंगाल टाइगर के एक नर और मादा जोड़े को अत्यंत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच यहां सुरक्षित पहुंचा दिया गया है। रविवार की शाम जब यह जोड़ा चिड़ियाघर परिसर में दाखिल हुआ, तो वन्यजीव प्रेमियों और वन विभाग के अधिकारियों के चेहरे खिल उठे। लगभग 1800 किलोमीटर लंबे इस सफर को पूरा करने में करीब 43 घंटे का समय लगा। इस दौरान वन्य प्राणी विभाग के विशेषज्ञों और डॉक्टरों की एक विशेष टीम पूरे रास्ते दोनों बाघों की निगरानी और देखभाल करती रही।

हिमाचल के लिए क्यों खास है यह कदम

हिमाचल प्रदेश के इतिहास में यह पहला अवसर है जब राज्य के किसी चिड़ियाघर में रॉयल बंगाल टाइगर को लाया गया है। अरण्यपाल वन्य प्राणी विभाग डॉ शहनबाज अहमद के अनुसार यह पहल राज्य के लिए एक बेहद अहम और महत्वाकांक्षी योजना थी, जो औपचारिकताओं के लंबे दौर के बाद अब धरातल पर उतरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के कड़े नियमों और दिशानिर्देशों के तहत कई जरूरी स्वीकृतियां हासिल की गईं। इस पूरी अंतरराज्यीय स्थानांतरण प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार का भी सहयोग रहा, जिसके बाद वन विभाग की टीम ने नागपुर से इन बाघों को रेणुका झील क्षेत्र तक सुरक्षित पहुंचाया।

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आधुनिक सुविधाओं वाला नया बाड़ा और अस्पताल

बाघ के इस नए जोड़े को प्राकृतिक और आरामदायक माहौल देने के लिए विशेष तैयारियां की गई हैं। चिड़ियाघर प्रबंधन ने इनके लिए 1.67 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक सुविधाओं वाला नया बाड़ा तैयार किया है। इसके साथ ही परिसर में किसी भी आपातकालीन स्थिति और स्वास्थ्य परीक्षण के लिए एक आधुनिक वन्य प्राणी अस्पताल भी स्थापित किया गया है। अधिकारियों को पूरी उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह नर और मादा जोड़ा अनुकूलन के बाद अपनी वंशवृद्धि करेगा, जिससे चिड़ियाघर में इनकी संख्या बढ़ेगी। यह नया आकर्षण क्षेत्र में आने वाले सैलानियों और वन्यजीव उत्साही लोगों के लिए भी एक बड़ा केंद्र बनेगा।

शेरों के कुनबे के खात्मे के बाद वीरान पड़ी थी सफारी

श्री रेणुका जी चिड़ियाघर का यह हिस्सा लंबे समय से खाली पड़ा था। वर्ष 2015 में यहां मौजूद एशियाई शेरों के अंतिम कुनबे के खत्म होने के बाद से लायन सफारी पूरी तरह वीरान हो गई थी। स्थानीय स्तर पर लगातार मांग उठ रही थी कि यहां फिर से शेरों को बसाया जाए। हालांकि, शेरों की अनुपलब्धता के चलते प्रशासन ने अपनी योजना बदली और शेरों की जगह रॉयल बंगाल टाइगर को लाने की कवायद शुरू की। भौगोलिक दृष्टि से हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक रूप से शेरों या बाघों की स्थायी आबादी नहीं पाई जाती है। हालांकि सिरमौर जिले में एक दो बार कैमरों में बाघ की हलचल जरूर दर्ज की गई थी, लेकिन वे उत्तराखंड के वन्य क्षेत्रों से सीमा पार कर हिमाचल की सीमा में दाखिल हुए थे। ऐसे में इस चिड़ियाघर में बाघों की मौजूदगी राज्य के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ती है।

सवाल-जवाब

रॉयल बंगाल टाइगर के जोड़े को किस चिड़ियाघर में लाया गया है?
इस जोड़े को हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित श्री रेणुका जी चिड़ियाघर में लाया गया है।
इन बाघों को कहां से लाया गया है और इन्होंने कितनी दूरी तय की?
इन्हें महाराष्ट्र के नागपुर स्थित बाला साहेब ठाकरे गोरेवाड़ा अंतरराष्ट्रीय प्राणी उद्यान से लाया गया है और इन्होंने लगभग 1800 किलोमीटर का सफर तय किया।
नागपुर से हिमाचल तक का सफर पूरा करने में कितना समय लगा?
इस सड़क यात्रा को पूरा करने में लगभग 43 घंटे का समय लगा, जिसमें वन्य प्राणी विभाग की विशेष टीम लगातार साथ रही।
बाघों के बाड़े और अस्पताल पर कितना खर्च किया गया है?
बाघों के लिए आधुनिक सुविधाओं से युक्त बाड़ा तैयार करने पर 1.67 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं और साथ ही एक वन्य प्राणी अस्पताल भी बनाया गया है।
रेणुका चिड़ियाघर में बड़ी बिल्लियों का बाड़ा कब से खाली था?
वर्ष 2015 में एशियाई शेरों का कुनबा खत्म होने के बाद से यह सफारी क्षेत्र करीब दस साल से वीरान पड़ा था।
क्या हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक रूप से बाघ या शेर पाए जाते हैं?
हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक तौर पर शेर या बाघ नहीं होते हैं, हालांकि सिरमौर में एक-दो बार उत्तराखंड की सीमा से दाखिल हुए बाघ कैमरों में दर्ज हुए हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Tanvi Desai@tanvi-desai·29 मिनट पहले

यह अंतरराज्यीय वन्यजीव स्थानांतरण पारिस्थितिक पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण के बीच एक बड़ा संतुलन है। सिरमौर के रेणुका चिड़ियाघर में अत्याधुनिक बाड़े और अस्पताल के निर्माण से न केवल इस जोड़े को सुरक्षित और प्राकृतिक माहौल मिलेगा, बल्कि हिमाचल प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र को भी एक नया आयाम और वैश्विक पहचान हासिल होगी।

Ravikash Gupta@ravikash·51 मिनट पहले

यह अंतरराज्यीय पशु स्थानांतरण केवल एक चिड़ियाघर की रौनक लौटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिमाचल प्रदेश में इको-टूरिज्म और आतिथ्य क्षेत्र के लिए एक मजबूत आर्थिक उत्प्रेरक साबित होगा। 1.67 करोड़ रुपये के पूंजीगत व्यय और आधुनिक चिकित्सा बुनियादी ढांचे के साथ, यह परियोजना क्षेत्रीय पर्यटन को बढ़ावा देगी और वन्यजीव संरक्षण के बुनियादी ढांचे में दीर्घकालिक निवेश को आकर्षित करेगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·51 मिनट पहले

यह रणनीतिक कदम पहाड़ी राज्य में वन्यजीव प्रबंधन के वित्तीय और पारिस्थितिकी संतुलन को एक नई दिशा देगा। 1.67 करोड़ रुपये के निवेश से तैयार आधुनिक बुनियादी ढांचा और पशु चिकित्सा सुविधा न केवल इस दुर्लभ अंतरराज्यीय स्थानांतरण को सफल बनाएंगे, बल्कि सिरमौर क्षेत्र में सतत पर्यटन और आतिथ्य उद्योग के लिए दीर्घकालिक आर्थिक अवसर भी सृजित करेंगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

अपराध और वन्यजीव संरक्षण मामलों की जाँच के दृष्टिकोण से, 1800 किलोमीटर लंबे और 43 घंटे के इस अंतरराज्यीय परिवहन के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल और कानूनी अनुपालन की निगरानी अत्यंत महत्वपूर्ण थी। केंद्रीय दिशानिर्देशों के तहत दो राज्यों के वन विभागों और पशुचिकित्सा विशेषज्ञों का समन्वय यह सुनिश्चित करता है कि वन्यजीवों की तस्करी या अवैध व्यापार पर लगाम कसने के लिए कड़े प्रशासनिक और विधिक ढांचे का पालन किया जा रहा है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

1800 किलोमीटर के इस सफल अंतरराज्यीय परिवहन ने दो राज्यों के वन विभागों के बीच प्रशासनिक समन्वय का एक मजबूत उदाहरण पेश किया है। हालांकि, नागपुर से हिमाचल लाए गए इस जोड़े के सफल अनुकूलन और वंशवृद्धि के लिए स्थानीय स्तर पर पर्यटकों की भीड़ को नियंत्रित करना और विशेष वेटरनरी निगरानी को दीर्घकालिक रूप से बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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