अंतरराष्ट्रीय और घरेलू रत्न बाजार में प्राकृतिक हीरों के भाव में तेज गिरावट दर्ज की गई है। पिछले चार वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो हीरों की कीमतों में 52 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट आ चुकी है। इस भारी मंदी ने दशकों से प्रचारित उस धारणा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके तहत हीरों को अनमोल और सदाबहार निवेश माना जाता रहा था।
विज्ञापनों की बुनावट और असली बाजार मूल्य
दशकों पहले डी बीयर्स कंपनी ने प्रसिद्ध प्रचार वाक्य गढ़ा था कि हीरा हमेशा के लिए होता है। इस विज्ञापन अभियान ने आम लोगों के मन में यह बात गहरे से बैठा दी थी कि हीरा अत्यंत दुर्लभ और बहुमूल्य रत्न है। इसी रणनीति के दम पर दुनिया भर में सगाई और वैवाहिक रस्मों में हीरे की अंगूठी देना एक अनिवार्य परंपरा जैसा बना दिया गया था।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि हीरे की इतनी ऊंची कीमत उसकी स्वाभाविक कमी से ज्यादा नियंत्रित आपूर्ति और आक्रामक विज्ञापनों का नतीजा थी। जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक चुनौतियां बढ़ीं और मांग में बदलाव आया, तो इस नियंत्रित बाजार की कमजोरियां सतह पर आ गईं। चार साल के भीतर कीमतों का आधा से भी कम रह जाना यह दर्शाता है कि उसका बाजार मूल्य विज्ञापनों द्वारा बनाई गई छवि से काफी अलग था।
लैब में बने हीरों का बढ़ता प्रभाव
हीरा उद्योग में आई इस ऐतिहासिक गिरावट की एक बड़ी वजह प्रयोगशाला में तैयार होने वाले सिंथेटिक हीरों का तेजी से बढ़ता चलन है। लैब निर्मित हीरे रासायनिक और भौतिक रूप से प्राकृतिक हीरों जैसे ही होते हैं, लेकिन इनकी उत्पादन लागत बेहद कम होती है।
सगाई के मौसम में युवा खरीदार अब प्राकृतिक हीरों के मुकाबले लैब निर्मित हीरों को प्राथमिकता दे रहे हैं। समान बजट में ग्राहकों को बड़े आकार और बेहतर स्पष्टता वाली अंगूठियां मिल रही हैं। इससे पारंपरिक खनन वाले हीरों की मांग तेजी से घटी है, जिसका सीधा असर उनकी कीमतों पर पड़ा है।
उद्योग के सामने आगे की राह
लगातार घटती कीमतों के कारण रत्न तराशने और निर्यात करने वाली कंपनियों के मुनाफे पर भारी दबाव बना हुआ है। अब उद्योग के कारोबारी और विश्लेषक यह स्वीकार करने लगे हैं कि आने वाले समय में प्राकृतिक हीरों का बाजार पहले जैसा एकाधिकार वाला नहीं रहेगा, बल्कि इसे आधुनिक तकनीक से बने सस्ते विकल्पों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी।



















