लोकसभा या विधानसभा चुनावों की सामान्य व्यवस्था में जिस प्रत्याशी के खाते में सबसे ज्यादा वोट दर्ज होते हैं, वही जीत का सेहरा बांधता है। इस चुनावी व्यवस्था को आम बोलचाल में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली कहा जाता है। इसके विपरीत, राज्यों की विधान परिषद यानी एमएलसी सीटों पर होने वाले मतदान की प्रक्रिया पूरी तरह अलग ढांचे पर संचालित होती है। यहां पहले दौर की गिनती में सबसे अधिक मत हासिल करने वाला चेहरा भी अंतिम परिणाम में शिकस्त खा सकता है। इस प्रणाली को सिंगल ट्रांसफरेबल वोट यानी एकल संक्रमणीय मत व्यवस्था के नाम से जाना जाता है।
इस जटिल दिखने वाली व्यवस्था में जीत केवल किसी एक प्रत्याशी को मिले शुरुआती मतों पर टिकी नहीं होती, बल्कि मतपत्रों पर मतदाताओं द्वारा अंकित की जाने वाली प्राथमिकताओं और एक तय जीत कोटे पर निर्भर करती है। आइए, इस पूरी चुनावी प्रक्रिया, कोटे की गणना, मतों के ट्रांसफर और मतपत्रों के निरस्त होने के नियमों को विस्तार से समझते हैं।
वरीयता मतदान क्या है और यह सामान्य वोट से कैसे अलग है
संसदीय और विधानसभा चुनावों में मतदाता इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के सामने जाकर अपनी पसंद के एक प्रत्याशी के चुनाव चिह्न के आगे का बटन दबाते हैं। वहां मतदाता को केवल एक ही उम्मीदवार का चयन करने का अधिकार होता है। दूसरी ओर, विधान परिषद के चुनावों में यह प्रक्रिया मतपत्र यानी बैलेट पेपर के जरिए पूरी की जाती है।
बैलेट पेपर पर मतदान करते समय वोटर को केवल किसी एक चेहरे पर मुहर नहीं लगानी होती, बल्कि चुनाव मैदान में उतरे सभी प्रत्याशियों के नाम के सामने अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होती हैं। मतदाता को मतपत्र पर कलम से वरीयता क्रम दर्ज करना होता है, जिसमें पहली पसंद के आगे 1, दूसरी पसंद के आगे 2 और तीसरी पसंद के आगे 3 लिखा जाता है। मतदाता चाहे तो मैदान में मौजूद सभी प्रत्याशियों के लिए अपनी पसंद का क्रम संख्या के रूप में दर्ज कर सकता है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य मतदाता के वोट को बेकार जाने से बचाना और सदन में व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होता है।
जीत के लिए अनिवार्य जादुई कोटा कैसे तय किया जाता है
एमएलसी चुनाव में विजय घोषित होने के लिए केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे रहना काफी नहीं होता, बल्कि एक निश्चित न्यूनतम मत सीमा यानी जादुई कोटे को छूना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। यह कोटा वोटों की गिनती शुरू होने के तुरंत बाद कुल पड़े वैध मतों के आधार पर निकाला जाता है।
यदि किसी एक सीट के लिए मतदान कराया गया है, तो कोटे की गणना के लिए कुल वैध मतों की संख्या में सीटों की संख्या में एक जोड़कर भाग दिया जाता है और फिर प्राप्त भागफल में एक जोड़ दिया जाता है। इसे एक सटीक आंकड़े से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी सीट पर पड़े कुल वैध वोटों की संख्या 1,00,000 है और चुनाव केवल 1 सीट के लिए हो रहा है। ऐसे में 1,00,000 को 2 से विभाजित किया जाएगा, जिससे संख्या 50,000 आएगी। अब इस संख्या में 1 जोड़ दिया जाएगा, जिससे जीत का कोटा 50,001 मत निर्धारित होगा। जो भी प्रत्याशी गिनती के दौरान सबसे पहले 50,001 वैध मतों का आंकड़ा छू लेगा, निर्वाचन अधिकारी द्वारा उसे ही विजेता घोषित किया जाएगा।
पहली पसंद में शीर्ष पर रहकर भी उम्मीदवार क्यों पिछड़ जाता है
इस व्यवस्था की सबसे दिलचस्प बात यह है कि पहली वरीयता में सबसे बड़ा आंकड़ा पाने वाला प्रत्याशी भी अंतिम चरण में पराजित हो सकता है। इसे समझने के लिए तीन प्रत्याशियों ए, बी और सी की स्थिति का आकलन करते हैं, जहां जीत के लिए अनिवार्य कोटा 50,001 मत तय किया गया है।
मान लीजिए पहले चक्र की गिनती में पहली पसंद के मत इस प्रकार सामने आते हैं
- प्रत्याशी ए को पहली पसंद के कुल 45,000 वोट मिलते हैं।
- प्रत्याशी बी को पहली पसंद के कुल 35,000 वोट हासिल होते हैं।
- प्रत्याशी सी को पहली पसंद के कुल 20,000 वोट प्राप्त होते हैं।
इस शुरुआती दौर में प्रत्याशी ए 45,000 मतों के साथ स्पष्ट रूप से पहले पायदान पर खड़ा दिखाई देता है, जबकि प्रत्याशी बी उससे पूरे 10,000 वोट पीछे है। हालांकि, प्रत्याशी ए के पास सर्वाधिक वोट होने के बावजूद वह जीत के लिए आवश्यक 50,001 के जादुई कोटे से 5,001 वोट दूर रह जाता है। चूंकि पहले दौर में कोई भी प्रत्याशी इस निर्धारित सीमा को पार नहीं कर पाता, इसलिए पहले चक्र में किसी को भी विजेता घोषित नहीं किया जा सकता। यहीं से चुनाव का दूसरा और सबसे निर्णायक चरण शुरू होता है।
वोट ट्रांसफर होने की प्रक्रिया और पासा पलटने का गणित
जब पहली प्राथमिकता की गिनती में कोई भी उम्मीदवार जीत के कोटे तक नहीं पहुंच पाता, तो सबसे कम वोट हासिल करने वाले प्रत्याशी को मुकाबले से बाहर कर दिया जाता है। ऊपर दिए गए उदाहरण में प्रत्याशी सी को सबसे कम यानी 20,000 वोट मिले हैं, इसलिए उसे चुनाव की दौड़ से बाहर कर दिया जाएगा।
इसके बाद प्रत्याशी सी को मिले उन सभी 20,000 मतपत्रों की दोबारा बारीकी से जांच की जाती है। इस जांच में देखा जाता है कि जिन मतदाताओं ने प्रत्याशी सी को अपनी पहली पसंद माना था, उन्होंने अपने मतपत्र पर दूसरी वरीयता यानी अंक 2 किस प्रत्याशी के नाम के सामने दर्ज किया है। यदि इन 20,000 मतपत्रों में से 16,000 मतदाताओं ने अपनी दूसरी पसंद प्रत्याशी बी को दी हो और केवल 4,000 मतदाताओं ने दूसरी पसंद प्रत्याशी ए को दी हो, तो ये मत दोनों प्रत्याशियों के मूल मतों में जोड़ दिए जाएंगे।
इस ट्रांसफर के बाद अंतिम परिणाम का समीकरण पूरी तरह उलट जाता है। प्रत्याशी बी के शुरुआती 35,000 मतों में दूसरी वरीयता के 16,000 मत जुड़ने से उसका कुल योग 51,000 हो जाता है। प्रत्याशी बी 50,001 के जादुई कोटे को पार कर जाता है और उसे तुरंत विजयी घोषित कर दिया जाता है। दूसरी तरफ, शुरुआती दौर में सबसे आगे चल रहे प्रत्याशी ए के 45,000 वोटों में केवल 4,000 मत जुड़ते हैं, जिससे उसका कुल योग 49,000 पर ही सिमट जाता है और वह चुनाव हार जाता है। इस प्रकार दूसरी वरीयता के मतों का ध्रुवीकरण पूरे चुनाव का रुख बदल देता है।
शिक्षित मतदाताओं के बावजूद वोट अवैध होने के प्रमुख कारण
विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान करने वाले सभी नागरिक शिक्षित और बौद्धिक वर्ग से आते हैं। इसके बावजूद हर चुनाव में गिनती के दौरान बड़ी तादाद में मतपत्र अवैध घोषित होकर रद्द हो जाते हैं। निर्वाचन आयोग के सख्त दिशा-निर्देशों के कारण छोटी सी भूल भी वोट को बेकार कर देती है। मतपत्र खारिज होने की मुख्य वजहें इस प्रकार हैं
- निर्वाचन आयोग द्वारा पोलिंग बूथ पर दिए जाने वाले विशेष बैंगनी पेन की जगह मतदाता द्वारा अपनी निजी कलम या पेंसिल का उपयोग कर देना।
- मतपत्र पर वरीयता अंक 1, 2, 3 साफ-साफ न लिखना अथवा अंकों पर ओवरराइटिंग करना।
- एक से अधिक उम्मीदवारों के नाम के आगे पहली पसंद यानी अंक 1 लिख देना।
- अंकों के बजाय शब्दों में एक, दो या रोमन अंकों जैसे I, II का प्रयोग कर देना।

















