गर्मियों में चलने वाली लू और अत्यधिक तापमान कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देते हैं, लेकिन मानसिक विकारों से पीड़ित लोगों पर इसका असर कहीं ज्यादा जानलेवा साबित हो रहा है। हाल के अध्ययनों और चिकित्सा अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ है कि अत्यधिक गर्मी के दिनों में सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित व्यक्तियों की जान जाने की संभावना किसी भी अन्य गंभीर पुरानी बीमारी की तुलना में बहुत अधिक बढ़ जाती है। कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया और मॉन्ट्रियल में दर्ज किए गए आंकड़े बताते हैं कि तापमान का अत्यधिक बढ़ना किस तरह इस विशेष समूह के लिए एक मूक आपदा बन जाता है।
तापमान नियमन में जैविक समस्याएं
मानव शरीर अत्यधिक तापमान का सामना पसीने और रक्त परिसंचरण के माध्यम से करता है। सामान्य तौर पर जब बाहरी वातावरण गर्म होता है, तो मस्तिष्क रक्त वाहिकाओं को फैलाने और पसीना निकालने का संकेत देता है ताकि शरीर ठंडा रह सके। सिज़ोफ्रेनिया से जूझ रहे व्यक्तियों में यह आंतरिक व्यवस्था सुचारू रूप से काम नहीं करती। डोपामाइन का असंतुलन, जो इस बीमारी की मुख्य जैविक पहचान है, शरीर की तापमान नियंत्रित करने की प्राकृतिक क्षमता को कमजोर कर देता है। इसके चलते जब पारा ऊपर चढ़ता है, तो इनका शरीर खुद को ठंडा रखने में विफल हो जाता है।
इसके अलावा तंत्रिका तंत्र का असंतुलन इस संकट को और गंभीर बना देता है। जब व्यक्ति भ्रम या मतिभ्रम की स्थिति से गुजरता है, तो उसका शरीर लगातार आपातकालीन तनाव की स्थिति में रहता है। यह तनाव हृदय प्रणाली पर सीधा दबाव डालता है। अत्यधिक तापमान के दौरान होने वाली अधिकांश मौतों का प्राथमिक कारण हृदय संबंधी विफलता ही होता है। जब किसी व्यक्ति का परिसंचरण तंत्र गर्मी के तनाव को संभालने में अक्षम हो, तो उसके जीवित रहने की संभावना बेहद घट जाती है।
दवाओं का प्रतिकूल प्रभाव
सिज़ोफ्रेनिया के लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए दी जाने वाली एंटीसाइकोटिक दवाएं भी शरीर की गर्मी सहन करने की क्षमता पर असर डालती हैं। इन दवाओं के कई ऐसे दुष्प्रभाव होते हैं जो पसीना आने की प्रक्रिया को धीमा या पूरी तरह बंद कर देते हैं। जब पसीना नहीं निकलता, तो शरीर के भीतर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और आंतरिक अंगों का तापमान खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। डॉक्टरों का मानना है कि इन दवाओं के एंटीकोलिनर्जिक प्रभाव हृदय गति को भी तेज कर देते हैं, जिससे व्यक्ति को हीट स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन खतरों के बावजूद अचानक दवाएं बंद करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है, इसलिए चिकित्सीय सलाह के बिना ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए।
सामाजिक अलगाव और चेतावनी से दूरी
सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों की सुरक्षा केवल जैविक कारकों पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि उनके सामाजिक हालात भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। कई मरीज अत्यधिक वहम या मानसिक तनाव के कारण टीवी, रेडियो या इंटरनेट जैसे संचार माध्यमों से पूरी तरह दूर रहते हैं, जिससे उन्हें आने वाली लू या मौसम की चेतावनी की भनक तक नहीं लग पाती। इसके अतिरिक्त, इस बीमारी के लक्षणों के चलते व्यक्ति कई बार यह समझ ही नहीं पाता कि उसका शरीर गर्म हो रहा है या उसे पानी पीने की जरूरत है। कई मामलों में लोग तेज गर्मी में भी कई परतों वाले भारी कपड़े पहने रहते हैं, जिससे संकट और गहरा हो जाता है।
गरीबी और कमजोर आवासीय स्थिति भी इस जोखिम को बढ़ाती है। कई मरीज ऐसे पुराने और छोटे कमरों में रहते हैं जहां पंखे या एयर कंडीशनर जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। जब दिन ढलने के बाद भी कमरा तपता रहता है, तो शरीर को आराम नहीं मिल पाता। कई शहरों में सार्वजनिक रूप से कूलिंग सेंटर बनाए जाते हैं, लेकिन समाज में फैली भ्रांतियों और अकेलेपन के डर से ये मरीज वहां जाने से कतराते हैं। उन्हें लगता है कि लोग उनके साथ अनुचित व्यवहार करेंगे, जिसके कारण वे अपने तंग कमरों में ही बंद रहने का जोखिम उठा लेते हैं।
रोकथाम और सुरक्षा के उपाय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए बहुस्तरीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है। केवल मौसम की चेतावनी जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन लोगों तक सीधे पहुंचना जरूरी है जो समाज की मुख्यधारा से कटे हुए हैं। ब्रिटिश कोलंबिया में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को विस्तार दिया गया है और जरूरतमंद परिवारों को एयर कंडीशनर उपलब्ध कराने की योजनाएं शुरू की गई हैं। देखभाल करने वालों को यह सिखाया जा रहा है कि गर्मी के दिनों में नियमित रूप से मरीजों का हालचाल लें और यह सुनिश्चित करें कि वे पर्याप्त पानी पी रहे हैं।
सामुदायिक स्तर पर कूलिंग सेंटरों में ऐसे कर्मियों की तैनाती बेहद कारगर साबित हुई है जो मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति को समझते हैं और संवेदनशील तरीके से लोगों का स्वागत करते हैं। यदि समय रहते मरीज को ठंडा पानी, ठंडे कपड़े और सुरक्षित माहौल मिल जाए, तो उसकी जान बचाई जा सकती है। सिज़ोफ्रेनिया के मरीजों को गर्मी से बचाना केवल चिकित्सा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक जिम्मेदारी भी है जिसमें संवेदनशीलता और सीधी सहायता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।


















