खरीफ सत्र में मॉनसून की बेरुखी और सूखे के असर से देश में चावल की कुल पैदावार में पिछले 17 वर्षों की सबसे भारी गिरावट दर्ज होने का अनुमान जताया गया है। चालू वर्ष में धान का उत्पादन बीते वर्ष के मुकाबले 1 करोड़ टन कम रहने का आकलन है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में चावल उत्पादन में 10.1 फीसदी की भारी कमी देखी गई थी, जिसके चलते खुले बाजार में कीमतें 20 फीसदी तक उछल गई थीं। हालांकि केंद्र सरकार के गोदामों में तय सीमा से लगभग छह गुना अधिक अनाज जमा है, फिर भी मंडियों और खुदरा दुकानों पर रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली गैर-बासमती और प्रीमियम किस्मों के भाव तेजी से चढ़ने लगे हैं।
उत्पादन आंकड़ों में 10 साल बाद पहला संकुचन
कृषि विशेषज्ञों और आधिकारिक आकलनों के मुताबिक वर्ष 2026 में देश का कुल चावल उत्पादन 14.4 करोड़ टन रहने की संभावना है। यह आंकड़ा वर्ष 2025 में दर्ज 15.4 करोड़ टन उत्पादन से लगभग 6.5 फीसदी कम है। पिछले एक दशक में यह पहला मौका होगा जब देश में धान की कुल पैदावार में सीधे तौर पर कमी आ रही है। चूंकि खेतों में फसलों की कटाई का दौर अभी जारी है, इसलिए यह अंतिम आंकड़ा न होकर प्राथमिक अनुमान माना जा रहा है।
उत्पादन घटने के पीछे ये चार बड़े कारण
चावल की पैदावार में इस तेज गिरावट के पीछे मौसम और सिंचाई से जुड़े कई गंभीर कारक जिम्मेदार माने जा रहे हैं
1. मुख्य उत्पादक राज्यों में 40 फीसदी तक कम वर्षा: धान की फसल को भरपूर पानी की आवश्यकता होती है। जुलाई तक मध्य प्रशांत महासागर में अल नीनो की परिस्थितियां बन गई थीं, जिसका सीधा असर 1 जून से शुरू हुए चार महीने के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर पड़ा। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जून से सितंबर के दौरान पूरे देश में सामान्य से 12 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। वहीं पंजाब, बिहार, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी 40 फीसदी तक पहुंच गई। ये सातों राज्य मिलकर देश के कुल चावल उत्पादन में 45 फीसदी का योगदान देते हैं।
2. धान के बुवाई रकबे में 3.6 फीसदी की कमी: देश की कुल कृषि उपज में खरीफ फसलों की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 25 सितंबर तक खरीफ धान का कुल रकबा 4.31 करोड़ हेक्टेयर दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष के 4.47 करोड़ हेक्टेयर की तुलना में 3.6 फीसदी कम है।
3. दाना पकने के समय सूखे की मार: जब खेतों में धान की बालियां पकने और दाना बनने की अवस्था में थीं, उस वक्त बारिश सामान्य से काफी कम रही। राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.वी. कृष्ण राव के अनुसार, हालिया हफ्तों में लंबे समय तक चले सूखे दौर ने दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में प्रति हेक्टेयर उपज की संभावनाओं को बड़ा झटका दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि केवल बुवाई का क्षेत्रफल ही नहीं घटा, बल्कि प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में भी कमी आने की पूरी आशंका है।
4. जलाशयों का खाली रहना और रबी पर खतरा: कृषि व्यापार कंपनी ओलम एग्री इंडिया के डिप्टी कंट्री हेड नितिन गुप्ता के मुताबिक, जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे रहने के कारण सर्दियों में बोए जाने वाले रबी धान के रकबे और उत्पादन में भी गिरावट आने की आशंका है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 24 सितंबर को देश के 178 प्रमुख जलाशयों में जलस्तर 70.8 फीसदी था, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 89.7 फीसदी भरा हुआ था।
बाजार में क्या दिख रहा है असर
यद्यपि वर्तमान समय में अनाज मंडियों में चावल की आपूर्ति सामान्य बनी हुई है, परंतु पैदावार कम होने की आशंकाओं के कारण कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, चावल के खुदरा भाव पिछले वर्ष की तुलना में 7 फीसदी तक चढ़ चुके हैं। 27 सितंबर को चावल की औसत कीमत 45.77 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई।
प्रीमियम गैर-बासमती चावल की दरों में भी बड़ा उछाल आया है। दक्षिण भारत में लोकप्रिय सोना मसूरी की कीमत 25 फीसदी बढ़कर 58 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई है, जबकि पूर्वी राज्यों में व्यापक तौर पर खाया जाने वाला स्वर्ण चावल 10 फीसदी महंगा होकर 35 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा है। वहीं मंडियों में बासमती धान की नई आवक शुरू हो चुकी है, जिसका वर्तमान भाव पिछले साल से 30 फीसदी अधिक यानी 4,000 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है।
भारत वैश्विक स्तर पर चावल उत्पादन में 28 फीसदी और निर्यात में 45 फीसदी हिस्सेदारी रखता है, जिससे यह दुनिया का शीर्ष निर्यातक देश है। भारत के बाद सबसे बड़े निर्यातक देश थाईलैंड और वियतनाम में भी कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं। ऐसे में भारत में उपज घटने और दाम बढ़ने का असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है, जो ईरान युद्ध के चलते पहले से ही तनाव में है। बी.वी. कृष्ण राव बताते हैं कि जब किसानों को खुले बाजार में बेहतर किस्मों के ऊंचे दाम मिलेंगे, तो वे सरकारी खरीद केंद्रों पर कम अनाज बेचेंगे, जिसका सीधा असर सरकारी खरीद पर पड़ेगा।
गोदामों में छह गुना भंडार, फिर भी चिंता क्यों?
कम पैदावार का तात्पर्य यह कतई नहीं है कि देश में तत्काल कोई गहरा खाद्यान्न संकट आ जाएगा, क्योंकि केंद्रीय गोदामों में लगभग 6 करोड़ टन का बफर स्टॉक मौजूद है। सरकार हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर किसानों से धान खरीदती है, जो वर्ष 2026-27 के लिए 2,441 रुपये प्रति क्विंटल तय है। खरीदा गया धान भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में रखा जाता है, जहां से इसे घरेलू उपभोग, एथेनॉल निर्माण, निर्यात और अन्य जरूरतों के लिए आवंटित किया जाता है।
सरकार का लक्ष्य 1 अक्टूबर 2026 तक 1.03 करोड़ टन का आरक्षित स्टॉक बनाए रखने का था, जबकि 1 सितंबर 2026 तक धान का वास्तविक स्टॉक 5.96 करोड़ टन दर्ज किया गया, जो अनिवार्य जरूरत से लगभग छह गुना ज्यादा है। इतना बड़ा भंडार इसलिए एकत्र हुआ क्योंकि जुलाई 2023 से अक्टूबर 2024 के बीच सरकार ने बासमती को छोड़कर अन्य सभी किस्मों के निर्यात पर रोक लगा दी थी, क्योंकि उस दौरान घरेलू कीमतें 11 फीसदी बढ़ चुकी थीं। इस निर्यात प्रतिबंध से गोदामों में स्टॉक बढ़ता चला गया।
इतने विशाल भंडार के बावजूद विशेषज्ञों और उद्योग जगत में चिंता के तीन प्रमुख कारण हैं
1. पूरा भंडार तत्काल खाने योग्य चावल नहीं: केंद्रीय भंडार के 6 करोड़ टन स्टॉक में से एक बड़ा हिस्सा बिना पिसा हुआ धान है। यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर की भारत रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 तक सरकारी स्टॉक में लगभग 3.5 करोड़ टन कच्चा धान था। इसे मिलों में भेजकर खाने योग्य चावल में बदलने में अतिरिक्त समय लगता है। इसके अलावा गोदामों में बासमती, सामान्य सफेद चावल के साथ-साथ मोटा और टूटा हुआ चावल भी शामिल है, जबकि आम घरों में दैनिक भोजन के लिए चुनिंदा किस्मों का ही उपयोग किया जाता है।
2. एथेनॉल उत्पादन में भारी खपत: पेट्रोल में मिश्रण के लिए बनाए जाने वाले एथेनॉल में एफसीआई के चावल की बड़ी मात्रा खपाई जा रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, एथेनॉल निर्माण में 24.64 फीसदी चावल एफसीआई के स्टॉक से आता है। वर्ष 2024-25 में इसके लिए करीब 50 लाख टन चावल आवंटित किया गया था। वहीं 2025-26 में 72 लाख टन चावल आरक्षित रखा गया, जिसमें से जून 2025 से जून 2026 के बीच डिस्टिलरी कंपनियों को 63.5 लाख टन चावल की आपूर्ति की जा चुकी है।
3. सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लिए कोटा: गोदामों में रखे अनाज को सीधे खुले बाजार में आम जनता को नहीं बेचा जा सकता। इसका एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और मुफ्त राशन योजनाओं के लिए सुरक्षित रहता है। नियमों के तहत पीडीएस और आपातकालीन जरूरतों का कोटा अलग रखने के बाद जो अधिशेष बचता है, केवल वही खुले बाजार में उतारा जा सकता है।
पोल्ट्री और सहयोगी उद्योगों पर भी असर
बारिश की कमी का प्रभाव केवल खरीफ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रबी बुवाई पर भी इसके असर से आगामी वर्ष के स्टॉक पर दबाव बन सकता है। इसके अतिरिक्त, टूटे हुए चावल पर निर्भर सहयोगी उद्योगों पर संकट गहराने लगा है। उदाहरण के लिए पोल्ट्री उद्योग में मुर्गियों के आहार पर कुल खर्च का लगभग 70 फीसदी खर्च होता है, जिसमें मुख्य घटक टूटा हुआ चावल होता है। पंजाब के प्रमुख बासमती निर्यातक जैसन ग्रेंस के सीएमडी रणजीत सिंह जैसन का कहना है कि अक्टूबर के पहले हफ्ते तक उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की मंडियों में चावल की आवक बढ़ जाएगी। इससे बासमती की कीमतों में नरमी आने की उम्मीद है, जिसके बाद ही बाजार की सटीक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।



















