उत्तर प्रदेश के कानपुर में कारोबारी विनीत मिनाचा की उनके ही घर के भीतर हुई हत्या की गुत्थी जब सुलझी, तो पारिवारिक रिश्तों और संपत्ति के लालच का एक बेहद खौफनाक चेहरा सामने आया। शुरुआत में इस मामले में पुलिस ने विनीत मिनाचा की बहू शालू और दो कथित भाड़े के हत्यारों को गिरफ्तार किया था। पकड़े गए बदमाशों ने पहले पुलिस से यही कहा था कि शालू ने उन्हें सुपारी देकर हत्या कराई थी। इसके बाद शालू को जेल भेज दिया गया और लगभग तीन हफ्ते तक उसका मायका पक्ष लगातार यही गुहार लगाता रहा कि शालू निर्दोष है और उसे इस हत्याकांड में झूठा फंसाया जा रहा है। मामले की तहकीकात जब आगे बढ़ी, तो जांच अधिकारियों ने खुलासा किया कि इस पूरे हत्याकांड का मुख्य सूत्रधार शालू नहीं, बल्कि उसका पति और मृतक विनीत मिनाचा का सगा बेटा सुब्रत था।
जांच में सामने आए तथ्यों के अनुसार सुब्रत ने खुद हत्यारों को सुपारी दी थी और उन्हें सख्त हिदायत दी थी कि यदि वे कभी पुलिस के हत्थे चढ़ जाएं, तो शालू का नाम ले लें ताकि वह बच निकले। पुलिस के मुताबिक सुब्रत को यह गहरा डर सता रहा था कि उसके पिता किसी अन्य महिला के साथ रहने लगेंगे और अपनी पूरी संपत्ति उस महिला के नाम लिख देंगे। इसी संपत्ति छिन जाने के खौफ ने एक बेटे को अपने ही पिता की जान लेने की खूनी साजिश रचने पर मजबूर कर दिया। कानपुर के इस दिल दहला देने वाले मामले ने न केवल समाज को झकझोरा है, बल्कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सवाल भी खड़ा कर दिया है। क्या किसी पिता की संपत्ति पर उसकी संतान का जन्मसिद्ध अधिकार होता है, क्या एक पिता जीवित रहते अपनी जायदाद किसी गैर व्यक्ति या महिला के नाम कर सकता है, और क्या पिता की हत्या करके कोई बेटा उसकी संपत्ति हड़प सकता है।
पिता की हत्या के बाद बेटे को संपत्ति मिलने का कानूनी सच
अपराध की दुनिया में अक्सर यह गलतफहमी देखने को मिलती है कि रास्ते से हटा देने के बाद संपत्ति पर कब्जा मिल जाएगा, जबकि देश का कानून इस मामले में पूरी तरह विपरीत और बेहद कठोर रुख अपनाता है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर के अधिवक्ता सचिन नायक के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो किसी की हत्या करता है या हत्या की साजिश अथवा अपराध में सहायता करता है, वह मृतक की संपत्ति के उत्तराधिकार से पूरी तरह अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 25 और धारा 27 में इस विषय पर अत्यंत स्पष्ट और अचूक कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। कानून का बुनियादी सिद्धांत यह कहता है कि कोई भी हत्यारा उस व्यक्ति की संपत्ति हासिल नहीं कर सकता जिसकी उसने जान ली हो। इसके अलावा धारा 27 के तहत कानून यह मानकर चलता है कि हत्यारा पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु से पहले ही मर चुका था। इस विधिक कल्पना का सीधा परिणाम यह होता है कि हत्यारे का नाम उत्तराधिकार की सूची से हमेशा के लिए कट जाता है और संपत्ति परिवार के अन्य योग्य वारिसों में कानून के अनुसार बांट दी जाती है। विनीत मिनाचा के मामले में यदि पुलिस का यह आरोप अदालत में सिद्ध हो जाता है, तो पिता की हत्या करने के बाद सुब्रत को संपत्ति का एक हिस्सा मिलना तो दूर, वह कानूनी रूप से उत्तराधिकार की पूरी प्रक्रिया से ही बेदखल हो जाएगा।
क्या पिता की संपत्ति पर बेटे का अपने आप अधिकार हो जाता है
भारतीय समाज में पारिवारिक जायदाद को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही रहता है कि बेटा होने के नाते पिता की हर जायदाद पर संतान का स्वाभाविक हक बन जाता है। हकीकत में ऐसा बिल्कुल नहीं है। कानून की नजर में सिर्फ बेटा होने से कोई व्यक्ति अपने पिता की संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता। अधिवक्ता सचिन नायक का कहना है कि जब भी संपत्ति के अधिकार का कोई विवाद उठता है, तो कानून सबसे पहले यह देखता है कि संपत्ति की प्रकृति क्या है, अर्थात वह स्वअर्जित है या फिर पैतृक। केवल यह दावा करना कि मैं बेटा हूं इसलिए यह संपत्ति मेरी है, अदालत में टिकने योग्य नहीं होता।
क्या पिता जीवित रहते अपनी संपत्ति किसी अन्य महिला को दे सकते हैं
यदि संपत्ति पिता की स्वअर्जित है, तो इसका सीधा उत्तर हां है। हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत यदि किसी हिंदू पिता ने अपनी खुद की कमाई, व्यापार या नौकरी से कोई संपत्ति खरीदी है, तो वह उसका पूर्ण और स्वतंत्र मालिक होता है। उसे यह तय करने की पूरी कानूनी आजादी होती है कि वह उस संपत्ति का क्या करे। वह जीवित रहते अपनी उस संपत्ति को बेटे, बेटी, पत्नी, किसी रिश्तेदार या फिर परिवार से बाहर की किसी अन्य महिला को उपहार, विक्रय या वसीयत के जरिए सौंप सकता है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी पिता ने अपनी गाढ़ी कमाई से कोई मकान बनाया या खरीदा है, तो बेटा सामान्य परिस्थितियों में यह कानूनी आपत्ति नहीं उठा सकता कि वह संतान है इसलिए पिता उस मकान को किसी दूसरे को नहीं दे सकते। हालांकि पिता की यह आजादी असीमित नहीं होती। यदि संपत्ति पैतृक है, संयुक्त परिवार की है, या उसमें किसी अन्य का कानूनी हिस्सा पहले से जुड़ा है, तो नियम पूरी तरह बदल जाते हैं।
विनीत मिनाचा की संपत्ति और पैतृक जायदाद के कड़े नियम
कानपुर के विनीत मिनाचा मामले में किसी भी विश्वसनीय तथ्य से यह साबित नहीं हुआ है कि उनकी संपत्ति पैतृक थी। जांच के दौरान पुलिस वर्ष 2022 में बनी एक पंजीकृत वसीयत की पड़ताल कर रही थी। उस पंजीकृत वसीयत के अनुसार विनीत मिनाचा की संपत्तियां उनकी पत्नी पुनीता, बेटे सुब्रत और बेटी सुभानी के बीच बांटी जानी थीं, जबकि बहू शालू को उस वसीयत से पूरी तरह बाहर रखा गया था। पुलिस के अनुसार सुब्रत के मन में महज यह आशंका थी कि उसके पिता किसी अन्य महिला के साथ रहने लगेंगे और जायदाद उसके नाम कर देंगे। यह केवल हत्या की साजिश का एक कथित मकसद था, न कि किसी संपत्ति का वास्तविक हस्तांतरण।
अधिवक्ता सचिन नायक स्पष्ट करते हैं कि पैतृक संपत्ति के मामले में कानून पूरी तरह बदल जाता है। वास्तविक पैतृक संपदा में बेटे और बेटी दोनों को जन्म से ही सहदायिक के रूप में अधिकार मिल जाता है। ऐसे मामलों में पिता अन्य सहदायिकों के वैध हिस्से को अपनी मर्जी से किसी अन्य व्यक्ति को नहीं दे सकते। पिता केवल अपने हिस्से की विधिक सीमा तक ही निर्णय लेने का अधिकार रखते हैं। इसलिए किसी भी विवाद में संपत्ति का स्वअर्जित या पैतृक होना ही वास्तविक अधिकारों की दिशा तय करता है।
बिना वसीयत मृत्यु होने पर संपत्ति का बंटवारा कैसे होता है
यदि कोई हिंदू पुरुष बिना कोई वैध वसीयत छोड़े दिवंगत हो जाता है, तो उसकी संपत्ति का विभाजन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के निर्धारित नियमों के तहत होता है। इस स्थिति में कानून सबसे पहले प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिसों की पहचान करता है। प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों में मुख्य रूप से मृतक की पत्नी, बेटे, बेटियां, मां और पूर्व में दिवंगत हो चुके बेटे या बेटी की संतानें शामिल होती हैं। इन सभी वारिसों को एक साथ कानूनी तौर पर निर्धारित अनुपात में संपत्ति का बराबर हिस्सा मिलता है और कोई भी एक वारिस दूसरे का हक नहीं छीन सकता।
क्या बच्चे पिता की बनाई वसीयत को अदालत में चुनौती दे सकते हैं
कई बार बच्चों को लगता है कि पिता द्वारा की गई वसीयत उनके साथ अन्याय है। कोई भी संतान केवल इस आधार पर वसीयत को चुनौती नहीं दे सकती कि उसे संपत्ति में हिस्सा नहीं मिला। अधिवक्ता सचिन नायक के अनुसार, वसीयत को अदालत में केवल ठोस कानूनी आधारों पर ही चुनौती दी जा सकती है।
इन कानूनी आधारों में यह साबित करना शामिल है कि वसीयत बनाते समय पिता की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी, या वसीयत धोखाधड़ी, दबाव अथवा अनुचित प्रभाव डालकर बनवाई गई थी। इसके अलावा यदि वसीयत पर कानूनी नियमों के अनुसार उचित हस्ताक्षर या गवाहों की पुष्टि नहीं है, वसीयत के निर्माण को लेकर संदेहास्पद परिस्थितियां मौजूद हैं, या फिर वसीयतकर्ता ने किसी ऐसी संपत्ति को दान या वसीयत करने की कोशिश की है जिसका वह कानूनी मालिक ही नहीं था, तो अदालत ऐसी वसीयत को खारिज कर सकती है। देश का कानून इन सभी आधारों को पूरी मान्यता देता है और साक्ष्यों की कड़ी जांच के बाद ही निर्णय सुनाता है।





















