पंजाब के दो प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों, चितकारा यूनिवर्सिटी और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में छात्राओं की सुरक्षा को लेकर हुए सिलसिलेवार छात्र प्रदर्शनों ने पूरे देश में बेटियों की हिफाजत पर गंभीर बहस छेड़ दी है। चितकारा यूनिवर्सिटी में दो छात्राओं के लापता होने की अफवाहों के चलते बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, हालांकि पुलिस प्रशासन और विश्वविद्यालय प्रबंधन ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया कि कोई भी छात्रा गायब या घायल नहीं हुई है। यह घटना भले ही शांत हो गई हो, लेकिन इसने एक ऐसा बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है जो केवल इन दो परिसरों तक सीमित नहीं है। भारत में नाबालिग बच्चियों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण करने पर एक बेहद हैरान करने वाली जमीनी हकीकत सामने आती है।
देश में नाबालिग बच्चियों से दुष्कर्म के पंजीकृत मामलों का भौगोलिक वितरण किसी भी पारंपरिक धारणा के बिल्कुल उलट है। देश में प्रति लाख बालिकाओं पर सबसे अधिक अपराध दर उत्तर या मध्य भारत में नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों में दिखाई देती है। वर्ष 2024 के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, मेघालय में प्रति लाख बालिकाओं पर 20.4 मामले दर्ज किए गए, जबकि सिक्किम में यह दर 16.4 और मिजोरम में 16.1 दर्ज की गई। इसके अलावा असम और तमिलनाडु भी उन राज्यों की सूची में शामिल रहे जहां यह दर राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। दूसरी ओर, देश के सबसे घनी आबादी वाले राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश में यह दर 3.1 और बिहार में महज 1.7 दर्ज की गई। पूरे देश के स्तर पर वर्ष 2024 में कुल 43,675 नाबालिग बच्चियां दुष्कर्म की शिकार दर्ज की गईं, जो वर्ष 2015 में दर्ज 10,934 मामलों के मुकाबले लगभग चार गुना अधिक है।
कम अपराध दर का मतलब अधिक सुरक्षा नहीं
उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे विशाल राज्यों में प्रति लाख कम मामले दर्ज होने का यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि वहां नाबालिग बच्चियां ज्यादा सुरक्षित माहौल में रह रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े केवल उन्हीं वारदातों का दस्तावेजीकरण करते हैं जो किसी तरह पुलिस थाने तक पहुंच पाती हैं। यह डेटा उन अनगिनत घटनाओं पर पूरी तरह खामोश रहता है जहां पीड़ित बच्चियां और उनके परिजन सामाजिक कलंक, लोकलाज के भय, परिवार के दबाव या आरोपी के रसूख के कारण खामोश रहने पर मजबूर हो जाते हैं। अपराध की रिपोर्टिंग न होना सुरक्षा का पैमाना नहीं बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर पीड़ित के भरोसे की कमी का संकेत हो सकता है।
हालांकि पुलिस महकमे द्वारा पीड़ितों और उनके परिवारों का भरोसा जीतने के लिए प्रशासनिक कदम उठाए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में डीसीपी प्रियंका शुक्ला के अनुसार, हर पुलिस थाने में महिला हितैषी कक्ष स्थापित किए गए हैं ताकि पीड़िताएं बिना किसी झिझक या भय के पुलिस के सामने अपनी बात रख सकें और दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों की शिकायत बेहिचक दर्ज करा सकें। इसके बावजूद सामाजिक दबाव कई बार व्यवस्था पर भारी पड़ जाता है। बिहार का 2020 का मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड इस कड़वी सच्चाई का भयावह प्रमाण है, जहां 7 से 17 वर्ष की अनाथ और बेसहारा बच्चियों के साथ उसी सुरक्षित आश्रय के भीतर यौन शोषण किया गया जिसे उनकी हिफाजत का जिम्मा सौंपा गया था। जांच में यह तथ्य भी सामने आया था कि रात में ज्यादती करने से पहले बच्चियों को रात के खाने में नशीला पदार्थ दिया जाता था। यह मामला साबित करता है कि जहां संस्थागत निगरानी कमजोर होती है, वहां अपराध की रिपोर्टिंग बरसों तक दबी रह सकती है।
पूर्वोत्तर राज्यों में अधिक आंकड़ों का समाजशास्त्रीय कारण
मेघालय, सिक्किम और मिजोरम जैसे राज्यों में प्रति लाख बच्चियों पर दर्ज अपराधों की ऊंची दर को केवल अपराध के प्रसार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका एक बड़ा पहलू पॉक्सो कानून को लेकर बढ़ती कानूनी जागरूकता और पीड़ितों द्वारा पुलिस तक पहुंचने की तत्परता भी है। जब किसी समाज में कानूनी अधिकारों की समझ बढ़ती है और प्रशासनिक व्यवस्था संवेदनशील होती है, तो अधिक परिवार आगे आकर प्राथमिकी दर्ज कराते हैं। तमिलनाडु इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहां वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराधों के मामलों में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई थी, जिसे राज्य के अधिकारियों ने पॉक्सो के तहत बेहतर और पारदर्शी रिपोर्टिंग का प्रत्यक्ष परिणाम बताया था।
इसके अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों में मेघालय लगातार पॉक्सो मामलों के आंकड़ों में अग्रणी रहा है। सांख्यिकीय नजरिए से भी छोटे राज्यों की कुल आबादी काफी कम होती है, जिससे मामलों की एक सीमित संख्या भी प्रति लाख की गणना में बहुत बड़ा अनुपात बना देती है। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी विशाल आबादी वाले राज्यों में यदि वास्तविक मामलों का एक छोटा हिस्सा भी पुलिस तक नहीं पहुंचता, तो कुल दर सांख्यिकीय रूप से बेहद नीचे आ जाती है। इस प्रकार अंडर-रिपोर्टिंग इन राज्यों के वास्तविक जमीनी हालात पर पर्दा डाल देती है।
अनसुलझा सवाल: क्या अपराध बढ़े हैं या सिर्फ रिपोर्टिंग?
यह सवाल आज भी सबसे पेचीदा बना हुआ है कि क्या समाज में बच्चियों के खिलाफ वास्तविक अपराध बढ़ रहे हैं या फिर कानूनी जागरूकता के कारण पुलिस तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या बढ़ गई है। आधिकारिक आंकड़े इस सवाल का कोई सीधा उत्तर नहीं दे पाते हैं। इस जटिलता को समझने के लिए राजस्थान का 1992 का चर्चित अजमेर ब्लैकमेल कांड सबसे सटीक उदाहरण है। अजमेर में वर्षों तक 100 से अधिक स्कूली छात्राओं और युवतियों का यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग का संगठित सिलसिला चलता रहा, लेकिन रसूखदारों के खौफ और सामाजिक बदनामी के डर से कोई भी मामला सीधे पुलिस तक नहीं पहुंचा।
उस मामले में आरोपी छात्राओं के साथ दुष्कर्म करने के बाद उनकी तस्वीरें खींच लेते थे और उन्हें समाज में सार्वजनिक करने की धमकी देकर चुप रहने पर मजबूर करते थे। इतना ही नहीं, पीड़िता बच्चियों पर दबाव डालकर उनकी अन्य सहेलियों को भी जाल में फंसाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। आरोपियों के मजबूत राजनीतिक और सामाजिक संपर्कों ने पीड़ितों को न्याय की चौखट तक जाने से पूरी तरह रोक रखा था। उस दौर में अंडर-रिपोर्टिंग का ही नतीजा था कि एक के बाद एक कई बच्चियां उस दलदल में फंसती चली गईं। उस ऐतिहासिक कांड के 32 साल बाद, अगस्त 2024 में पॉक्सो अदालत ने छह अन्य आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह घटना स्पष्ट करती है कि जब अपराध दबा रहता है, तो आरोपी खुले घूमते हैं और लगातार नए शिकार बनाते रहते हैं।
अपरिचित हमलावर बनाम परिचितों का साया
नाबालिग बच्चियों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में सबसे डरावना पहलू यह है कि अधिकांश घटनाओं में आरोपी कोई अजनबी नहीं होता, बल्कि पीड़ित बच्ची का कोई न कोई नजदीकी परिचित या रिश्तेदार ही निकलता है। किसी परिचित व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध को पहचानना और उसे कानूनी चौखट तक ले जाना किसी भी परिवार के लिए बेहद पीड़ादायक और चुनौतीपूर्ण होता है। जब अपराधी घर, मोहल्ले या रिश्तेदारी का ही हिस्सा होता है, तो बच्ची अक्सर यह समझ ही नहीं पाती कि उसके साथ गलत क्या हो रहा है, और परिवार सामाजिक बदनामी या पारिवारिक कलह के डर से बात दबाने की कोशिश करता है। यही कारण है कि यह अपराध लंबे समय तक गुप्त रह जाते हैं।
न्याय की धीमी रफ्तार और अदालतों में लंबित मामलों का पहाड़
एक पीड़ित परिवार जब तमाम सामाजिक दबावों को दरकिनार कर पुलिस थाने पहुंचकर प्राथमिकी दर्ज करा भी लेता है, तो उसकी वास्तविक जंग वहीं से शुरू होती है। कानूनी प्रक्रिया बेहद जटिल और थका देने वाली होती है, जिसमें गहन जांच, चिकित्सकीय परीक्षण, फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाना, आरोप पत्र दाखिल करना और फिर लंबी अदालती गवाहियों से गुजरना शामिल होता है। वर्ष 2024 के आंकड़े बताते हैं कि बालिकाओं से दुष्कर्म के मामलों में दोषसिद्धि की दर केवल 30 प्रतिशत रही, जबकि 86 प्रतिशत मामले अदालतों में फैसले के इंतजार में लंबित पड़े रहे।
न्याय के इस लंबे इंतजार के कई चर्चित उदाहरण देश के सामने हैं। वर्ष 2017 में एक नाबालिग किशोरी ने तत्कालीन भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था, जिसमें पीड़िता के परिवार पर भारी दबाव और जानलेवा धमकियों के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर गूंजा और वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद सजा सुनिश्चित हो सकी। इसी तरह जनवरी 2018 में आठ साल की एक बच्ची का अपहरण कर उसके साथ दरिंदगी की गई और हत्या कर दी गई थी। सुरक्षा खतरों के चलते उच्चतम न्यायालय ने उस मुकदमे को पठानकोट स्थानांतरित किया था, जिसके बाद 2019 में छह आरोपियों को दोषी ठहराया गया। देश में लंबित मामलों की स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 31 दिसंबर 2025 तक फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों और अनन्य पॉक्सो अदालतों में कुल 2,24,572 मामले लंबित थे। यह बताता है कि प्राथमिकी दर्ज होना न्याय मिलने की गारंटी नहीं, बल्कि एक अंतहीन इंतजार की शुरुआत भर है।



















