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नैना साहनी हत्याकांड: जब संदेह के साए में दिल्ली के एक तंदूर में झोंक दिए गए रिश्तेपड़ताल
31 अक्तू॰ 2026, 5:34 am (1 घंटे पहले)· 2

नैना साहनी हत्याकांड: जब संदेह के साए में दिल्ली के एक तंदूर में झोंक दिए गए रिश्ते

2 जुलाई 1995 को दिल्ली में घटित चर्चित तंदूर कांड की पूरी दास्तान, जिसमें आपसी शक के चलते नैना साहनी की हत्या कर शव को भट्टी में जलाने की कोशिश की गई थी।

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से शुरू हुआ एक प्रेम संबंध जब अविश्वास और अत्यधिक शक की आग में झुलसा, तो उसने देश के सबसे खौफनाक आपराधिक मामलों में से एक का रूप ले लिया। 2 जुलाई 1995 की रात राष्ट्रीय राजधानी के एक रेस्तरां से उठते धुएं और आग की लपटों ने एक ऐसे हत्याकांड का पर्दाफाश किया, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा और छात्र राजनीति से कांग्रेस में सक्रिय हुईं नैना साहनी की उनके ही पति सुशील शर्मा ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। उस वक्त नैना की उम्र महज 29 साल थी।

युवा राजनीति से शुरू हुआ प्रेम और गोपनीय वैवाहिक जीवन

नैना साहनी दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्र राजनीति में पूरी सक्रियता से उतरी थीं और वहीं से वह कांग्रेस में शामिल हुईं। यूथ कांग्रेस के दफ्तर में उनकी मुलाकात सुशील शर्मा से हुई, जो बाद में दिल्ली यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बने। दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और प्यार परवान चढ़ने लगा। साल 1992 में दोनों ने गोपनीय तरीके से शादी कर ली। शादी के बाद दोनों राजनीति में काम करते रहे और दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित एक फ्लैट में साथ रहने लगे।

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हालांकि, इस रिश्ते की नींव में शुरुआत से ही तनाव घुलने लगा था। नैना चाहती थीं कि सुशील उनकी शादी को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें और दुनिया के सामने लाएं, लेकिन सुशील इसे उजागर करने से लगातार बचते रहे। इस खींचतान के बीच दोनों के संबंधों में कड़वाहट गहरी होती चली गई।

पुराने रिश्ते की यादें और फोन कॉल से गहराया अविश्वास

सुशील शर्मा नैना को लेकर हद से ज्यादा पजेसिव थे और उनकी निष्ठा पर संदेह करने लगे थे। सुशील को शक था कि नैना अपने पुराने दोस्त मतलूब करीम के अब भी काफी करीब हैं। मतलूब करीम छात्र राजनीति के दिनों से नैना के करीबी साथी थे। शादी से पहले नैना और करीम एक-दूसरे से प्रेम करते थे, लेकिन अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक रखने के कारण उनका विवाह नहीं हो सका था।

साल 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी इस बात का विवरण मिलता है कि शादी के बाद भी नैना और करीम के बीच संपर्क बना हुआ था। 2 जुलाई 1995 को दोपहर 3 बजे से 4 बजे के दरमियान नैना ने करीम को फोन किया था और उनसे ऑस्ट्रेलिया जाने में मदद मांगी थी। अदालत के अनुसार, इसी शक और अविश्वास ने इस हत्याकांड की जमीन तैयार की।

मंदिर मार्ग के फ्लैट में खूनी वारदात

2 जुलाई 1995 की शाम को सुशील शर्मा और नैना साहनी मंदिर मार्ग स्थित अपने फ्लैट में मौजूद थे। उसी दौरान दोनों के बीच विवाद गहरा गया और सुशील ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर निकाल ली। उन्होंने नैना पर तीन गोलियां दागीं। इनमें से दो गोलियां नैना को लगीं, जिसमें से एक उनके सिर में और दूसरी गर्दन में जा धंसी। सिर पर लगी गोली जानलेवा साबित हुई और नैना की मौके पर ही मौत हो गई।

हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद सुशील सबूत मिटाने की जुगत में जुट गए। उन्होंने नैना के शव को लपेटा और अपनी कार में रखकर अशोका रोड स्थित अशोक यात्री निवास ले गए। इसी परिसर में उनका खुद का रेस्तरां 'बगिया बार-बी-क्यू' चलता था।

बगिया बार-बी-क्यू: मक्खन के पैकेट और भट्टी की आग

सुशील शर्मा देर रात रेस्तरां पहुंचे और वहां के मैनेजर केशव कुमार को सारे स्टाफ को घर भेज देने का निर्देश दिया। इसके बाद केशव की मदद से नैना के शव को रेस्तरां के भीतर लाया गया। दोनों ने शव को रेस्तरां के तंदूर में डालकर जलाने का प्रयास किया। जब तंदूर की आग धीमी पड़ने लगी, तो सुशील ने केशव से मक्खन लाने को कहा।

केशव 500 ग्राम मक्खन का पैकेट लेकर आया और उसे आग में डाला गया। इससे आग की लपटें तेज हो गईं और रेस्तरां से भारी मात्रा में काला धुआं उठने लगा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह उल्लेख किया कि चिकित्सीय साक्ष्य यह पूरी तरह स्थापित नहीं कर सके कि क्या शव को काटा भी गया था। दूसरी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट नहीं हो सका, क्योंकि शरीर के हिस्सों का अलग दिखना जलने की वजह से भी हो सकता था।

अनारो देवी की चीख और गश्त कर रहे पुलिसकर्मियों की सतर्कता

रात करीब 11 बजे अनारो देवी नाम की एक महिला ने रेस्तरां से भीषण धुआं और लपटें उठती देखीं। उन्होंने शोर मचाया कि होटल में आग लग गई है। उसी समय हेड कॉन्स्टेबल कुंजू और होमगार्ड चंद्र पाल पास में ही गश्त कर रहे थे। महिला की आवाज सुनकर दोनों तुरंत पड़ताल करने पहुंचे।

कुंजू ने पहले पुलिस कंट्रोल रूम को सूचित करने की कोशिश की, लेकिन नजदीकी टेलीफोन बूथ बंद था। इसके बाद वह पास की पुलिस चौकी पहुंचे और आग लगने की जानकारी दी। जब दोनों पुलिसकर्मी लौटे, तो वे पीछे के रास्ते से रेस्तरां में दाखिल हुए। उन्होंने देखा कि केशव तंदूर के पास खड़ा होकर आग में लकड़ियां झोंक रहा था। पूछताछ करने पर केशव ने दावा किया कि वह कांग्रेस के पुराने बैनर, पोस्टर और रद्दी कागज जला रहा है।

पुलिसकर्मियों को उसके इस जवाब पर यकीन नहीं हुआ। इसी दौरान अन्य पुलिस अधिकारी और होटल के सुरक्षाकर्मी भी मौके पर पहुंच गए। सुशील शर्मा, जो रेस्तरां के गेट के पास खड़े थे, स्थिति भांपकर वहां से फरार हो गए। जब आग बुझाई गई, तो तंदूर के भीतर एक महिला का जला हुआ शव मिला। पुलिस ने केशव को तुरंत हिरासत में ले लिया और बाद में गिरफ्तार कर लिया, जिसके साथ ही हत्याकांड की आधिकारिक जांच शुरू हो गई।

डीएनए जांच और हैदराबाद लैब से हुई पहचान की पुष्टि

शुरुआती पोस्टमॉर्टम में मौत की तात्कालिक वजह शरीर पर लगी चोटों के चलते अत्यधिक रक्तस्राव से होने वाला शॉक बताई गई। इसके बाद 12 जुलाई 1995 को दूसरा पोस्टमॉर्टम कराया गया। एक्स-रे जांच में शव के भीतर धातु के दो टुकड़े मिले, जिनमें से एक खोपड़ी में और दूसरा गर्दन में मौजूद था। इनकी पहचान गोलियों के तौर पर हुई।

इस मामले में पहचान सुनिश्चित करने के लिए हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में डीएनए परीक्षण कराया गया। नैना साहनी के माता-पिता के नमूनों की तुलना जले हुए अवशेषों से मिले ऊतकों से की गई। इस वैज्ञानिक रिपोर्ट ने अकाट्य रूप से साबित कर दिया कि तंदूर में मिला जला हुआ शव नैना का ही था। भारतीय आपराधिक जांच के इतिहास में डीएनए प्रोफाइलिंग के इस्तेमाल के लिहाज से यह मामला एक नजीर बन गया।

फरारी, अग्रिम जमानत की कोशिश और बेंगलुरु में गिरफ्तारी

वारदात के बाद सुशील शर्मा दिल्ली छोड़कर भाग निकले। 2 जुलाई की रात उन्होंने गुजरात भवन में अपने मित्र डी.के. राव के साथ बिताई। इसके बाद वह गिरफ्तारी से बचने के लिए अलग-अलग शहरों में ठिकाने बदलते रहे।

उन्होंने मद्रास (अब चेन्नई) की एक सत्र अदालत से अग्रिम जमानत हासिल कर ली थी, लेकिन दिल्ली पुलिस के हस्तक्षेप के बाद मद्रास उच्च न्यायालय ने इस राहत को रद्द कर दिया। आखिरकार 10 जुलाई 1995 को बेंगलुरु पुलिस ने सुशील को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपने वकील अनंतनारायण के साथ घूम रहे थे। अगले दिन दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और दिल्ली लेकर आई।

जांच के दौरान पुलिस ने बेंगलुरु के एक होटल के कमरे से सुशील की लाइसेंसी रिवॉल्वर और कारतूस बरामद किए। फॉरेंसिक जांच में यह पूरी तरह सिद्ध हुआ कि नैना के शरीर से बरामद गोलियां उसी रिवॉल्वर से चलाई गई थीं।

राजनीतिक साजिश का दावा और बयानों का विरोधाभास

गिरफ्तारी के बाद सुशील शर्मा ने दावा किया कि उन्हें एक राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। एक साक्षात्कार में उन्होंने आशंका जताई कि पुलिस हिरासत में उनकी जान ली जा सकती है। उन्होंने यह बचाव भी पेश किया कि जब हत्या हुई, तब वह तीर्थयात्रा पर गए हुए थे।

उनकी सुरक्षा को देखते हुए एक मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि पूछताछ के दौरान उनके वकील मौजूद रहें और उन्हें दिया जाने वाला खाना पहले टेस्ट कराया जाए। मीडिया से बात करते हुए सुशील ने कहा, "मुझे पछतावे के लिए कुछ नहीं करना पड़ा है।" वहीं दूसरी तरफ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से उन्होंने कहा था, "मुझसे शायद कोई गलती हो गई है, लेकिन आपको मुझे इस मुसीबत से बाहर निकालना होगा।"

फांसी से उम्रकैद और अंततः रिहाई तक कानूनी सफर

3 नवंबर 2003 को निचली अदालत ने सुशील शर्मा को हत्या और सबूत मिटाने की साजिश का दोषी ठहराया। इसके बाद 7 नवंबर को अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। वहीं रेस्तरां प्रबंधक केशव कुमार को शव को ठिकाने लगाने में मदद के लिए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई, हालांकि उन्हें हत्या का दोषी नहीं माना गया। फरवरी 2007 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी सुशील की फांसी की सजा बरकरार रखी।

मामला जब देश की सबसे बड़ी अदालत पहुंचा, तो 8 अक्टूबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में पाया कि सुशील का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और उनके सुधरने तथा पुनर्वास की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था। अदालत ने यह भी माना कि यह हत्या एक तनावपूर्ण निजी रिश्ते का परिणाम थी।

इसके बाद 21 दिसंबर 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुशील शर्मा को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने माना कि सजा माफी के मौजूदा नियमों के तहत उन्हें आगे जेल में रखना कानूनी रूप से उचित नहीं था। 2 जुलाई 1995 को नैना साहनी की हत्या से शुरू हुआ यह प्रकरण न केवल भारत के सबसे चर्चित आपराधिक मुकदमों में गिना जाता है, बल्कि इसने अपराध की तहकीकात में फॉरेंसिक डीएनए तकनीक के महत्व को भी हमेशा के लिए स्थापित कर दिया।

सवाल-जवाब

नैना साहनी हत्याकांड कब और कहां हुआ था?
यह हत्याकांड 2 जुलाई 1995 को नई दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित एक फ्लैट में हुआ था, जिसके बाद शव को अशोका रोड स्थित बगिया बार-बी-क्यू रेस्तरां में ले जाया गया था।
हत्या की मुख्य वजह क्या थी?
सुशील शर्मा नैना साहनी पर उनके पुराने दोस्त मतलूब करीम के साथ संबंधों को लेकर शक करते थे, और 2 जुलाई को नैना द्वारा करीम को किए गए फोन कॉल के बाद यह विवाद हत्या में बदल गया।
शव की पहचान कैसे सुनिश्चित की गई थी?
हैदराबाद स्थित सीसीएमबी में डीएनए जांच कराई गई, जहां नैना के माता-पिता के नमूनों का मिलान जले हुए अवशेषों से कर शव की पहचान साबित की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने सुशील शर्मा की फांसी की सजा क्यों बदली थी?
अदालत ने पाया कि सुशील का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, उनके सुधरने की संभावना मौजूद थी और यह अपराध एक तनावपूर्ण व्यक्तिगत संबंध का नतीजा था।
सुशील शर्मा को जेल से कब रिहा किया गया?
दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद 21 दिसंबर 2018 को सजा माफी के नियमों के तहत सुशील शर्मा को जेल से रिहा किया गया।
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