भारतीय सैन्य इतिहास में जून 1984 का पहला पखवाड़ा एक ऐसी अप्रत्याशित और दुखद घटना का गवाह बना, जिसकी गूंज दशकों बाद भी महसूस की जाती है। अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर परिसर में खालिस्तानी अलगाववादी जरनैल सिंह भिंडरांवाले और उसके सैकड़ों सशस्त्र समर्थकों को बाहर निकालने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू किया था। भिंडरांवाले अकाल तख्त पर कब्जा जमाए बैठा था, जो सिख पंथ की सर्वोच्च धार्मिक पीठ मानी जाती है। वहां से समानांतर व्यवस्था चलाने वाले भिंडरांवाले ने ऐलान किया था कि 10 जून तक पूरे पंजाब पर उसका नियंत्रण होगा और खालिस्तान नाम से एक अलग मुल्क वजूद में आएगा। सुरक्षा बलों ने पूरे धार्मिक परिसर की घेराबंदी कर रखी थी, फिर भी चरमपंथियों का यह पक्का मानना था कि सेना पवित्र हरमंदिर साहिब के भीतर कदम रखने की जुर्रत नहीं करेगी। 5 जून 1984 की शाम साढ़े चार बजे लाउडस्पीकरों पर सैन्य अफसरों की आवाज गूंजी, जिसमें हथियारों को डालकर आत्मसमर्पण करने को कहा गया। जब भीतर से कोई बाहर नहीं आया, तो रात करीब साढ़े दस बजे जवानों ने भीतर प्रवेश किया। अंदर दाखिल होते ही जोरदार गोलीबारी छिड़ गई। सेना ने जब बख्तरबंद गाड़ियां आगे बढ़ाईं, तो उग्रवादियों ने रॉकेट लॉन्चरों से उन पर हमला करके उन्हें ध्वस्त कर दिया, जिसमें कई जवान वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद सेना को टैंकों का सहारा लेना पड़ा। अगली सुबह 5 बजे टैंकों ने अकाल तख्त के सबसे ऊपरी हिस्से पर गोलाबारी शुरू की। एक के बाद एक करीब 80 गोले दागे गए। लगभग एक घंटे की भारी गोलाबारी के बाद अंदर से चल रही गोलियां खामोश हो गईं। सुबह 10 बजे जब सैन्य टुकड़ियां भीतर दाखिल हुईं, तो अकाल तख्त के आंगन में भिंडरांवाले का शव पड़ा मिला। इस पूरे टकराव में भिंडरांवाले के 300 से अधिक अनुयायी और सेना के लगभग 100 जवान मारे गए। अकाल तख्त की मुख्य इमारत मलबे में तब्दील हो चुकी थी और स्वर्ण मंदिर को गहरा नुकसान पहुंचा था। इस मंजर ने समूचे देश के सिखों की धार्मिक भावनाओं को बेहद आहत किया और उनके भीतर एक गहरा आक्रोश भर दिया।
रामगढ़ छावनी में असंतोष की चिंगारी और हिंसक बगावत
अमृतसर में हुई कार्रवाई का असर वहां से करीब 1,663 किलोमीटर दूर बिहार के उस समय के रामगढ़ सिख रेजिमेंटल सेंटर में साफ दिखने लगा था, जो आज झारखंड का हिस्सा है। 8 जून 1984 को रामगढ़ छावनी में रोजमर्रा की तरह गतिविधियां चल रही थीं, जवान अपनी ड्यूटी पर तैनात थे और अधिकारी अपने दफ्तरों में कामकाज देख रहे थे। उसी दौरान सिपाही गुरनाम सिंह डिप्टी कमांडेंट कर्नल जगदेव सिंह के कमरे में पहुंचा। चेहरे पर तल्खी थी, मगर लहजा बेहद सधा हुआ था। उसने कर्नल से सीधे कहा कि अमृतसर में जो कुछ भी हुआ है वह बिल्कुल गलत था और वह खुद अमृतसर जाना चाहता है। कर्नल जगदेव सिंह ने उसे स्पष्ट मना करते हुए कहा कि वहां जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। गुरनाम सिंह कुछ पल खामोश खड़ा रहा और फिर बिना कुछ बोले बाहर निकल गया। उस रात उसने मेस में खाना भी नहीं खाया। उसके भीतर जो उथल-पुथल चल रही थी, वही बेचैनी छावनी के बाकी सिख जवानों में भी सुलग रही थी।
दो दिन बाद यानी 10 जून 1984 की सुबह दस बजे छावनी के गुरुद्वारे में सैकड़ों सिख जवान एकत्र हुए। वहां शब्द कीर्तन का गायन हुआ, फिर पूरी संगत अरदास के लिए खड़ी हुई। जवानों ने माथा टेका, कड़ाह प्रसाद ग्रहण किया और गुरुद्वारे से बाहर आने लगे। लेकिन दहलीज लांघते ही माहौल पूरी तरह बदल गया। अपनी-अपनी बैरकों की तरफ लौटने के बजाय जवान तेजी से शस्त्रागार की ओर बढ़ने लगे। उनके कदम तेज हो चुके थे और सामान्य बातचीत अचानक 'जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल' के गगनभेदी नारों में बदल गई। जवानों ने शस्त्रागार का मुख्य दरवाजा तोड़ दिया और भीतर रखे हथियार व गोला-बारूद अपने कब्जे में ले लिए। इसके बाद वे वहां खड़े सैन्य वाहनों पर सवार होने लगे।
छावनी में इस अप्रत्याशित बगावत की खबर बिजली की तरह फैल गई। जनरल ऑफिसर कमांडिंग ब्रिगेडियर एससी पुरी अपनी कार से हालात संभालने फौरन शस्त्रागार पहुंचे। उन्होंने सैनिकों को रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन बात समझाइश के दायरे से बाहर निकल चुकी थी। आक्रोशित जवानों ने गोलीबारी शुरू कर दी। इसी अफरा-तफरी में एक गोली ब्रिगेडियर पुरी को लगी और दूसरी गोली उनके सिख चालक को लगी। दोनों को तत्काल सैन्य अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद दोनों की जान नहीं बचाई जा सकी। ब्रिगेडियर के साथ मौजूद डिप्टी कमांडेंट कर्नल जगदेव सिंह भी इस गोलीबारी में गंभीर रूप से घायल हो गए।
सड़कों पर निकला काफिला और अलग-अलग दिशाओं में धरपकड़
अपने सबसे पवित्र धार्मिक स्थल के क्षतिग्रस्त होने की खबर से विचलित लगभग 1,400 सिख सैनिक हथियारों से लैस होकर सैन्य ट्रकों और गाड़ियों के जरिए छावनी से बाहर निकल पड़े। रामगढ़ कस्बे में पहुंचते ही उन्होंने कुछ निजी वाहनों को भी अपने काफिले में शामिल कर लिया। उनका सीधा लक्ष्य अमृतसर पहुंचना था। रामगढ़ से करीब 450 किलोमीटर दूर मिर्जापुर रेलवे स्टेशन के पास सक्तेशगढ़ क्षेत्र में उन्हें रोकने की पहली बड़ी कोशिश हुई, लेकिन अधिकांश जवान उस घेरे को चकमा देकर आगे निकल गए।
बनारस पहुंचते ही इन विद्रोही सैनिकों ने अपनी रणनीति बदली। एक साथ पकड़े जाने के जोखिम से बचने के लिए वे छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंट गए। जैसे ही उनका काफिला बनारस से बाहर निकला, सेना की 21वीं मैकेनाइज्ड रेजिमेंट ने उनके रास्ते में मजबूत नाकेबंदी कर दी। सैनिकों को चारों तरफ से घेरकर हिरासत में ले लिया गया। इस बीच जो टुकड़ी वहां से बच निकलने में कामयाब रही थी, उसे इलाहाबाद के पास सेना के माउंटेन डिवीजन और पैदल सैन्य दस्तों ने रोक लिया। दोनों तरफ से कुछ देर तक भीषण गोलीबारी चली, जिसके बाद विद्रोही जवानों ने हथियार डाल दिए। बाद में हुई आधिकारिक जांच में यह सामने आया कि रामगढ़ की इस पूरी बगावत का नेतृत्व सिपाही गुरनाम सिंह ही कर रहा था। पंजाब के पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त रमेश इंद्र सिंह ने अपनी पुस्तक टर्moil इन पंजाब बिफोर एंड आफ्टर ब्लू स्टार में लिखा है कि उस वक्त अधिकारियों को तुरंत एक सैनिक दरबार बुलाकर जवानों को जमीनी हकीकत समझानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा कोई संवाद स्थापित नहीं किया गया।
इस पूरे प्रसंग से ठीक एक महीने पहले का एक बेहद अहम वाकया भी जुड़ा है। 1 मई 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद रामगढ़ छावनी के दौरे पर आई थीं। उन्होंने वहां जवानों को संबोधित किया था। उसी दौरे के दौरान उन्होंने वहां मौजूद एक जनरल से अचानक पूछा था कि रांची से अमृतसर की दूरी कितनी है। जनरल ने संकोच के साथ उत्तर दिया कि वहां के लिए एक सीधी ट्रेन चलती है। उस समय वह सैन्य अधिकारी प्रधानमंत्री के इस सवाल के पीछे का मंतव्य समझ नहीं पाए थे। बाद में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद उस जनरल ने बिहार के तत्कालीन गृह सचिव एसएच धनोआ से साझा किया था कि अगर इंदिरा गांधी ने आने वाले दिनों के बारे में थोड़ा भी संकेत दिया होता, तो अधिकारी अपने जवानों को मानसिक तौर पर इस स्थिति के लिए तैयार कर सकते थे।
राजस्थान के श्रीगंगानगर में 9वीं बटालियन का विद्रोह
रामगढ़ के बाद असंतोष की दूसरी बड़ी ज्वाला राजस्थान के श्रीगंगानगर में भड़की। यहां सिख रेजिमेंट की 9वीं बटालियन तैनात थी। यह वही बटालियन थी जिसने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में नौगांव सेक्टर के भीतर पाकिस्तानी सेना को धूल चटा दी थी। छावनी में जवान बीबीसी रेडियो पर पत्रकार मार्क टुली का वह समाचार सुन रहे थे, जिसमें बताया जा रहा था कि अकाल तख्त को भारी नुकसान पहुंचा है और भिंडरांवाले अपने कई साथियों के साथ मारा गया है।
इस बटालियन में तरलोचन सिंह मनोचाहल नाम का एक युवा सैनिक शामिल था। तरलोचन दरअसल भिंडरांवाले के करीबी सहयोगी गुरबचन सिंह मनोचाहल का भाई था। उसी के साथ हवलदार ज्ञान सिंह 'रनर' भी मौजूद थे, जो 400 मीटर और 800 मीटर की दौड़ में एशियाई स्तर के चैंपियन रह चुके थे। ज्ञान सिंह ने अपने साथियों को झकझोरते हुए पंजाबी में कहा कि सब कड़ाह प्रसाद खा चुके हो, अब कुछ करके दिखाने का वक्त आ गया है। इस बात ने तरलोचन और उसके साथियों के सीने में आग लगा दी।
8 जून की रात इन सैनिकों ने योजनाबद्ध तरीके से शस्त्रागार पर धावा बोल दिया। हथियारों और कारतूसों को समेटने के बाद उन्होंने सेना के पांच ट्रकों पर कब्जा कर लिया। करीब 387 सैनिक अपनी यूनिट छोड़कर अमृतसर की ओर निकल पड़े। छावनी से निकलते समय उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल इकबाल सिंह सभरवाल के आवास पर भी गोलियां चलाईं। सिपाही सतनाम सिंह और हवलदार मेजर करम सिंह ने आगे बढ़कर उन्हें रोकने और समझाने का प्रयास किया, लेकिन गुस्से से भरे सैनिकों ने उनके साथ मारपीट की और आगे बढ़ गए।
नाकेबंदी, गोलीबारी और टैंकों के सामने आत्मसमर्पण
श्रीगंगानगर के निकट राजस्थान पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग कर रखी थी। विद्रोही जवानों ने 'जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल' के नारे लगाते हुए अंधाधुंध फायरिंग की और पुलिस की घेराबंदी को तोड़ते हुए पंजाब की सीमा में प्रवेश कर गए। वे अब पंजाब के अबोहर-मलोट मार्ग पर दौड़ रहे थे। हालांकि सेना की 94 फील्ड रेजिमेंट को पहले ही सतर्क कर दिया गया था और उसने सड़क पर मोर्चा संभाल रखा था। वहां पहुंचते ही दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। काफिले के आगे चल रहे कुछ वाहन तो निकल गए, लेकिन पीछे रह गए तीन वाहन बीच में फंस गए। इस खूनी झड़प में 13 जवानों की मौत हो गई।
इस नुकसान के बाद बचे हुए सैनिकों को समझ आ गया कि जीटी रोड या सीधे रास्तों से अमृतसर पहुंचना नामुमकिन है। वे मुक्तसर पहुंचे और मुख्य सड़कों की नाकेबंदी से बचने के लिए पंजाब के आशाबुट्टर गांव की ओर मुड़ गए, जहां वे नहर के किनारे बनी संकरी सड़क से आगे बढ़ने लगे। लेकिन जब वे मोगा के करीब कोट सुखिया पहुंचे, तो आगे का रास्ता पूरी तरह बंद मिला। उनके ठीक सामने भारतीय सेना के विशाल टैंक खड़े थे और चारों तरफ से हथियारबंद घेरा कस चुका था। उन टैंकों की कमान संभाल रहे एक सिख जनरल ने आगे आकर माइक पर जवानों से कहा कि स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई खत्म हो चुकी है और अब अमृतसर जाने से उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा, इसलिए वे तुरंत हथियार डाल दें। आगे बढ़ने का कोई जरिया न देख सभी 387 जवानों ने सरेंडर कर दिया। उन्हें सूरतगढ़ ले जाकर उनके हथियार जब्त कर लिए गए। कोर्ट मार्शल के बाद तरलोचन सिंह और उनके तीन साथियों को 14 साल की जेल हुई, हालांकि छह साल बाद वीपी सिंह की सरकार ने उन्हें माफी दे दी। इस घटना के बाद सिख रेजिमेंट की 9वीं बटालियन को भंग कर दिया गया।
उरी, मीरान साहिब, असम और अन्य छावनियों की घटनाएं
इसी बीच जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्र उरी से भी सिख जवानों के बेचैन होने की खबर आई। सूचना मिलते ही कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल पीएन हून बिना वक्त गंवाए सीधे हेलिकॉप्टर से उस फुटबॉल मैदान में उतरे जहां जवान जमा थे। जनरल हून ने मंच से जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि रेडियो पाकिस्तान पर जो कुछ भी प्रसारित किया जा रहा है वह सरासर सफेद झूठ है और बेहतर होगा कि वे खुद अमृतसर जाकर सच देखें। इसके बाद जनरल ने जवानों की आंखों में देखते हुए सीधा सवाल दागा कि यहां से पाकिस्तान महज दो मील दूर है, जो भी पाकिस्तान जाना चाहता है वह अपना हाथ उठाए। पूरे मैदान में सन्नाटा पसर गया और एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा। इस तरह बिना एक भी गोली चले उरी की बगावत टल गई। लेखक राजेश भट्ट ने अपनी पुस्तक रेडियो कश्मीर इन टाइम्स ऑफ पीस एंड वॉर में विस्तार से बताया है कि कैसे 1947 से 1989 के दौरान रेडियो पाकिस्तान और रेडियो तराड़खल ने झूठी खबरें फैलाकर सीमावर्ती इलाकों के लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिशें की थीं।
उरी के बाद जम्मू के मीरान साहिब में तनाव पैदा हुआ, जहां 18वीं सिख बटालियन के करीब 80 जवान अमृतसर के लिए निकल पड़े। हालांकि गुरदासपुर पहुंचते ही सेना ने उन्हें रोक लिया। वहां उनके ही साथी सैनिक सामने खड़े थे, लिहाजा कोई टकराव या गोलीबारी नहीं हुई। उनके हथियार लेकर उन्हें वापस भेज दिया गया। इसी तरह 14वीं सिख बटालियन के 127 जवान जब अमृतसर के लिए निकले तो उन्हें महाराष्ट्र में पकड़ लिया गया। 11 जून को असम में 3री सिख रेजिमेंट के 200 से ज्यादा सैनिक हथियार लेकर टुकड़ियों में निकल पड़े। कर्नल जेएस काहलों ने हाथ जोड़कर उनसे विनती की कि वे गलत रास्ते पर न जाएं, पर जवान नहीं माने। हालांकि कुछ दूर जाने के बाद उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया। ऐसी ही घटनाएं ठाणे, पुणे और अलवर से भी दर्ज की गईं। कड़े पहरे के बावजूद 4थी हॉर्स रेजिमेंट के दफादार गुरजंत सिंह अपनी सैन्य जीप से निहत्थे अमृतसर पहुंचने में कामयाब रहे, जिन्हें बाद में 4 सितंबर 1984 को स्वर्ण मंदिर परिसर के अंदर से पकड़ा गया।
सैन्य कार्रवाई का व्यापक असर और गहराते घाव
इस पूरे विद्रोह के बाद सेना ने सख्त अनुशासनात्मक कदम उठाए। करीब 365 विद्रोही सैनिकों को सेना से बर्खास्त कर दिया गया और 277 को अदालतों द्वारा जेल भेज दिया गया। लेफ्टिनेंट जनरल केएस बराड़ ने अपनी किताब में लिखा है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही भिंडरांवाले के भड़काऊ भाषणों वाली ऑडियो कैसेटें देश के अलग-अलग गुरुद्वारों और सैन्य छावनियों तक पहुंचाई जा चुकी थीं, जिनमें अलग सिख राष्ट्र के लिए समर्थन मांगा जा रहा था। जब ब्लू स्टार अभियान चला, तो मीडिया और संचार माध्यमों पर लगे प्रतिबंधों के कारण सैनिकों तक सही सूचनाएं नहीं पहुंचीं और अफवाहों ने हालात बिगाड़ दिए।
रमेश इंद्र सिंह के आंकड़ों के अनुसार, ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद देश भर की छावनियों से कुल मिलाकर करीब 2,900 सिख सैनिकों ने विद्रोह का रास्ता चुना था। सरकारी व ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक इस पूरे विद्रोह के दौरान 47 सैनिक मारे गए और बाकी को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन यह असंतोष यहीं शांत नहीं हुआ। इसके ठीक चार महीने बाद 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद दिल्ली और देश के कई हिस्सों में सिखों के खिलाफ भयानक हिंसा भड़की और पंजाब लंबे समय तक आतंकवाद के दौर में फंसा रहा।
24 जुलाई 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच चंडीगढ़, जल विवाद, बर्खास्त सैनिकों के पुनर्वास और हिंसा पीड़ितों के मुआवजे को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। इसके बावजूद पंजाब के जख्म भरने में लंबा वक्त लगा। इक्कीस साल बाद 11 अगस्त 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में खड़े होकर देश से माफी मांगते हुए कहा था कि जो कुछ हुआ वह राष्ट्रीय भावना के खिलाफ था और उस पर उनका सिर शर्म से झुक जाता है। सिख रेजिमेंट और पंथ का रिश्ता ऐतिहासिक रहा है, जहां ब्रिटिश काल से ही जवान गुरु ग्रंथ साहिब पर हाथ रखकर निष्ठा की शपथ लेते आए हैं। इस रेजिमेंट का युद्धघोष 'जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल' रहा है और इसके नाम 2 परमवीर चक्र, 24 महावीर चक्र और 67 वीर चक्र दर्ज हैं, जिसमें 1948 में करम सिंह और 1962 में जोगिंदर सिंह को मिले सर्वोच्च सैन्य सम्मान शामिल हैं।


















