पारंपरिक खेती से अलग हटकर कुछ नया करने की चाह रखने वाले किसानों के लिए नकदी फसलें आय का बड़ा साधन बन रही हैं। झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले किसान विजय ने अपनी एक एकड़ जमीन पर लाह की खेती शुरू करके यह साबित कर दिखाया है कि सही फसल का चयन लंबे समय तक सुरक्षित भविष्य दे सकता है। वर्तमान में उनके पौधे ज्यादा बड़े नहीं हुए हैं और उनकी ऊंचाई मुश्किल से 4 फीट के आसपास है। हैरानी की बात यह है कि इस शुरुआती अवस्था में भी प्रत्येक पौधे से 1 से 2 किलोग्राम तक लाह की पैदावार मिलने लगी है। एक चक्र को पूरी तरह तैयार होने में 5 से 6 महीने का समय लगता है, जिसके बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
बाजार ढूंढने की जरूरत नहीं, घर आकर ले जाती हैं कंपनियां
लाह की खेती की सबसे आकर्षक बात इसकी सहज विपणन प्रक्रिया है। विजय का कहना है कि जब फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो उन्हें कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं होती। वह सीधे खरीददार कंपनियों को फोन करके सूचित करते हैं। इसके बाद बड़ी कंपनियां स्वयं उनके खेत पर पहुंचती हैं और सारा उत्पाद खरीदकर ले जाती हैं। लाह की मांग कई बड़े उद्योगों में व्यापक रूप से होती है। पेंट बनाने वाली बड़ी औद्योगिक इकाइयों को इसकी भारी जरूरत पड़ती है, क्योंकि इससे प्राकृतिक पेंट का निर्माण होता है। इसके अतिरिक्त पारंपरिक चूड़ियां और अन्य सौंदर्य प्रसाधन तथा औद्योगिक उत्पाद बनाने में भी लाह का इस्तेमाल मुख्य घटक के रूप में किया जाता है। मांग इतनी अधिक है कि खरीदार सीधे किसान की चौखट तक पहुंचते हैं।
शुरुआती दौर से ही लगातार कमाई और भविष्य का मजबूत आधार
इस व्यवसाय की खासियत यह है कि पौधे के छोटे रहने के दौरान ही आमदनी का सिलसिला शुरू हो जाता है। आगामी पांच से छह महीनों में जब ये पौधे और अधिक विकसित हो जाएंगे, तब एक ही पेड़ से लगभग 15 से 20 किलोग्राम तक लाह निकलने की पूरी संभावना रहती है। वर्तमान खुले बाजार में लाह का भाव 900 से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम तक रहता है। इस भाव के चलते किसान एक ही पेड़ के जरिए एक लाख रुपये तक की आमदनी आसानी से अर्जित कर लेते हैं। आर्थिक दृष्टिकोण से लाह की यह बागवानी किसी बड़े वित्तीय अवसर से कम नजर नहीं आती। इसके पौधे किसी भी सामान्य पौधशाला से सुगमता से खरीदे जा सकते हैं। एक बार इन पेड़ों का रोपण कर देने के बाद अगले 20 वर्षों तक दोबारा पौधे लगाने की चिंता नहीं रहती। अगले 10 वर्षों में यही पौधे विशाल वृक्षों का रूप ले लेंगे, जिससे यह योजना एक ठोस भविष्य निधि की तरह काम करती है।
साल में दो बार उपज और उम्र भर की वित्तीय सुरक्षा
विजय के अनुभव के अनुसार, इस पूरे कृषि चक्र से एक कैलेंडर वर्ष के भीतर दो बार लाह की कटाई की जा सकती है। छह महीने के भीतर एक चक्र पूरा हो जाता है, जिससे साल में दो दफा नियमित पैदावार हाथ लगती है। हालांकि वर्तमान में पेड़ छोटे आकार के हैं, इसलिए मौजूदा कमाई लगभग एक लाख रुपये तक सिमटी हुई है। जैसे-जैसे ये पेड़ समय के साथ पुराने और बड़े होते जाएंगे, वैसे-वैसे उनसे प्राप्त होने वाली लाह की मात्रा और कुल लाभ भी कई गुना बढ़ता जाएगा। विजय इसे केवल मौजूदा व्यवसाय नहीं मानते, बल्कि उनका मानना है कि यह दीर्घकालिक वृक्षारोपण उनके बुढ़ापे का भी सबसे मजबूत और सुरक्षित सहारा बनेगा।

















