झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है। यह पावन तीर्थ केवल करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि अपनी रहस्यमयी स्थापत्य कला और सदियों पुरानी बनावट के कारण भी शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं को अचंभित करता आया है। मंदिर के विशाल प्रांगण में देवाधिदेव महादेव के साथ माता शक्ति और अन्य देवी-देवताओं के देवालय स्थापित हैं। इन सबके बीच मुख्य गर्भगृह की वास्तुकला और उसका निर्माण कौशल आज के आधुनिक दौर में भी लोगों के बीच गहरी जिज्ञासा पैदा करता है।
भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्माण से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं
धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पावन धाम में भगवान शिव साक्षात ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं। देश के कोने-कोने से हर वर्ष लाखों भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। मंदिर के निर्माण को लेकर क्षेत्र में अत्यंत रोचक आख्यान प्रचलित हैं। जनश्रुति के अनुसार, पूरे परिसर के पांच अति महत्वपूर्ण देवालयों की रचना स्वयं देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने की थी। इन पांच विशिष्ट निर्माणों में बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर, माता शक्ति का मंदिर और लक्ष्मी नारायण मंदिर प्रमुख रूप से शामिल बताए जाते हैं।
एकल द्वार और पत्थरों की बेजोड़ बनावट
देवघर के सुप्रसिद्ध तीर्थ पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, मुख्य मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रवेश और निकास द्वार है। गर्भगृह के अंदर भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग प्रतिष्ठित है, लेकिन इस पूरे मुख्य मंदिर में आने-जाने के लिए केवल एक ही दरवाजा मौजूद है। मंदिर का समूचा ढांचा भारी-भरकम पत्थरों को इस जटिल और संतुलित ढंग से परस्पर जोड़कर बनाया गया है कि किसी भी हिस्से में थोड़ा-सा फेरबदल करना भी अत्यंत कठिन जान पड़ता है। इसी कारण मंदिर के मूल स्वरूप को समझे बिना किसी नए रास्ते की कल्पना करना संभव नहीं हो सका है।
साल 1962 में लंदन से बुलाए गए थे तकनीकी विशेषज्ञ
मंदिर की जटिल वास्तुकला और दूसरे द्वार की आवश्यकता को परखने के लिए कई बार विख्यात अभियंताओं ने स्थल का मुआयना किया। पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, वर्ष 1962 में जब बिहार और झारखंड संयुक्त राज्य के रूप में थे, उस दौरान तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा ने लंदन से विशेष इंजीनियरों के एक दल को देवघर आमंत्रित किया था। विदेशी विशेषज्ञों के इस दल ने मंदिर के ढांचे का बारीकी से अध्ययन किया और परिसर में एक अतिरिक्त मार्ग निकालने की तमाम वैज्ञानिक संभावनाओं की पड़ताल की। हालांकि, जांच-पड़ताल के बाद वे भी दूसरा रास्ता तैयार करने में सफल नहीं हो सके। विशेषज्ञों और जानकारों का मानना रहा है कि पत्थरों की इस परस्पर जुड़ी संरचना में किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने पर पूरे प्राचीन ढांचे के ढहने या उसे भारी क्षति पहुंचने का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
गर्भगृह के पत्थरों से रिसने वाली नमी और सात फीट चौड़ी नींव
बाबा बैद्यनाथ मंदिर के आंतरिक गर्भगृह से जुड़ा एक अन्य पहलू भी श्रद्धालुओं के बीच गहरे कौतूहल का कारण रहता है। गर्भगृह की दीवारों पर जड़े विशाल शिलाखंड अक्सर तरबतर या नम नजर आते हैं। वहां जाने वाले कई दर्शनार्थियों को ऐसा प्रतीत होता है मानो ठोस पत्थरों से पसीने की तरह पानी की बूंदें बाहर निकल रही हों। इसके अतिरिक्त, मंदिर की विशाल नींव को लेकर भी कई जानकारियां सामने आती रही हैं। प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, इस पूरे पावन भवन का आधार करीब सात फीट चौड़े पाषाण खंडों पर टिका हुआ है। ये भारी शिलाएं भूमि के भीतर कितनी गहराई तक समाई हुई हैं, इसका कोई स्पष्ट और प्रामाणिक ब्योरा आज तक सामने नहीं आ पाया है।
आस्था और प्राचीन भारतीय शिल्पकला का अनूठा संगम
यद्यपि मंदिर के निर्माण और इसकी विशेषताओं से जुड़ी अनेक बातें जनश्रुतियों, धार्मिक विश्वासों और स्थानीय परंपराओं का हिस्सा हैं, फिर भी यह प्राचीन वास्तुकला भक्तों और आगंतुकों को समान रूप से सम्मोहित करती है। बाबा बैद्यनाथ धाम में हर मौसम में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है, जहां वे शिवलिंग पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के साथ-साथ पूर्वजों की इस अद्वितीय और अभेद्य निर्माण कला की भूरि-भूरि प्रशंसा करते नजर आते हैं।



















