पलामू के कृषि क्षेत्र में समय के साथ बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। यहां के किसान अब पारंपरिक फसलों के बजाय आधुनिक तकनीकों को अपनाकर उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव में स्ट्रॉबेरी की खेती एक बेहद लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है, जो ठंड के मौसम में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी भारी मांग के कारण किसानों की किस्मत बदल सकती है। हालांकि, स्ट्रॉबेरी के नाजुक फलों के साथ एक बड़ी समस्या यह होती है कि जब वे सीधे गीली मिट्टी के संपर्क में आते हैं, तो उनमें सड़न, फंगल संक्रमण और गुणवत्ता खराब होने का जोखिम काफी बढ़ जाता है। इस गंभीर समस्या से निपटने और खेती को अधिक मुनाफेदार बनाने के लिए पलामू जिले के कृषि वैज्ञानिक डॉ प्रमोद कुमार ने किसानों के लिए कुछ बेहद उपयोगी और वैज्ञानिक सुझाव साझा किए हैं।
मल्चिंग तकनीक है बेहद जरूरी, पुआल से घटेगी लागत
स्ट्रॉबेरी के फलों को मिट्टी के सीधे संपर्क में आने से बचाने के लिए मल्चिंग तकनीक को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। सरल शब्दों में कहें तो मल्चिंग का अर्थ है पौधों के चारों ओर की खुली मिट्टी को किसी उपयुक्त सामग्री से ढक देना, ताकि फल जमीन को न छुएं। डॉ प्रमोद कुमार के अनुसार, वैज्ञानिक खेती में प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग काफी प्रभावी होता है, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के लिए इसकी शुरुआती लागत अधिक हो सकती है। ऐसे में किसान एक बेहद किफायती और पारंपरिक तरीका अपना सकते हैं। वे अपने खेतों में धान के पुआल या सूखी घास (भूसे) का उपयोग करके बेहद कम खर्च में मल्चिंग का काम पूरा कर सकते हैं। यह प्राकृतिक मल्च न केवल मिट्टी की नमी को लंबे समय तक बनाए रखता है, जिससे बार-बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि यह खेतों में अवांछित खरपतवार उगने की समस्या को भी काफी हद तक नियंत्रित करता है।
अनुकूल जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएं
स्ट्रॉबेरी मूल रूप से ठंडी और समशीतोष्ण जलवायु में पनपने वाली फसल है। इसके पौधों के बेहतर विकास और फलों की अच्छी गुणवत्ता के लिए 15 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। मिट्टी के चयन की बात करें तो इसके लिए हल्की बलुई-दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है, जिसमें प्रचुर मात्रा में जैविक पदार्थ उपलब्ध हों। मिट्टी का pH मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए, जो इस फसल के लिए आदर्श है। इसके अलावा, खेत की तैयारी करते समय जल निकासी की उत्तम व्यवस्था करना अनिवार्य है। यदि खेत में पानी जमा होता है, तो स्ट्रॉबेरी के पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं और पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।
उन्नत किस्में, रोपाई का सही समय और दूरी
बेहतर उत्पादन हासिल करने के लिए किसानों को हमेशा प्रमाणित और रोगमुक्त पौधों का ही चयन करना चाहिए। स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए खेतों में ऊंची क्यारियां (बेड्स) बनाई जानी चाहिए और उन पर ड्रिप सिंचाई प्रणाली के साथ मल्चिंग का उपयोग करना चाहिए। इसकी रोपाई का सबसे अनुकूल समय अक्टूबर से नवंबर के बीच माना जाता है। खेत में रोपाई करते समय पौधों के बीच की दूरी लगभग 30×45 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए, ताकि हर पौधे को फैलने के लिए पर्याप्त जगह और धूप मिल सके। किसान उन्नत किस्मों का चयन कर सकते हैं, जिनमें कैमरोसा, चैंडलर, फेस्टिवल, स्वीट चार्ली और विंटर डॉन जैसी किस्में शामिल हैं, जो पलामू की जलवायु के अनुकूल हैं और बंपर पैदावार देती हैं।
ड्रिप सिंचाई, संतुलित पोषण और 90 प्रतिशत तक सरकारी अनुदान
स्ट्रॉबेरी के पौधों को पानी की सटीक और नियंत्रित मात्रा देने के लिए ड्रिप सिंचाई (टपक सिंचाई) को सबसे उपयोगी माना गया है। इससे पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है और पानी की बर्बादी भी नहीं होती। खाद प्रबंधन के लिए सड़ी हुई गोबर की खाद, केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) और रासायनिक उर्वरकों के रूप में NPK का एक संतुलित अनुपात में इस्तेमाल करना चाहिए। जब पौधों में फूल आने शुरू हों, तब जैविक खाद के साथ-साथ आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व (माइक्रो न्यूट्रिएंट्स) देने से फलों का आकार और चमक बढ़ती है। इस पूरी प्रक्रिया में लागत को कम करने के लिए सरकार की ओर से बड़ी सहायता उपलब्ध है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत स्ट्रॉबेरी की खेती और मल्चिंग के लिए किसानों को 80 से 90 प्रतिशत तक का भारी अनुदान प्रदान किया जाता है। किसानों को इस वित्तीय लाभ को प्राप्त करने के लिए अपने स्थानीय जिले के कृषि या उद्यान विभाग से संपर्क कर वर्तमान में सक्रिय योजनाओं, अपनी पात्रता और आवेदन प्रक्रिया की पूरी जानकारी लेनी चाहिए।



















