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देवघर में मुर्गी पालन से कम खर्च में ऐसे बढ़ाएं कमाई, जानिए सही नस्ल चुनने का तरीकाझारखंड
17 सित॰ 2026, 8:16 am (1 दिन पहले)· 2

देवघर में मुर्गी पालन से कम खर्च में ऐसे बढ़ाएं कमाई, जानिए सही नस्ल चुनने का तरीका

देवघर के ग्रामीण इलाकों में कम लागत के साथ मुर्गी पालन शुरू करने के लिए सही नस्लों का चयन और शुरुआती तौर पर कम संख्या में काम शुरू करना बेहद जरूरी है।

देवघर के ग्रामीण इलाकों में आजकल कई युवा अपने घर के पास ही रहकर खुद का काम शुरू करने की इच्छा रखते हैं। यदि आप भी सीमित बजट में किसी नए काम की तलाश में हैं, तो मुर्गी पालन आपके लिए एक बहुत ही बढ़िया विकल्प साबित हो सकता है। हालांकि इस कारोबार को मैदान में उतारने से पहले यह समझ लेना आवश्यक है कि किस नस्ल का चुनाव किया जाए। सही नस्ल का चयन ही यह तय करता है कि भविष्य में आपको मुनाफा होगा या नुकसान। बाजार में कई प्रजातियों की मुर्गियां मिलती हैं, लेकिन कई बार युवा बिना पूरी जानकारी के बड़ी संख्या में पक्षी ले आते हैं और बाद में बीमारी, अधिक मृत्यु दर और खर्च बढ़ने के कारण मुश्किल में फंस जाते हैं। इसलिए विशेषज्ञों की सलाह यही रहती है कि काम की शुरुआत हमेशा कम संख्या से की जानी चाहिए।

देवघर कृषि विज्ञान केंद्र की पशु चिकित्सक डॉ. पूनम सोरेन के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के जो युवा इस क्षेत्र में उतरना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले देसी मुर्गी पालन से ही शुरुआत करनी चाहिए। विशेषकर देवघर के ग्रामीण तथा आदिवासी अंचलों में घरों के आसपास पाली जाने वाली देसी मुर्गियां बेहद कम खर्च में आसानी से पल जाती हैं। इन पक्षियों में प्राकृतिक रूप से बीमारियों से मुकाबला करने की ताकत काफी अच्छी होती है, जिससे इनके बीमार पड़ने या मरने का खतरा व्यावसायिक नस्लों की तुलना में काफी कम रहता है। इसके अलावा देसी मुर्गी पालन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें शुरुआती लागत ज्यादा नहीं बैठती है। घरों में बचा हुआ भोजन और स्थानीय स्तर पर मिलने वाला दाना इनके आहार के रूप में आसानी से उपयोग किया जा सकता है। बाजार में भी देसी मुर्गी के मांस और अंडों की हमेशा अच्छी मांग बनी रहती है और कई स्थानों पर इनके दाम सामान्य मुर्गियों के मुकाबले बेहतर मिलते हैं।

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डॉ. पूनम सोरेन का यह भी सुझाव है कि नए लोगों को एक साथ भारी संख्या में मुर्गियों को नहीं पालना चाहिए। इसके बजाय शुरुआती दौर में मात्र 10 से 20 देसी मुर्गियों के साथ काम शुरू करना बेहतर रहता है। इससे पक्षियों की देखभाल करने, उन्हें समय पर दाना देने, शेड की साफ-सफाई रखने और बीमारियों से सुरक्षित रखने के तौर-तरीके आसानी से समझ आ जाते हैं। जब काम का पर्याप्त अनुभव हो जाए, तब अपनी वित्तीय क्षमता के आधार पर इनकी संख्या को बढ़ाया जा सकता है। वहीं, जो युवा थोड़े बड़े पैमाने पर इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहते हैं, वे सोनाली, कड़कनाथ, ग्रामप्रिया और बनराजा जैसी लोकप्रिय नस्लों के बारे में भी जानकारी जुटा सकते हैं। इसके साथ ही ब्रायलर मुर्गी पालन भी कम समय में तैयार होकर बिकने के कारण कमाई का एक अच्छा माध्यम बन सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यदि एक हजार ब्रायलर मुर्गियों के बैच में उचित प्रबंधन किया जाए और बाजार भाव अच्छा मिले, तो लगभग 25 हजार से 40 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा आसानी से कमाया जा सकता है।

मुनाफे का पूरा गणित और सावधानी

मुर्गी पालन में होने वाली कुल कमाई पूरी तरह से नस्ल की गुणवत्ता, दाने के खर्च, बीमारियों से बचाव के उपायों, मृत्यु दर, मौजूदा बाजार भाव और काम करने के तरीके पर निर्भर करती है। यही वजह है कि हमेशा छोटे पैमाने से शुरुआत करने, पहले तौर-तरीके सीखने और उसके बाद धीरे-धीरे अपने कारोबार का विस्तार करने की सलाह दी जाती है। यदि पूरी जानकारी और उचित देखभाल के साथ आगे बढ़ा जाए, तो मुर्गी पालन ग्रामीण युवाओं के लिए घर बैठे आत्मनिर्भर बनने का एक मजबूत जरिया बन सकता है।

सवाल-जवाब

मुर्गी पालन की शुरुआत कितने पक्षियों से करनी चाहिए?
नए लोगों को शुरुआत में केवल 10 से 20 देसी मुर्गियों के साथ काम शुरू करने की सलाह दी जाती है।
शुरुआती दौर में कौन सी नस्ल पालना सबसे अच्छा है?
ग्रामीण क्षेत्रों में कम खर्च और अच्छी रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण देसी मुर्गी पालना सबसे बेहतर माना जाता है।
देवघर में यह सलाह किसने दी है?
यह सलाह देवघर कृषि विज्ञान केंद्र की पशु चिकित्सक डॉ. पूनम सोरेन ने दी है।
बड़े स्तर पर कौन सी नस्लें पाली जा सकती हैं?
बड़े स्तर पर सोनाली, कड़कनाथ, ग्रामप्रिया, बनराजा और ब्रायलर नस्लों को पाला जा सकता है।
एक हजार ब्रायलर मुर्गियों से कितना मुनाफा संभव है?
उचित प्रबंधन और अच्छे बाजार भाव रहने पर एक हजार ब्रायलर मुर्गियों से 25 हजार से 40 हजार रुपये तक का मुनाफा हो सकता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·1 दिन पहले

यह रिपोर्ट ग्रामीण आजीविका और सूक्ष्म अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक सटीक मॉडल पेश करती है। हालांकि खबर स्थानीय स्तर पर केंद्रित है, लेकिन अमरीकी कृषि नीति के अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि छोटे पैमाने के ग्रामीण उद्यमों को वित्तीय समावेशन और सही आपूर्ति श्रृंखला से जोड़कर ही दीर्घकालिक स्थिरता हासिल की जा सकती है। शुरुआती दौर में जोखिम कम करने की यह रणनीति नीतिगत स्तर पर भी अनुकरणीय है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

देवघर के ग्रामीण इलाकों में मुर्गी पालन पर आधारित यह रिपोर्ट स्थानीय स्तर पर रोजगार और आजीविका सुदृढ़ करने की दिशा में एक व्यावहारिक शासकीय और आजीविका नीति का परिदृश्य प्रस्तुत करती है। जब ग्रामीण युवा कृषि और पशुपालन जैसे क्षेत्रों में कम लागत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ कदम बढ़ाते हैं, तो यह न केवल पलायन रोकता है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में भी सहायक सिद्ध होता है। भविष्य में इस प्रकार के लघु व्यवसायों के लिए सूक्ष्म वित्तपोषण और स्थानीय बाजार लिंकेज को मजबूत करने की दिशा में नीतिगत प्रयासों की आवश्यकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

यह रिपोर्ट ग्रामीण क्षेत्रों में सूक्ष्म उद्यमों के लिए वित्तीय समावेशन और आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन के महत्व को रेखांकित करती है। जब पशुपालन को स्थानीय स्तर पर कच्चा माल और सही नस्ल चयन का समर्थन मिलता है, तो यह ग्रामीण स्टार्टअप्स के लिए एक स्थिर वित्तीय मॉडल तैयार करता है। इस तरह के छोटे व्यवसायों को डिजिटल भुगतान और पारदर्शी बाजार तक पहुंच से जोड़ा जाए, तो न केवल अनौपचारिक कर्ज के जाल से बचा जा सकता है, बल्कि आर्थिक स्थिरता भी सुनिश्चित होती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

देवघर क्षेत्र में स्वरोजगार और कम लागत वाले ग्रामीण व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिहाज से यह रिपोर्ट व्यावहारिक दिशा दिखाती है। हालांकि, ग्रामीण स्तर पर ऐसे छोटे उद्यमों में अक्सर फिड सिंडिकेट, स्थानीय बिचौलियों और ऋण वसूली से जुड़े छिपे हुए वित्तीय विवाद भी सामने आते हैं। यदि युवा शुरुआती चरण में पशु चिकित्सा और स्थानीय बाजार की माँग का सटीक प्रबंधन नहीं करते हैं, तो लाभ का गणित बिगड़ सकता है। इसलिए शुरुआती 10 से 20 मुर्गियों के प्रयोग के बाद प्रशासनिक और सहकारिता स्तर पर उचित मार्गदर्शन मिलना बेहद जरूरी है, ताकि युवा कर्ज के जाल में न फँसें।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

रोहन वर्मा की पेशेवर टिप्पणी: ग्रामीण स्वरोजगार की यह रिपोर्ट जमीनी हकीकत से जुड़ी है, लेकिन इसमें वित्तीय और विपणन जोखिमों का आकलन भी जरूरी है। देवघर जैसे अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन आधारित आय बढ़ाने के लिए केवल प्रारंभिक नस्ल चयन पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ही शीतकालीन टीकाकरण, स्थानीय बाजार में मूल्य श्रृंखला का विकास और बिचौलियों से बचाव के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए, तभी युवा स्वरोजगार में दीर्घकालिक टिक सकेंगे।

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