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हजारीबाग में पेड़ों को रक्षासूत्र बांधकर जंगल बचाने का संकल्प, दो हजार से ज्यादा गांवों तक फैला जनआंदोलनझारखंड
8 अक्तू॰ 2026, 9:34 pm (1 घंटे पहले)· 0

हजारीबाग में पेड़ों को रक्षासूत्र बांधकर जंगल बचाने का संकल्प, दो हजार से ज्यादा गांवों तक फैला जनआंदोलन

हजारीबाग के दूधमटिया से 1999 में शुरू हुआ वृक्ष रक्षाबंधन अभियान आज 2000 से अधिक गांवों में फैल चुका है, जहां ग्रामीण पेड़ों को राखी बांधकर जंगलों की सुरक्षा करते हैं।

झारखंड के हजारीबाग जिले में जंगलों को बचाने की एक अनूठी जमीनी कोशिश अब विशाल जनांदोलन बन चुकी है। टाटीझरिया प्रखंड स्थित दूधमटिया के जंगलों से शुरू हुई यह पर्यावरण यात्रा आज 2000 से भी ज्यादा गांवों के जनजीवन का अहम हिस्सा बन गई है। जब जंगलों में पेड़ों पर कुल्हाड़ियां बेरोकटोक चल रही थीं, तब स्थानीय स्तर पर उपजी एक सोच ने प्रकृति की हिफाजत का नया रास्ता दिखाया। आज हजारों ग्रामीण संगठित होकर न केवल जंगलों की रखवाली कर रहे हैं, बल्कि हर साल पेड़ों के साथ अपने रिश्ते को नई मजबूती भी दे रहे हैं।

पेड़ों को राखी बांधने की अनूठी शुरुआत

साल 1999 के दौर में हरियाली पर मंडराते संकट को भांपते हुए एक शिक्षक महादेव महतो और उनके साथी शिक्षकों ने आगे आने का फैसला किया। अंधाधुंध कटाई पर अंकुश लगाने के इरादे से उन्होंने वृक्ष रक्षाबंधन का विचार सामने रखा। शुरुआत में गांव-गांव घूमकर पारंपरिक गीतों और संवाद के जरिए लोगों को समझाया गया कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि जीवन की बुनियाद हैं। ग्रामीणों को प्रेरित किया गया कि वे पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधें और किसी भी सूरत में अवैध कटाई न होने देने की कसम खाएं। धीरे-धीरे लोगों की हिचक टूटी और यह भावनात्मक पहल दूधमटिया की सीमाओं को लांघकर आसपास के कई इलाकों में गूंजने लगी।

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आस्था और पर्यावरण का गहरा मेल

इस पूरे प्रयास की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि इसमें वन संपदा की हिफाजत को स्थानीय लोक आस्था से सीधे जोड़ दिया गया। हर वर्ष 7 अक्टूबर की तारीख तय कर दूधमटिया के जंगलों में भव्य वन महोत्सव की परंपरा डाली गई। इस आयोजन का आगाज वन देवी की पारंपरिक विधियों से पूजा-अर्चना के साथ किया जाता है। ग्रामीणों का गहरा विश्वास है कि वन देवी ही इस समूचे वन क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों की संरक्षिका हैं, लिहाजा उन संसाधनों को महफूज रखना हर गांववासी का बुनियादी धर्म है। पूजा संपन्न होते ही लोग पेड़ों के तनों पर रक्षासूत्र बांधते हैं और जंगलों को नुकसान न पहुंचने देने का सामूहिक संकल्प दोहराते हैं। आस्था के इस जुड़ाव ने लकड़ी माफिया और अवैध कटाई पर बेहद कड़ा पहरा बिठा दिया है।

जागरूकता के लिए जुटते हैं कई संगठन

दूधमटिया का यह जंगल अपनी हरी-भरी वादियों और नैसर्गिक सौंदर्य के लिए भी खास पहचान रखता है। सालाना वन महोत्सव के मौके पर यहां पर्यावरण प्रेमियों, स्कूली छात्रों और ग्रामीणों का भारी जमावड़ा जुटता है। इस दौरान वन विभाग के साथ-साथ कई सामाजिक संस्थाएं और स्थानीय स्कूल मिलकर ज्ञानवर्धक स्टॉल लगाते हैं। इन स्टॉलों पर आने वाले लोगों को नए पौधे रोपने, मौजूदा वनों की सार-संभाल करने और संतुलित पर्यावरण के लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है। संवाद और प्रदर्शनी के इस संगम से नई पीढ़ी में भी वनों के प्रति स्वाभाविक लगाव पनप रहा है।

प्रशासनिक सराहना और भविष्य की राह

आयोजन के महत्व को देखते हुए राज्य स्तर के अधिकारी भी इस जमीनी मुहिम की हौसलाअफजाई के लिए पहुंचे। रांची से आए झारखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार ने इस व्यापक जनभागीदारी को देखा और उसकी भरपूर प्रशंसा की। उन्होंने रेखांकित किया कि जब तक जंगल और वनस्पति फलते-फूलते रहेंगे, तभी तक मानव समाज का अस्तित्व भी सुरक्षित रह सकता है। दो दशकों से अधिक समय पहले एक शिक्षक द्वारा जलाई गई यह छोटी सी मशाल आज वन विभाग और संरक्षण कार्यकर्ताओं के लिए एक आदर्श मिसाल बन चुकी है, जो बताती है कि समुदाय की सीधी भागीदारी से कैसे प्राकृतिक धरोहरों को बचाया जा सकता है।

सवाल-जवाब

वृक्ष रक्षाबंधन अभियान की शुरुआत कब और किसने की थी?
इस अभियान की शुरुआत वर्ष 1999 में शिक्षक महादेव महतो ने अपने शिक्षक साथियों के साथ मिलकर की थी।
यह पहल झारखंड के किस क्षेत्र से शुरू हुई थी?
यह पहल हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड स्थित दूधमटिया जंगल से शुरू हुई थी।
दूधमटिया वन महोत्सव हर साल किस तारीख को आयोजित होता है?
यह वन महोत्सव प्रत्येक वर्ष 7 अक्टूबर को दूधमटिया के जंगलों में आयोजित किया जाता है।
वर्तमान में यह अभियान कितने गांवों तक पहुंच चुका है?
वृक्ष रक्षाबंधन का यह अभियान अब तक 2000 से भी अधिक गांवों तक फैल चुका है।
इस वन महोत्सव के दौरान कौन सी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है?
महोत्सव की शुरुआत वन देवी की पूजा-अर्चना के साथ होती है, जिसके बाद ग्रामीण पेड़ों पर रक्षासूत्र बांधते हैं।
इस वर्ष के आयोजन में कौन से वरिष्ठ वन अधिकारी शामिल हुए?
इस वर्ष रांची से झारखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार कार्यक्रम में शामिल होने दूधमटिया पहुंचे थे।
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टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·23 मिनट पहले

1999 से चल रही इस मुहिम को अब दो हज़ार से ज़्यादा गांवों का साथ मिल चुका है, जो वाकई कमाल की बात है। लेकिन क्या कभी राजनीतिक दलों या स्थानीय प्रशासन ने इस आंदोलन को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की?

Ravikash Gupta@ravikash·22 मिनट पहले

अर्जुन जी, आपकी शंका जायज है। जब किसी जन आंदोलन से इतने लोग जुड़ जाते हैं, तो नेता और प्रशासन अपनी रोटियां सेकने पहुंच ही जाते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·46 मिनट पहले

पेड़ों को राखी बांधने का आइडिया वाकई कमाल का है। जब आस्था और कानून दोनों मिल जाते हैं, तो लकड़ी माफियाओं की हिम्मत अपने आप टूट जाती है।

Rohan Verma@rohan-verma·46 मिनट पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा आपने! जब लोग खुद जुड़ जाते हैं तो माफिया का टिकना मुश्किल हो जाता है।

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