झारखंड के हजारीबाग जिले में जंगलों को बचाने की एक अनूठी जमीनी कोशिश अब विशाल जनांदोलन बन चुकी है। टाटीझरिया प्रखंड स्थित दूधमटिया के जंगलों से शुरू हुई यह पर्यावरण यात्रा आज 2000 से भी ज्यादा गांवों के जनजीवन का अहम हिस्सा बन गई है। जब जंगलों में पेड़ों पर कुल्हाड़ियां बेरोकटोक चल रही थीं, तब स्थानीय स्तर पर उपजी एक सोच ने प्रकृति की हिफाजत का नया रास्ता दिखाया। आज हजारों ग्रामीण संगठित होकर न केवल जंगलों की रखवाली कर रहे हैं, बल्कि हर साल पेड़ों के साथ अपने रिश्ते को नई मजबूती भी दे रहे हैं।
पेड़ों को राखी बांधने की अनूठी शुरुआत
साल 1999 के दौर में हरियाली पर मंडराते संकट को भांपते हुए एक शिक्षक महादेव महतो और उनके साथी शिक्षकों ने आगे आने का फैसला किया। अंधाधुंध कटाई पर अंकुश लगाने के इरादे से उन्होंने वृक्ष रक्षाबंधन का विचार सामने रखा। शुरुआत में गांव-गांव घूमकर पारंपरिक गीतों और संवाद के जरिए लोगों को समझाया गया कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि जीवन की बुनियाद हैं। ग्रामीणों को प्रेरित किया गया कि वे पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधें और किसी भी सूरत में अवैध कटाई न होने देने की कसम खाएं। धीरे-धीरे लोगों की हिचक टूटी और यह भावनात्मक पहल दूधमटिया की सीमाओं को लांघकर आसपास के कई इलाकों में गूंजने लगी।
आस्था और पर्यावरण का गहरा मेल
इस पूरे प्रयास की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि इसमें वन संपदा की हिफाजत को स्थानीय लोक आस्था से सीधे जोड़ दिया गया। हर वर्ष 7 अक्टूबर की तारीख तय कर दूधमटिया के जंगलों में भव्य वन महोत्सव की परंपरा डाली गई। इस आयोजन का आगाज वन देवी की पारंपरिक विधियों से पूजा-अर्चना के साथ किया जाता है। ग्रामीणों का गहरा विश्वास है कि वन देवी ही इस समूचे वन क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों की संरक्षिका हैं, लिहाजा उन संसाधनों को महफूज रखना हर गांववासी का बुनियादी धर्म है। पूजा संपन्न होते ही लोग पेड़ों के तनों पर रक्षासूत्र बांधते हैं और जंगलों को नुकसान न पहुंचने देने का सामूहिक संकल्प दोहराते हैं। आस्था के इस जुड़ाव ने लकड़ी माफिया और अवैध कटाई पर बेहद कड़ा पहरा बिठा दिया है।
जागरूकता के लिए जुटते हैं कई संगठन
दूधमटिया का यह जंगल अपनी हरी-भरी वादियों और नैसर्गिक सौंदर्य के लिए भी खास पहचान रखता है। सालाना वन महोत्सव के मौके पर यहां पर्यावरण प्रेमियों, स्कूली छात्रों और ग्रामीणों का भारी जमावड़ा जुटता है। इस दौरान वन विभाग के साथ-साथ कई सामाजिक संस्थाएं और स्थानीय स्कूल मिलकर ज्ञानवर्धक स्टॉल लगाते हैं। इन स्टॉलों पर आने वाले लोगों को नए पौधे रोपने, मौजूदा वनों की सार-संभाल करने और संतुलित पर्यावरण के लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है। संवाद और प्रदर्शनी के इस संगम से नई पीढ़ी में भी वनों के प्रति स्वाभाविक लगाव पनप रहा है।
प्रशासनिक सराहना और भविष्य की राह
आयोजन के महत्व को देखते हुए राज्य स्तर के अधिकारी भी इस जमीनी मुहिम की हौसलाअफजाई के लिए पहुंचे। रांची से आए झारखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार ने इस व्यापक जनभागीदारी को देखा और उसकी भरपूर प्रशंसा की। उन्होंने रेखांकित किया कि जब तक जंगल और वनस्पति फलते-फूलते रहेंगे, तभी तक मानव समाज का अस्तित्व भी सुरक्षित रह सकता है। दो दशकों से अधिक समय पहले एक शिक्षक द्वारा जलाई गई यह छोटी सी मशाल आज वन विभाग और संरक्षण कार्यकर्ताओं के लिए एक आदर्श मिसाल बन चुकी है, जो बताती है कि समुदाय की सीधी भागीदारी से कैसे प्राकृतिक धरोहरों को बचाया जा सकता है।























