झारखंड की सियासत में लंबे समय तक केंद्र बिंदु रहे शिबू सोरेन के जनआंदोलनों और संघर्षों के पीछे एक ऐसा मजबूत संबल भी हमेशा मौजूद रहा, जिसने विपरीत परिस्थितियों में कभी हिम्मत नहीं हारी। शिबू सोरेन की जीवनसंगिनी रूपी सोरेन इस वक्त जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही हैं। रांची के हिल व्यू हॉस्पिटल में उनका गहन उपचार चल रहा है, जहां वे पिछले 19 दिनों से भर्ती हैं। चिकित्सकों ने उनकी नाजुक स्थिति को देखते हुए उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा हुआ है। बुधवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी मां के स्वास्थ्य का जायजा लेने अस्पताल पहुंचे। वहां उन्होंने उपचार में जुटे चिकित्सकों से चिकित्सीय स्थिति की विस्तृत जानकारी हासिल की। इस दौरान झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के कई प्रमुख पदाधिकारी, मंत्री योगेंद्र प्रसाद तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामेश्वर उरांव भी अस्पताल में मौजूद रहे। इसके अलावा रांची के प्रतिष्ठित न्यूरो मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. उज्जवल राय को भी विशेष परामर्श और जांच के लिए अस्पताल बुलाया गया।
अस्पताल के आईसीयू वार्ड में जहां एक तरफ उनके परिजन, समर्थक और शुभचिंतक उनके शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रूपी सोरेन के उस जुझारू व्यक्तित्व की चर्चा भी हर जुबान पर है, जिसने दशकों पहले महाजनों के आतंक, पुलिसिया दबाव और घोर अभावों का डटकर मुकाबला किया था। शिबू सोरेन जब जंगलों में रहकर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे या जेल में बंद थे, तब घर की चारदीवारी से लेकर खेतों तक की रक्षा का जिम्मा रूपी सोरेन ने अकेले उठाया था। वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा के साथ पूर्व में हुई एक बातचीत के दौरान उन्होंने अपने जीवन के कई अनसुने और प्रेरक प्रसंग साझा किए थे।
जब खेत हड़पने पहुंचे सूदखोर को हसुआ लेकर खदेड़ दिया
नेमरा गांव में जब महाजनों और साहूकारों का आतंक चरम पर था, तब की एक घटना रूपी सोरेन के अदम्य साहस को बखूबी बयां करती है। उस समय शिबू सोरेन जेल की सलाखों के पीछे थे और घर की पूरी जिम्मेदारी रूपी सोरेन के कंधों पर थी। उसी दौरान बिष्टु साव नामक एक दबंग महाजन कुछ लोगों को साथ लेकर उनके पुश्तैनी खेत पर पहुंच गया और जबरन हल चलाकर जमीन जोतने लगा। रूपी सोरेन को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने पहले शांत रहकर विरोध जताया, लेकिन जब महाजन अपनी मनमानी से पीछे नहीं हटा तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के धान काटने वाला हसुआ उठा लिया।
गुस्से से भरी रूपी सोरेन हाथ में हसुआ लिए सीधे खेत की ओर दौड़ीं और महाजन को मौके पर ही धर दबोचा। हाथापाई के दौरान उन्होंने उस दबंग के कपड़े तक फाड़ डाले। इसके बाद उन्होंने पास ही मौजूद अपनी ननद को पुकारते हुए कहा कि इसे मजबूती से पकड़ो, इसके बाल काटकर आज इसे टकला करना है। इसके बाद दोनों महिलाओं ने मिलकर उस सूदखोर की जमकर खबर ली। महिलाओं के इस अप्रत्याशित और आक्रामक रूप से घबराकर वह महाजन जान बचाकर वहां से भाग खड़ा हुआ और फिर कभी उसने उस खेत की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं जुटाई। यह महज एक जमीन विवाद को सुलझाने का मामला नहीं था, बल्कि उस दौर में अपने स्वाभिमान और हक की रक्षा के लिए एक अकेली महिला के संघर्ष की मिसाल थी।
ताकतवर लोगों से झुकने के बजाय दो टूक जवाब
इस टकराव के बाद परिवार के ही एक बुजुर्ग चाचा ने रूपी सोरेन को समझाने का प्रयास किया था कि सामने वाले लोग पैसे और रुतबे के मामले में काफी ताकतवर हैं, इसलिए उनके साथ बैर मोल लेना या उलझना खतरे से खाली नहीं होगा। लेकिन रूपी सोरेन किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं थीं। उन्होंने चाचा को सीधा और दो टूक जवाब दिया कि जब हमारी अपनी जमीन पर खुलेआम डाका डाला जा रहा है, तो आप हमलावर का पक्ष क्यों ले रहे हैं।
उन्होंने अपने चाचा से दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे इस मामले से पूरी तरह दूर रहें, क्योंकि इस संकट से वे खुद अकेले निपटने में सक्षम हैं। यही बेबाक और निडर अंदाज उनके पूरे जीवन की पहचान बन गया। उस दौर में शिबू सोरेन जनआंदोलनों की अगुवाई कर रहे थे, पुलिस प्रशासन लगातार उनके पीछे पड़ा हुआ था और परिवार पर चौतरफा संकट था। ऐसी विकट घड़ी में घर के भीतर और बाहर हर मोर्चे पर रूपी सोरेन एक मजबूत ढाल बनकर खड़ी रहीं।
पुलिस के तीखे सवालों पर कहा था- यह मेरा घर है
साल 1970 के आसपास जब शिबू सोरेन पुलिसिया कार्रवाई से बचने के लिए भूमिगत होकर आंदोलन चला रहे थे, तब प्रशासन का पूरा दबाव उनके परिवार को निशाना बना रहा था। पुलिस की गाड़ियां आए दिन उनके घर का घेराव करती थीं और परिजनों से तीखे सवाल पूछे जाते थे। ऐसे ही एक वाकये के दौरान जब पुलिसकर्मियों ने घर में घुसकर लगातार उनसे शिबू सोरेन के बारे में पूछताछ शुरू की, तो रूपी सोरेन जरा भी नहीं घबराईं।
उन्होंने पुलिसकर्मियों की आंखों में आंखें डालकर साफ कह दिया कि यह शिबू सोरेन का ठिकाना नहीं है, बल्कि यह रूपी सोरेन का घर है। उन्होंने दो टूक कहा कि शिबू सोरेन यहां नहीं आते, वे जहां कहीं भी हों, आप उन्हें वहीं जाकर खोजें। घोर संकट और कानूनी दबाव के उस माहौल में उनका यह जवाब उनके असाधारण आत्मविश्वास और बेबाक चरित्र को प्रमाणित करता है।
गोद में मासूम बेटे को लेकर घने जंगलों में शिबू सोरेन की खोज
फरारी के दिनों में शिबू सोरेन टुंडी और उसके आसपास के घने जंगलों तथा बीहड़ पहाड़ों में शरण लिए हुए थे। उस दौरान हफ्तों तक परिवार का उनसे कोई संपर्क नहीं हो पाता था और न ही उनकी कोई खैरियत मिल पाती थी। एक बार जब लंबे समय तक कोई सूचना नहीं मिली, तो रूपी सोरेन इतनी ज्यादा व्याकुल हो गईं कि उन्होंने खुद घने जंगलों में जाकर शिबू सोरेन को तलाशने का फैसला कर लिया।
अपनी सास और ननद को साथ लेकर वे बीहड़ों की ओर निकल पड़ीं। उस समय उनकी गोद में उनका छोटा बेटा दुर्गा सोरेन था। कड़कड़ाती धूप और दुर्गम रास्तों के बीच तीनों महिलाएं नन्हे बच्चे को साथ लिए जंगलों और पहाड़ों की खाक छानती रहीं। यह उनके पारिवारिक जीवन का सबसे कष्टकारी और परीक्षा की घड़ी वाला समय था, जहां एक तरफ पति आंदोलन में भूमिगत थे और दूसरी तरफ पुलिस की कड़ी निगरानी के बीच पूरा घर संभालना था। उस कठिन दौर में उनकी ननद साये की तरह उनके साथ डटी रहीं।
शादी के बाद पति जेल में, मायके से पैसे जुटाकर कराई रिहाई
रूपी सोरेन के जीवन में संघर्षों की शुरुआत उनके विवाह के तुरंत बाद ही हो गई थी। शादी के कुछ ही दिनों के भीतर शिबू सोरेन को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें हजारीबाग जेल भेज दिया गया। उस समय रूपी सोरेन नई-नवेली दुल्हन थीं, परिवार में कोई बच्चा नहीं था और आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि पति की कानूनी जमानत या रिहाई के लिए उनके पास एक पैसा भी नहीं बचा था। गांव में वे बिल्कुल अकेली और असहाय महसूस कर रही थीं।
गंभीर चिंतन के बाद उन्होंने गांव के ही एक परिचित व्यक्ति से संपर्क किया और उनसे मदद की गुहार लगाई। उन्होंने उस व्यक्ति से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि आपका अपना बेटा भी जेल में रह चुका है, इसलिए आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि ऐसे वक्त में परिवार पर क्या बीतती है। उन्होंने उनसे आग्रह किया कि या तो वे कुछ रकम उधार दे दें या फिर कम से कम चांडिल तक जाने का बस किराया दे दें। किसी तरह किराए का प्रबंध कर वे अपने मायके चांडिल पहुंचीं और अपने पिता के सामने सारी बात रखकर पति को जेल से बाहर निकालने की गुहार लगाई।
उनके पिता ने कुछ समय लेकर किसी तरह आवश्यक धन का इंतजाम किया। इसके बाद रूपी सोरेन अपने पिता के साथ सीधे हजारीबाग जेल पहुंचीं और तमाम कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा कर शिबू सोरेन को रिहा कराकर वापस नेमरा गांव लेकर आईं। जेल से रिहाई के वक्त शिबू सोरेन का स्वास्थ्य बेहद खराब था और वे शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो चुके थे। नेमरा में रहकर रूपी सोरेन ने दिन-रात उनकी सेवा की और धीरे-धीरे उन्हें स्वस्थ किया। इस कठिन दौर को याद करते हुए रूपी सोरेन ने कहा था कि आज भी जब वे उन पुराने पलों को याद करती हैं, तो उनकी रूह कांप उठती है। वही रूपी सोरेन आज रांची के अस्पताल में अपनी जिंदगी की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रही हैं।



















