शहरी इलाकों में जहां लोग राशन और रोजमर्रा के सामान के लिए सुपरमार्केट, बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर या फिर मोबाइल फोन पर ऑनलाइन डिलीवरी का रुख करते हैं, वहीं ग्रामीण भारत में खरीदारी की पारंपरिक संस्कृति आज भी पूरी मजबूती से कायम है। झारखंड के देहाती इलाकों में साप्ताहिक हाट की रौनक आज भी वैसी ही बनी हुई है, जहां कम आय वाले परिवारों और ग्रामीणों को बहुत किफायती दामों पर दैनिक जरूरत का सामान मिल जाता है। जमशेदपुर से तकरीबन 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मिर्जाहड़ी गांव में हर हफ्ते लगने वाले ग्रामीण बाजार में ऐसी ही एक अनोखी व्यवस्था देखने को मिलती है, जो आधुनिक दौर में भी आम लोगों के लिए बेहद मददगार साबित हो रही है।
जमीन पर चटाई बिछाकर सजती है राशन की पूरी दुकान
मिर्जाहड़ी के इस साप्ताहिक बाजार का मुख्य आकर्षण ईशान दत्त द्वारा संचालित राशन की दुकान है। किसी पक्के ढांचे, काउंटर या आलमारी के बजाय ईशान दत्त जमीन पर एक खास तरह की चटाई बिछाते हैं और उसी के ऊपर अपनी पूरी दुकान करीने से सजा देते हैं। इस चटाई पर रोजमर्रा के भोजन में काम आने वाली दाल, चावल, सोयाबीन, तरह-तरह के मसाले, खाना पकाने का तेल और नहाने-धोने का साबुन छोटी-छोटी मात्रा में सजाकर रखा जाता है। खुले फर्श पर सजी इस दुकान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां आने वाले खरीदार पर बड़े पैकेट या तय वजन खरीदने का कोई दबाव नहीं होता, बल्कि वह अपनी जेब और तात्कालिक जरूरत के मुताबिक मनचाही मात्रा में सामग्री खरीद सकता है।
10 और 20 रुपये के छोटे पैकेट में उपलब्ध हैं मसाले और अनाज
दुकानदार ईशान दत्त के अनुसार, यहां आने वाले ग्राहकों की क्रय शक्ति को ध्यान में रखते हुए मसालों और अनाजों की बेहद छोटी पैकिंग तैयार की जाती है। महज 10 रुपये में कटोरी भरकर ताजा मसाला दिया जाता है, जिसमें रोज के खाने में इस्तेमाल होने वाली हल्दी, जीरा, गोलकी (काली मिर्च), अदरक और लहसुन जैसी सभी जरूरी चीजें शामिल रहती हैं। इसके अलावा दाल, चावल और सोयाबीन को भी 10 रुपये और 20 रुपये की छोटी प्लास्टिक थैलियों में पैक करके बेचा जाता है। इस बाजार की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां बिकने वाली अधिकांश कृषि उपज और खाद्यान्न सीधे स्थानीय किसानों और ग्रामीणों के जरिए पहुंचते हैं, जिससे बिचौलियों का खर्च बचता है और खरीदारों को सामान काफी कम दाम में मिल जाता है।
चाकुलिया का काला साबुन और कम बजट में पूरा राशन
मिर्जाहड़ी के इस हाट में चाकुलिया का मशहूर काला साबुन भी ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय है और लोग इसे बड़े चाव से खरीदते हैं। इसके साथ ही छोटे पाउच और शीशियों में खाद्य तेल तथा रोजमर्रा के इस्तेमाल की दूसरी जरूरी वस्तुएं भी यहां आसानी से मिल जाती हैं। ईशान दत्त बताते हैं कि सीमित आय वाले कई परिवार यहां केवल 100 रुपये खर्च करके इतना सारा सामान जुटा लेते हैं, जिससे उनके घर का काम कई दिनों तक बिना किसी परेशानी के चल जाता है। इसी सहूलियत के चलते सिर्फ मिर्जाहड़ी ही नहीं, बल्कि आसपास के कई गांवों और यहां तक कि जमशेदपुर शहर से भी लोग इस साप्ताहिक हाट में खरीदारी करने पहुंचते हैं। ग्राहकों का यह भी मानना है कि यहां मिलने वाला राशन फैक्ट्रियों की अत्यधिक पॉलिशिंग और रासायनिक प्रोसेसिंग से मुक्त रहता है, जिस वजह से यह ज्यादा शुद्ध, देसी और भरोसेमंद लगता है।
मॉल और ऑनलाइन डिलीवरी के दौर में जीवंत पारंपरिक बाजार
आजकल जब बड़े शहरों में चमचमाते शॉपिंग मॉल, बड़े रिटेल चेन और 10 मिनट में घर पहुंचने वाली त्वरित ऑनलाइन किराना सेवाएं तेजी से पैर पसार रही हैं, तब मिर्जाहड़ी का यह साप्ताहिक बाजार ग्रामीण भारत की पारंपरिक खरीदारी व्यवस्था को जिंदा रखे हुए है। जमीन पर चटाई बिछाकर लगाई जाने वाली यह छोटी सी दुकान देखने में भले ही बेहद सादी और साधारण प्रतीत हो, लेकिन यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसकी जरूरत और बजट के मुताबिक जरूरी खाद्य सामग्री पहुंचाकर एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक सहारा बनी हुई है।





















