हम जब भी राजमार्गों पर सफर करते हैं, तो बड़े-बड़े ट्रक, लॉरी और भारी-भरकम ट्रेलर हमारी नजरों के सामने आते हैं। इन विशाल वाहनों को देखकर शायद ही कभी हमारे मन में यह सवाल आता होगा कि इन्हें हजारों किलोमीटर तक चलाने वाले ड्राइवरों की निजी जिंदगी कैसी होती है। उनके लिए सड़क महज एक आवागमन का माध्यम नहीं है, बल्कि उनकी पूरी जिंदगी का एक अभिन्न और सबसे बड़ा हिस्सा बन जाती है। घर-परिवार से मीलों दूर रहकर दिन-रात पहिया घुमाना, तय समय सीमा के भीतर माल को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाना और अपनों की महक से महरूम रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। इसी संघर्ष और जीवटता की एक बानगी जमशेदपुर में देखने को मिली, जहां हिमाचल प्रदेश के रहने वाले सेंधा पाजी से मुलाकात हुई जो पिछले 26 सालों से लगातार ट्रक चलाने का काम कर रहे हैं।
महीनों तक नहीं हो पाता घर का दीदार
सेंधा पाजी ने अपने लंबे और कठिन सफर के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कई बार उन्हें लगातार तीन महीने तक अपने पैतृक घर जाने का अवसर ही नहीं मिल पाता है। इतने लंबे समयांतराल तक अपने जीवनसाथी, माता-पिता और बच्चों की सूरत देखना मुमकिन नहीं हो पाता। जहां आम कामकाजी लोग दिनभर की भागदौड़ के बाद हर शाम अपने घर लौटते हैं और परिवार के साथ सुकून के पल बिताते हैं, वहीं ट्रक ड्राइवरों के लिए घर की वापसी किसी लंबे और अनिश्चित इंतजार से कम नहीं होती। बच्चों से मिलना, उनके साथ बैठकर भोजन करना और अपनों की छांव में कुछ पल बिताना उनके लिए किसी उत्सव जैसा होता है। इन अनमोल पलों को जीने के लिए भी उन्हें कई बार महीनों का कड़ा इंतजार करना पड़ता है और तब जाकर परिवार का साथ नसीब होता है।
ट्रक का केबिन ही है रसोई और भंडार
सेंधा पाजी ने अपने वाहन का मुआयना कराते हुए दिखाया कि किस तरह एक बेहद सीमित और छोटे से केबिन में उनकी पूरी दुनिया सिमटी हुई है। उन्होंने ट्रक के भीतर ही एक छोटी-सी रसोई का इंतजाम कर रखा है। जैसे ही उन्होंने उसका ताला खोला, अंदर पारंपरिक चूल्हा, खाना पकाने के तमाम बर्तन, दैनिक जरूरत का राशन, दूध और रोजमर्रा के उपयोग का अन्य सामान करीने से रखा हुआ नजर आया। इसका साफ मतलब है कि हाईवे की लंबी पटरियों पर सफर करते हुए भी वे अपने खाने-पीने का प्रबंध खुद ही करते हैं। देश के अलग-अलग कोनों की लंबी यात्राओं के दौरान यही छोटा-सा केबिन उनके लिए किसी आधुनिक घर की रसोई से कम नहीं साबित होता है।
सड़क किनारे बस्ता है चलता-फिरता बेडरूम
रसोई के अलावा उन्होंने केबिन के उस हिस्से को भी दिखाया जहां उनके सोने और विश्राम करने की व्यवस्था होती है। ड्राइवर की सीट के ठीक पीछे सोने के लिए गद्देदार बिस्तर, गर्म कंबल और रजाई करीने से रखी गई थी। बाहर से देखने पर भले ही यह ट्रक केवल लोहे का एक भारी और खुरदरा वाहन प्रतीत होता हो, लेकिन इसके अंदर एक मुसाफिर की जरूरत का सारा सामान मौजूद रहता है। कभी यही तंग केबिन उनका आरामदायक बेडरूम बन जाता है, तो कभी थका देने वाले सफर के बाद उनकी थकान मिटाने का एकमात्र ठिकाना बन जाता है। रात के वक्त किसी सुनसान सड़क किनारे या ढाबे के पास ट्रक को पार्क करके कुछ घंटे सोना और फिर अगली सुबह तड़के एक नए सफर के लिए निकल पड़ना उनकी जिंदगी का रोज का नियम है।
लोहे और सरिया की ढुलाई के साथ अनगिनत चुनौतियां
सेंधा पाजी ने जानकारी दी कि वे अमूनन भारी लोहे और सरिया की ढुलाई का काम संभालते हैं। उनका यह भारी ट्रक पंजाब से लेकर झारखंड तक के लंबे और दुर्गम रूट पर निरंतर दौड़ता रहता है। इस पेशे में समय की बेहद पाबंदी होती है, लंबा सफर तय करना पड़ता है, सड़कों के खतरनाक मोड़ और हालात से जूझना होता है और हर पल अत्यधिक सतर्कता बरतनी अनिवार्य होती है। कई बार कड़ाके की सर्दी, भीषण गर्मी, मूसलाधार बारिश, भारी ट्रैफिक और रास्ते की अन्य अड़चनों के बावजूद उन्हें अपना सफर बिना रुके जारी रखना पड़ता है। इन तमाम भौतिक और मानसिक मुश्किलों के बीच भी उनके लिए सबसे बड़ी और टीस देने वाली चुनौती अपने परिवार से मीलों दूर रहना ही होती है।
डिजिटल स्क्रीन पर अपनों का चेहरा तलाशते कदम
उन्होंने बताया कि आज के दौर में स्मार्टफोन और वीडियो कॉल ही उनके लिए परिवार से भावनात्मक रूप से जुड़े रहने का सबसे बड़ा और एकमात्र सहारा बचे हैं। मोबाइल की छोटी सी स्क्रीन पर अपने बच्चों और जीवनसाथी का मुस्कुराता चेहरा देखकर मन को कुछ पल के लिए सांत्वना मिल जाती है। हालांकि, तकनीकी रूप से वीडियो कॉल पर दिखने वाला अपनों का यह अक्स कभी भी हकीकत में उनके पास बैठकर बात करने या आत्मीय स्पर्श का अहसास नहीं करा सकता। चाहे घर में कोई प्रमुख त्योहार हो, पारिवारिक अनुष्ठान हो या कोई अन्य खुशी का मौका, कई बार काम की अनिवार्यताओं के चलते वे अपने लोगों के बीच मौजूद नहीं रह पाते हैं और दूर से ही औपचारिकता निभाते हैं।
देशभर के ट्रक ड्राइवरों के संघर्ष की कहानी
सेंधा पाजी की यह दास्तान देश के उन लाखों गुमनाम ट्रक चालकों के जीवन की एक सजीव और मार्मिक झलक प्रस्तुत करती है, जो हमारी बुनियादी और रोजमर्रा की जरूरतों के सामान को एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचाते हैं। जब भी हम एक्सप्रेसवे या शहर की सड़कों से गुजरते हुए किसी भारी ट्रक को सरपट भागते देखते हैं, तो हमारी नजरों में वह सिर्फ एक वाहन होता है। लेकिन उस लोहे के केबिन के भीतर किसी इंसान का एक छोटा-सा संसार आबाद होता है, जिसमें तमाम जिम्मेदारियां हैं, परिवार की मीठी-खट्टी यादें हैं और घर वापसी का अटूट इंतजार भी शामिल है। उनकी यह जीवनशैली हमें बार-बार इस सच्चाई से रूबरू कराती है कि हमारे आरामदायक जीवन और जरूरतों को पूरा करने के लिए समाज के कई हिस्से अपनी खुशियों की आहुति देकर लगातार पसीना बहा रहे हैं।
























