देवघर में धीरे-धीरे गुलाबी ठंड की दस्तक के साथ ही खेतों और घरेलू बगीचों में हरी-हरी सब्जियों की खेती का दौर जोरों पर शुरू हो चुका है। इस मौसम में किसान बड़े पैमाने पर गोभी, टमाटर, बैंगन और मिर्च जैसी प्रमुख सब्जियों की खेती करते हैं। कई किसानों ने अपने खेतों में फसल के पौधे लगा दिए हैं, जबकि कई अन्य किसान अभी अपनी खेती की तैयारियों में जुटे हुए हैं। हालांकि, इन सब्जियों की खेती करने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तब उत्पन्न होती है, जब पौधों में कीड़े लगने की समस्या शुरू हो जाती है।
खेती की शुरुआती अवस्था में कई किसान इन कीड़ों को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे ये कीट पौधों की पत्तियों और उनके कोमल हिस्सों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाने लगते हैं। इसके परिणाम स्वरूप पौधों की बढ़वार अचानक रुक जाती है और कई बार पौधे सूखकर नष्ट भी होने लगते हैं। इस प्रकार की कीट समस्या का सीधा और बुरा असर सब्जियों की कुल पैदावार पर पड़ता है, जिसके कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है।
अपनी फसलों को इन हानिकारक कीड़ों से बचाने के लिए किसान अक्सर बाजार से महंगे रासायनिक कीटनाशक खरीदकर उनका छिड़काव करते हैं। इस प्रक्रिया से खेती की लागत में भी काफी बढ़ोतरी हो जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि घर के आसपास आसानी से मिलने वाली सामान्य चीजों की मदद से एक असरदार देसी घोल तैयार किया जा सकता है। देवघर के कृषि विशेषज्ञ वकील यादव के अनुसार, किसान अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए जीवामृत, घनजीवामृत, ब्रह्मास्त्र और नीमास्त्र जैसे पारंपरिक और देसी जैविक घोलों का बेहद प्रभावी तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं।
इन सभी देसी घोलों को तैयार करने में गाय के गोबर, गोमूत्र, ताजी नीम की पत्तियों और रसोई घर से निकलने वाले जैविक कचरे जैसी सामान्य चीजों का मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है। यदि इन्हें पूरी सावधानी और सही विधि से तैयार किया जाए, तो इनका उपयोग खेती की मिट्टी की सेहत को सुधारने के साथ-साथ कुछ खास प्रकार के कीटों के प्रबंधन में भी बहुत मदद कर सकता है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर एक घोल का काम अलग होता है, इसलिए इनका प्रयोग फसल में लगने वाले कीड़े के प्रकार के हिसाब से ही किया जाना चाहिए।
मिट्टी भी रहेगी सेहतमंद और उत्पादन भी होगा बंपर
कृषि विशेषज्ञ वकील यादव के मुताबिक, खेती में पूरी तरह से देसी और जैविक तरीकों को अपनाकर किसान रासायनिक इनपुट पर होने वाले अपने खर्च को काफी हद तक कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। जीवामृत और घनजीवामृत का इस्तेमाल मुख्य रूप से मिट्टी के भीतर सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को बढ़ाने और समग्र रूप से मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। वहीं दूसरी ओर, नीम पर आधारित घोल फसलों में लगने वाले कुछ चुनिंदा कीटों को नियंत्रित करने में खासी मदद कर सकते हैं।
ब्रह्मास्त्र जैसे पारंपरिक जैविक घोलों का उपयोग भी प्रभावी कीट प्रबंधन के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है। इसके साथ ही, किसानों को इस बात को अच्छी तरह समझना बेहद जरूरी है कि केवल किसी एक देसी घोल का इस्तेमाल कर लेने मात्र से हर तरह के कीड़े पूरी तरह खत्म हो जाने की कोई गारंटी नहीं होती है। इसलिए यह बेहद आवश्यक है कि किसान अपने पौधों की नियमित निगरानी करते रहें, पत्तियों के निचले हिस्सों पर नजर रखकर कीड़ों की सटीक पहचान करें और फिर जरूरत के अनुसार ही सही उपायों को अपनाएं।
सब्जियों के पौधों में होने वाले बदलावों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज
यदि किसान शुरुआत से ही सब्जियों के पौधों की उचित देखभाल करना शुरू कर दें और समय रहते कीड़ों की सही पहचान कर लें, तो वे अपनी बहुमूल्य फसल को किसी भी बड़े नुकसान से आसानी से बचा सकते हैं। विशेष तौर पर गोभी, टमाटर, बैंगन और मिर्च जैसी सब्जियों के पौधों पर पत्तियों के रंग या आकार में दिखाई देने वाले किसी भी तरह के बदलाव को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। किसानों को चाहिए कि वे पहले कीट की सही प्रजाति पहचानें और उसके बाद ही उससे संबंधित उपचार अपनाएं।
किसी भी प्रकार के घोल का अपनी पूरी फसल पर छिड़काव करने से पहले थोड़े से पौधों पर उसकी जांच यानी पैच टेस्ट कर लेना भी बेहद समझदारी का काम रहता है, ताकि किसी भी स्थिति में मुख्य पौधों को कोई नुकसान न पहुँचे। कुल मिलाकर देखा जाए तो, गुलाबी ठंड के इस सुहाने मौसम में सब्जियों की खेती करने वाले किसानों के लिए ये देसी जैविक उपाय एक बेहद उपयोगी और किफायती विकल्प साबित हो सकते हैं। सही जानकारी, समय पर उचित देखभाल और जरूरत के मुताबिक सही कीट प्रबंधन अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रखने के साथ-साथ बेहतर उत्पादन पाने का प्रयास कर सकते हैं।


















