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पाली के कुम्हारों पर आधुनिक सजावट की मार, मिट्टी के पारंपरिक दीयों के बाजार में ग्राहक नदारदराजस्थान
3 नव॰ 2026, 4:03 pm (5 मिनट पहले)· 0

पाली के कुम्हारों पर आधुनिक सजावट की मार, मिट्टी के पारंपरिक दीयों के बाजार में ग्राहक नदारद

राजस्थान के पाली में विदेशी और बिजली की सजावटी लड़ियों के बढ़ते चलन ने चाक पर दिन-रात पसीना बहाने वाले पारंपरिक कारीगरों के सामने आजीविका का संकट पैदा कर दिया है। 9 से 10 दिनों से बाजार में बैठे कारीगरों को ग्राहकों का इंतजार है, जिसके बाद स्थानीय नागरिक स्वदेशी उत्पादों को अपनाने का आग्रह कर रहे हैं।

त्योहारी सीजन में रोशनी का पर्व नजदीक आते ही बाजारों में चहल-पहल तो दिख रही है, लेकिन चाक पर दिन-रात मेहनत कर मिट्टी को आकार देने वाले पारंपरिक कारीगर गहरी चिंता में डूबे हैं। आधुनिक सजावटी लड़ियों और सस्ते विदेशी सामान के बढ़ते दखल ने राजस्थान के पाली जिले में पुश्तैनी मिट्टी के काम से जुड़े परिवारों के व्यापार को काफी हद तक धीमा कर दिया है। चाक पर पसीना बहाकर तैयार किए गए हजारों पारंपरिक दीये दुकानों और फुटपाथों पर सजे पड़े हैं, मगर खरीदारों की बेरुखी इन कारीगरों की मेहनत पर पानी फेरती दिख रही है।

पाली की मिट्टी का हुनर और देश-दुनिया में बनी पहचान

राजस्थान का पाली जिला अपनी समृद्ध हस्तकला, सांस्कृतिक विरासत और बेमिसाल कारीगरी के लिए पूरे भारत में एक खास मुकाम रखता है। यहां की खास मिट्टी से तैयार किए जाने वाले उत्पाद, विशेषकर सुप्रसिद्ध मिट्टी के कुल्हड़ और दैनिक उपयोग के बर्तन, न केवल स्थानीय बाजारों की शोभा बढ़ाते हैं बल्कि अपनी मजबूती और कलात्मक बनावट के दम पर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहचान बना चुके हैं। जब त्योहारों पर घरों को रोशन करने की बारी आती है, तो पाली के कारीगरों द्वारा चाक पर गढ़े गए पारंपरिक मिट्टी के दीयों का आकर्षण हमेशा से अलग ही माना जाता रहा है।

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सजावटी रोशनी के दौर में फीकी पड़ती पारंपरिक कारीगरी

एक तरफ जहां पाली के मिट्टी के बर्तनों और कुल्हड़ों की मांग बड़े बाजारों तक पहुंच रही है, वहीं दूसरी तरफ बड़े पर्व पर मुख्य पहचान रखने वाले मिट्टी के दीयों की बिक्री में भारी गिरावट देखी जा रही है। बाजार में बड़े पैमाने पर पहुंची बिजली की चाइनीज लड़ियों और अन्य विदेशी सजावटी उत्पादों की चकाचौंध ने इन मेहनतकश कुम्हार परिवारों के सामने आर्थिक मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। पूरे परिवार के साथ मिलकर कई हफ्तों तक तैयार किए गए दीयों के ढेर लगे हैं, लेकिन खरीदारों की सीमित संख्या के कारण कारीगरों की उम्मीदें टूट रही हैं। स्थानीय कारीगरों का मानना है कि मिट्टी के दीये खरीदना केवल एक रस्म पूरी करना नहीं है, बल्कि सदियों पुराने हुनर को बचाए रखने और उन पर निर्भर परिवारों को सहारा देने का एक जरूरी जरिया है।

फुटपाथ पर सजी दुकानों में ग्राहकों का इंतजार

बाजार में दुकान लगाकर बैठी रूकी देवी ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि उन्हें दीपक सजाए 9 से 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन दुकान पर ग्राहकों की भारी कमी बनी हुई है। उन्होंने कहा कि लोग आजकल विदेशी और बिजली का सामान ज्यादा पसंद कर रहे हैं और मिट्टी के पारंपरिक दीये लेने से बचते हैं। रूकी देवी के मुताबिक इस काम में अब मुनाफा न के बराबर रह गया है, ऊपर से परिवहन और रखरखाव के दौरान मिट्टी के सामान की होने वाली टूट-फूट से सारा नुकसान सीधे कारीगरों की जेब पर पड़ता है। त्योहार के ऐन मौके पर दिनभर बैठकर बिना बिक्री के लौटना इन परिवारों के लिए भारी भावनात्मक और आर्थिक चोट साबित हो रहा है।

स्थानीय नागरिकों का स्वदेशी अपनाने पर जोर

इस मंदी के बीच इलाके के कई जागरूक नागरिक इन पारंपरिक कारीगरों के समर्थन में आवाज उठा रहे हैं। स्थानीय खरीदारों का कहना है कि त्योहारों की असली रौनक देश की मिट्टी से तैयार दीयों की प्राकृतिक रोशनी से ही मुमकिन है, जिसे बिजली की कृत्रिम चमक कभी नहीं बदल सकती। लोगों का तर्क है कि जहां एक तरफ समाज में विदेशी सामान के बहिष्कार की बातें होती हैं, वहीं दूसरी तरफ त्योहारों पर उसी तरह की सजावटी चीजें खरीदना हमारी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों को नुकसान पहुंचाता है। कुम्हार समाज पीढ़ियों से इस लोककला को जीवित रखे हुए है और लक्ष्मी पूजन के लिए मूर्तियां, आकर्षक दीये तथा अन्य सजावटी सामान बेहद परिश्रम से तैयार करता है। ऐसे में स्थानीय लोगों से अपील की जा रही है कि वे अपनी खरीदारी में इन कारीगरों को प्राथमिकता दें, जिससे समाज के हर वर्ग के घरों में खुशहाली के साथ त्योहार मनाया जा सके।

सवाल-जवाब

पाली के कुम्हार इस समय किस समस्या का सामना कर रहे हैं?
पाली के कुम्हारों के सामने पारंपरिक मिट्टी के दीयों की बिक्री न होने के कारण आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
मिट्टी के दीयों की मांग घटने की मुख्य वजह क्या है?
बाजार में विदेशी और आधुनिक चाइनीज लाइटिंग की बढ़ती लोकप्रियता और चकाचौंध के चलते पारंपरिक दीयों की बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई है।
दीपक विक्रेता रूकी देवी ने क्या स्थिति बताई?
रूकी देवी ने बताया कि वे 9 से 10 दिनों से दुकान लगाकर बैठी हैं, लेकिन ग्राहक नहीं आ रहे हैं और टूटने से होने वाला नुकसान अलग उठाना पड़ रहा है।
पाली जिला देश-विदेश में किस कला के लिए जाना जाता है?
पाली जिला अपनी कला, संस्कृति और मिट्टी से बने उत्कृष्ट उत्पादों, विशेषकर प्रसिद्ध कुल्हड़ों और बर्तनों के लिए देश-विदेश में पहचाना जाता है।
स्थानीय नागरिक इस स्थिति में लोगों से क्या अपील कर रहे हैं?
स्थानीय जागरूक नागरिक लोगों से विदेशी सजावट की जगह स्वदेशी मिट्टी के दीये खरीदने की अपील कर रहे हैं ताकि कुम्हारों के घर भी खुशहाली आ सके।
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