फैशन की लगातार बदलती दुनिया में आधुनिक परिधानों और मशीनी प्रिंट्स की भरमार के बावजूद हस्तकला का आकर्षण आज भी बना हुआ है। जमशेदपुर में कपड़ों पर हाथों से की जाने वाली बारीक कारीगरी की मांग दशकों बाद भी बरकरार है। शहर की महिलाएं खास मौकों के लिए साड़ी, सूट, सलवार और ब्लाउज पीस पर मनपसंद पारंपरिक कढ़ाई कराने के लिए स्थानीय बुटीक का रुख करती हैं। इसी कड़ी में आरिफ बुटीक अपनी तीन पीढ़ियों पुरानी कला के दम पर शहर में एक भरोसेमंद नाम बना हुआ है। शादी और त्योहारों के सीजन में यहां कस्टमाइज्ड डिजाइन तैयार कराने वाले ग्राहकों का तांता लगा रहता है।
तीन पीढ़ियों की विरासत और 50 वर्षों का अनुभव
आरिफ बताते हैं कि कपड़ों पर सुई और धागे से बारीक काम करने की यह कला उनके परिवार में तीन पीढ़ियों से लगातार चली आ रही है। इस कारीगरी को संभालते हुए उनके परिवार को 50 साल से भी ज्यादा का समय बीत चुका है। वर्तमान में बाजार बड़े-बड़े ब्रांड्स और आधुनिक डिजाइनर शोरूम्स से भरा पड़ा है, लेकिन हाथों से बुनी गई कला की चमक और उसकी सजीव फिनिशिंग का मुकाबला मशीनी काम कभी नहीं कर सकता। हर धागे की मजबूती और डिजाइन की नफासत ग्राहकों को आज भी इस पारंपरिक दुकान से जोड़े रखती है।
जमीन पर बैठकर घंटों की एकाग्रता से होता है काम
इस काम में आज भी पारंपरिक कारीगर और बुनकर पूरी निष्ठा के साथ जुड़े हुए हैं। कारीगर जमीन पर बैठकर घंटों पूरी एकाग्रता के साथ कपड़ों के एक-एक रेशे पर डिजाइन उभारते हैं। यह पूरी प्रक्रिया मशीनों से बनने वाली सामान्य डिजाइनिंग से बिल्कुल भिन्न होती है। आरिफ के अनुसार, काम के दौरान हर छोटी से छोटी बारीकी का ध्यान रखा जाता है ताकि परिधान बनने के बाद उसकी सुंदरता और फिनिशिंग देखते ही बने। मशीनें भले ही कम समय में कपड़े तैयार कर दें, लेकिन मानवीय हुनर से निकलने वाला भाव उनमें नजर नहीं आता।
एक पोशाक पर दो से तीन दिन की कड़ी मेहनत
एक कपड़े पर ग्राहक की पसंद के अनुरूप जटिल डिजाइन तैयार करने में आमतौर पर दो से तीन दिन का वक्त लगता है। डिजाइन कितना पेचीदा है और उसमें कितने महीन काम की जरूरत है, उसी आधार पर समय और शारीरिक मेहनत भी बढ़ जाती है। हालांकि जब अंतिम रूप से परिधान तैयार होकर सामने आता है, तो उसकी भव्यता किसी का भी मन मोह लेती है। हाथों से की गई कारीगरी कपड़े को एक अनूठी पहचान देती है, जिसकी हूबहू नकल करना मशीनों के लिए संभव नहीं है।
शादियों के सीजन में पारंपरिक कढ़ाई की भारी मांग
आजकल युवा भले ही ब्रांडेड और रेडीमेड कपड़ों को पसंद करते हों, लेकिन विवाह और पारिवारिक उत्सवों में पारंपरिक हस्तकला की प्राथमिकता बनी रहती है। आरिफ का कहना है कि खास अवसरों पर महिलाएं सामान्य कपड़ों से अलग कुछ विशिष्ट पहनना चाहती हैं, इसलिए वे हाथों से तैयार कला को पहली पसंद बनाती हैं। इस तरह के काम से न केवल पहनावे में भव्यता आती है, बल्कि यह लुप्त होती प्राचीन शिल्पकला को जीवित रखने में भी बड़ा योगदान देता है।
जमशेदपुर में आज के समय में ऐसे पारंपरिक शिल्प केंद्र बहुत सीमित रह गए हैं जहां हाथों से बारीक काम किया जाता हो। आरिफ बुटीक उन गिने-चुने ठिकानों में शामिल है जो आधुनिकता के दबाव के बीच अपनी ऐतिहासिक कारीगरी की मशाल जलाए हुए हैं। बदलते दौर में भी यहां के हुनरमंद हाथ पुरानी भारतीय संस्कृति को आधुनिक पहनावे के साथ जीवित रखे हुए हैं।



















