गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर के अवसर पर सिनेमा प्रेमियों के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिला, जब चर्चित फिल्म 'दृश्यम द कंक्लूजन' बड़े पर्दे पर रिलीज हुई। जमशेदपुर के गोलमुरी इलाके में स्थित मिराज सिनेमा में पहले दिन का पहला शो देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे। शो समाप्त होने के बाद जब लोग सभागार से बाहर आए, तो अधिकांश के चेहरों पर फिल्म को लेकर गहरा संतोष और रोमांच नजर आया। सभागार से बाहर निकलने वाले दर्शकों ने कहानी के कसावट भरे मिजाज, अंतिम पलों तक बरकरार रहने वाले रहस्य और कलाकारों के काम को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं।
कहानी की परतें और दर्शकों के जेहन में उठता कौतूहल
थिएटर से बाहर निकलीं मिनी ने बताया कि यह फिल्म बेहद मनोरंजक बन पड़ी है। उनके अनुसार पूरी कहानी के दौरान दिमाग में लगातार यही सवाल घूमता रहता है कि अगले ही पल पर्दे पर क्या नया मोड़ आने वाला है। सबसे खास बात यह रही कि फिल्म का मुख्य राज आखिरी पलों तक आसानी से पकड़ में नहीं आता। वहीं रोहन ने पटकथा के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर ध्यान खींचते हुए कहा कि इसमें साफ झलकता है कि जिस तरह का नजरिया या किस्सा लोगों के सामने गढ़ा जाता है, समाज अक्सर उसे ही सच मान बैठता है। उन्होंने इस किस्त को पूरी श्रृंखला का एक बेहतरीन और प्रभावशाली अध्याय बताया।
मध्यांतर के बाद की रफ्तार और कत्ल की गुत्थी
फिल्म की गति और उसके विकास पर बात करते हुए सीता ने उल्लेख किया कि पहला हिस्सा कहानी की पृष्ठभूमि को आहिस्ता-आहिस्ता तैयार करता है, लेकिन पटकथा का असली रोमांच और असर अंत में उभरकर सामने आता है। उन्होंने साझा किया कि पर्दा गिरने तक दर्शक यह भांपने के लिए जूझते रहते हैं कि असल में कत्ल को अंजाम किसने दिया और पूरा घटनाक्रम किस दिशा में मुड़ेगा। राजीव ने भी मध्यांतर के बाद की घटनाओं की सराहना की। उनके मुताबिक फिल्म में ऐसा सघन सस्पेंस बुना गया है कि यदि दर्शक एक पल के लिए भी पलक झपका ले, तो कहानी की रफ्तार और सूत्र पकड़ना मुश्किल हो जाता है।
अजय देवगन की आंखों की अदाकारी और अदालत का टकराव
धनंजय ने अपनी राय रखते हुए इस हिस्से को श्रृंखला के पहले और दूसरे भाग से भी बेहतर करार दिया और दर्शकों को इसे देखने की सलाह दी। पूजा ने अपने अनुभव को साझा करते हुए इसे अपनी देखी गई अब तक की सबसे जबरदस्त फिल्मों में गिना, जबकि मनोज ने इसे रहस्य, रोमांच और पूरी तरह पैसा वसूल करार दिया। त्रिवेणी ने अजय देवगन के अभिनय कौशल की विशेष रूप से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि अभी तक सिर्फ सुना था कि अजय देवगन आंखों से भी संवाद कर लेते हैं, मगर इस बार पर्दे पर इसे साक्षात देख लिया। खासकर अदालत कक्ष के दृश्यों में जिस तरह उनके किरदार ने दिग्गज वकीलों को अपने चक्रव्यूह में उलझाया, वह दर्शकों के लिए सबसे यादगार अनुभव साबित हुआ।





















