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झारखंड की सोहराय चित्रकला को दैनिक उपयोगी उत्पादों से जोड़कर नई पहचान दे रही हैं जमशेदपुर की सीता मोनी सोरेनझारखंड
17 सित॰ 2026, 1:13 pm (5 घंटे पहले)· 0

झारखंड की सोहराय चित्रकला को दैनिक उपयोगी उत्पादों से जोड़कर नई पहचान दे रही हैं जमशेदपुर की सीता मोनी सोरेन

जमशेदपुर की सीता मोनी सोरेन ने झारखंड की पारंपरिक सोहराय पेंटिंग को डायरी, बैग और कॉरपोरेट गिफ्ट पर बनाकर दैनिक जीवन का हिस्सा बना दिया है।

जमशेदपुर की रहने वाली सीता मोनी सोरेन ने झारखंड की सदियों पुरानी पारंपरिक सोहराय चित्रकला को नए दौर की व्यावहारिक जरूरतों के साथ जोड़कर एक खास मुकाम हासिल किया है। मिट्टी की दीवारों तक सिमटी रहने वाली इस प्राचीन लोक कला को वह हस्तनिर्मित डायरी, बैग और कॉरपोरेट उपहारों पर बनाकर लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बना रही हैं। उनका यह कदम न केवल पारंपरिक कला को नया बाज़ार दे रहा है, बल्कि स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार और पहचान के नए रास्ते भी खोल रहा है।

ग्रामीण परिवेश और वन्यजीवों की मनमोहक झलक

सीता मोनी सोरेन द्वारा तैयार किए जाने वाले उत्पादों पर उकेरी गई हर एक पेंटिंग में झारखंड के प्राकृतिक सौंदर्य और ग्रामीण जीवन की गहरी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इन चित्रों में गांव की महिलाओं के रोजमर्रा के जीवन के दृश्य बखूबी बयां होते हैं। चूल्हा जलाती हुई महिलाएं, जंगलों से सूखी लकड़ियां चुनकर लाती ग्रामीण औरतें और कुएं से पानी खींचने की तस्वीरें इस कला का मुख्य आकर्षण हैं। ये पेंटिंग रंगों और पारंपरिक आकृतियों के मेल से ग्रामीण समाज की वास्तविक कहानियों को बड़ी सादगी से बयां करती हैं।

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इसके साथ ही, सीता मोनी की चित्रकारी में वन्यजीवों और घने जंगलों को भी विशेष प्राथमिकता दी जाती है। उनकी कलाकृतियों में हाथी, मोर, शेर और भालू जैसे विविध जानवरों को पारंपरिक सोहराय शैली में बहुत ही खूबसूरती से बनाया जाता है। इन कलाकृतियों के माध्यम से वह संदेश देना चाहती हैं कि जंगल, जीव-जंतु और प्रकृति झारखंड के सांस्कृतिक एवं सामाजिक अस्तित्व के सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं।

दीवारों से निकलकर रोजमर्रा के सामान तक का सफर

सोहराय चित्रकला की सबसे बड़ी विशेषता इसका पारंपरिक अंदाज है, जिसमें प्रकृति, पशु-पक्षियों और इंसान के सह-अस्तित्व को दर्शाया जाता है। सीता मोनी ने इस सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक समय की मांग के अनुरूप नया रूप दिया है। अब लोग सोहराय कला की खूबसूरती को केवल तस्वीरों या दीवारों पर देखने के बजाय अपनी दैनिक उपयोगी डायरी, झोले और कॉरपोरेट गिफ्टिंग आइटम के रूप में अपने पास रख सकते हैं। इस नवाचार से पारंपरिक लोक कला को एक नया व्यावसायिक मंच मिल रहा है।

सीता मोनी सोरेन का स्पष्ट मानना है कि किसी भी लोक कला को लंबे समय तक जीवित रखने के लिए उसे केवल आर्ट गैलरी, प्रदर्शनी या दीवारों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। जब कला लोगों के रोज़मर्रा के जीवन और उपयोग का हिस्सा बनती है, तो अधिक से अधिक लोग उसके सांस्कृतिक महत्व से रूबरू हो पाते हैं। इसी दूरदर्शी सोच के साथ वह सोहराय पेंटिंग की इस अनूठी परंपरा को आधुनिक बाज़ार में आगे बढ़ा रही हैं।

सवाल-जवाब

सीता मोनी सोरेन किस कला पर काम करती हैं?
वह झारखंड की पारंपरिक सोहराय चित्रकला पर काम करती हैं।
वह सोहराय पेंटिंग को किन-किन उत्पादों पर बना रही हैं?
वह सोहराय पेंटिंग को हैंडमेड डायरी, बैग और कॉरपोरेट गिफ्टिंग बैग जैसे उत्पादों पर बना रही हैं।
उनकी पेंटिंग्स में मुख्य रूप से क्या दर्शाया जाता है?
उनकी पेंटिंग्स में झारखंड के प्राकृतिक सौंदर्य, ग्रामीण महिलाओं के जीवन और हाथी, मोर, शेर व भालू जैसे वन्यजीवों को दर्शाया जाता है।
सीता मोनी सोरेन का इस पहल के पीछे क्या उद्देश्य है?
उनका उद्देश्य सोहराय कला को दीवारों तक सीमित न रखकर लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना और इसे नया बाज़ार उपलब्ध कराना है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·3 घंटे पहले

लोक नीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नजरिए से पारंपरिक सोहराय कला का यह व्यावसायिक रूपांतरण बेहद महत्वपूर्ण है। अक्सर जनजातीय कलाएं केवल प्रदर्शनियों या त्योहारों तक सीमित रहकर दम तोड़ देती हैं। सीता मोनी का यह प्रयास दर्शाता है कि कैसे सांस्कृतिक धरोहर को दैनिक उपयोगिता से जोड़कर आत्मनिर्भरता का टिकाऊ मॉडल बनाया जा सकता है। यह पहल ग्रामीण महिलाओं को नियमित रोजगार देने के साथ-साथ सांस्कृतिक संरक्षण का भी सशक्त माध्यम है। यदि ऐसी जमीनी पहलों को व्यवस्थित नीतिगत और बाजार सहयोग मिले, तो यह देश भर के क्षेत्रीय शिल्पकारों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 घंटे पहले

कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से, ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक स्वावलंबन अपराध नियंत्रण का एक सबसे बड़ा हथियार है। झारखंड के संवेदनशील जनजातीय इलाकों में जब महिलाओं और युवाओं को सोहराय कला जैसे पारंपरिक माध्यमों से नियमित रोजगार मिलता है, तो वे सीधे तौर पर आर्थिक असुरक्षा से उबरते हैं। यह वित्तीय स्थिरता उन्हें स्थानीय अपराधों, अवैध गतिविधियों और भटकाव के रास्तों पर जाने से रोकती है। सामाजिक न्याय और सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए ऐसी जमीनी पहलों को सुरक्षा और सरकारी नीतियों का भी मजबूत कवच मिलना चाहिए।

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