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जमशेदपुर के जोहार हाट में दिखी झारखंड की संस्कृति, करमा पूजा थीम पर सजा प्रकृति विहारझारखंड
17 सित॰ 2026, 2:42 pm (4 घंटे पहले)· 1

जमशेदपुर के जोहार हाट में दिखी झारखंड की संस्कृति, करमा पूजा थीम पर सजा प्रकृति विहार

जमशेदपुर के कदमा स्थित जोहार हाट को पारंपरिक करमा पूजा थीम पर खूबसूरती से सजाया गया है, जहां आदिवासी कला, बांस के हस्तशिल्प और समृद्ध संस्कृति की झलक देखने को मिल रही है।

झारखंड की समृद्ध जनजातीय विरासत और लोक संस्कृति का एक बेहद खूबसूरत नजारा इन दिनों जमशेदपुर में देखने को मिल रहा है। शहर के एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र को प्रकृति और आस्था के उत्सव के रंग में रंगा गया है। जमशेदपुर के कदमा इलाके में स्थित प्रकृति विहार जोहार हाट में इस समय एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है, जिसे पूरी तरह से पारंपरिक लोक पर्व करमा पूजा की थीम पर सजाया गया है। यह अनूठा आयोजन शहर के लोगों को स्थानीय आदिवासी समुदाय की जीवनशैली, उनकी धार्मिक आस्था और कलात्मक परंपराओं को करीब से समझने का एक बेहतरीन अवसर दे रहा है।

पारंपरिक कलाकृतियों और बांस के उत्पादों का अनूठा संग्रह

इस विशेष उत्सव के दौरान जोहार हाट के परिसर में आदिवासी समाज के दैनिक जीवन और उनके पर्व-त्योहारों से जुड़ी कई अनूठी चीजों को प्रदर्शित किया गया है। यहां आने वाले लोग पारंपरिक आदिवासी परिधानों, आभूषणों और पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न ऐतिहासिक वस्तुओं को देख सकते हैं। इस प्रदर्शनी का सबसे बड़ा आकर्षण बांस से तैयार किए गए पर्यावरण के अनुकूल घरेलू सजावट के सामान हैं। स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाई गई बांस की खूबसूरत टोकरियां, दीवार पर लटकाए जाने वाले सजावटी उत्पाद और दैनिक उपयोग की चीजें लोगों को खूब लुभा रही हैं। इन हस्तशिल्प वस्तुओं में प्राचीन कलात्मकता और आधुनिक उपयोगिता का एक शानदार तालमेल देखने को मिलता है, जो पर्यावरण के प्रति जागरूक खरीदारों के लिए बेहद आकर्षक है।

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प्रकृति और मानव के गहरे संबंध को दर्शाता करमा पर्व

करमा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह इंसानों और प्रकृति के बीच के अटूट और गहरे रिश्ते को बयां करने वाला एक महान पर्व है। इस त्योहार में करम के पेड़ की विशेष रूप से पूजा की जाती है, जो खुशहाली, विकास और जीवन का प्रतीक माना जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से की जाने वाली यह पूजा परिवारों में सुख, समृद्धि और शांति लाती है। इसके साथ ही, यह पर्व भाई और बहन के रिश्ते की पवित्रता और मजबूती को भी दर्शाता है। करमा पूजा के दौरान पूरा समुदाय एक साथ जुटकर पारंपरिक लोक गीत गाता है और नृत्य करता है, जिससे आपसी भाईचारा और सामाजिक एकता मजबूत होती है।

सामुदायिक जीवन और कृषि से जुड़ा है यह उत्सव

इस पावन पर्व के गहरे महत्व को स्पष्ट करते हुए वैद्य राजेश प्रसाद ने बताया कि करमा पूजा का मूल आधार प्रकृति, कृषि, सामूहिक कल्याण और सामाजिक जीवन से जुड़ा हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस अवसर पर करम देवता की आराधना करके लोग अपने परिवार और पूरे समाज की भलाई, अच्छी फसल और समृद्धि की कामना करते हैं। जोहार हाट जैसे आयोजन हमारी पुरानी सांस्कृतिक जड़ों को जीवित रखने और नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित कराने में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सवाल-जवाब

जमशेदपुर में यह विशेष प्रदर्शनी कहां आयोजित की जा रही है?
यह प्रदर्शनी जमशेदपुर के कदमा इलाके में स्थित प्रकृति विहार जोहार हाट में आयोजित की जा रही है।
इस बार जोहार हाट की सजावट किस थीम पर की गई है?
इस बार जोहार हाट को झारखंड के पारंपरिक लोक पर्व करमा पूजा की खास थीम पर सजाया गया है।
प्रदर्शनी में किस प्रकार की पारंपरिक वस्तुएं उपलब्ध हैं?
प्रदर्शनी में पारंपरिक आदिवासी पोशाक, साज-सज्जा के सामान और बांस से बनी हस्तशिल्प सामग्री जैसे टोकरियां और सजावटी वस्तुएं उपलब्ध हैं।
करमा पूजा का मुख्य धार्मिक और सामाजिक महत्व क्या है?
यह पर्व प्रकृति और मानव के संबंध को दर्शाता है। इसमें करम वृक्ष की पूजा की जाती है, जिससे सुख-समृद्धि आती है और भाई-बहन का रिश्ता मजबूत होता है।
वैद्य राजेश प्रसाद के अनुसार करमा पर्व का मूल आधार क्या है?
उनके अनुसार, करमा पर्व का सीधा संबंध प्रकृति, कृषि, खुशहाली और सामुदायिक जीवन से है, जिसमें समाज की समृद्धि के लिए करम देवता की पूजा की जाती है।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

यह आयोजन झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और स्थानीय कारीगरों को एक मजबूत मंच देने के लिहाज से बेहद अहम है। इस तरह के सांस्कृतिक मेलों और प्रदर्शनियों से पारंपरिक बांस हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रत्यक्ष रूप से गति मिलती है, जिससे शहरी समाज अपनी जड़ों से जुड़ता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन वर्मा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह रेखांकित करना आवश्यक है कि ऐसे आयोजन केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनका सीधा संबंध सार्वजनिक व्यवस्था और सामुदायिक सुरक्षा से भी है। जब आदिवासी कला, बांस हस्तशिल्प और पारंपरिक पर्वों के माध्यम से स्थानीय कारीगरों को मुख्यधारा का आर्थिक मंच मिलता है, तो इससे सामाजिक समरसता बढ़ती है और हाशिए पर मौजूद समुदायों का आर्थिक सशक्तिकरण होता है। इस प्रकार की सार्वजनिक गतिविधियां शहर के भीतर एक सकारात्मक माहौल का निर्माण करती हैं, जो कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक सुरक्षा दोनों के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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