रांची में प्रतिबंधित माओवादी संगठन के एक बड़े कमांडर के आत्मसमर्पण से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। भाकपा (माओवादी) संगठन के सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश ने पश्चिम बंगाल पुलिस के समक्ष घुटने टेक दिए हैं और आत्मसमर्पण कर दिया है। इस घटनाक्रम की आधिकारिक पुष्टि झारखंड पुलिस मुख्यालय की ओर से भी कर दी गई है। असीम मंडल पर सुरक्षा एजेंसियों का शिकंजा लंबे समय से कसा हुआ था और विभिन्न राज्यों की सरकारों ने उस पर भारी भरकम इनाम घोषित कर रखा था।
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस कुख्यात माओवादी पर झारखंड और ओडिशा सरकारों द्वारा कुल 2.20 करोड़ रुपये का संयुक्त इनाम रखा गया था। अकेले झारखंड सरकार ने उसकी गिरफ्तारी या सूचना देने वाले के लिए एक करोड़ रुपये का इनाम तय किया था, जबकि ओडिशा सरकार ने उस पर 1.20 करोड़ रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। डेढ़ दशक से अधिक समय से कानून की गिरफ्त से दूर रहे इस माओवादी नेता की तलाश सुरक्षा बलों को लंबे अर्से से थी।
पश्चिम मेदिनीपुर का रहने वाला है असीम मंडल
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, असीम मंडल मूल रूप से पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के चंद्रकोना इलाके का रहने वाला है। वह काफी कम उम्र से ही चरमपंथी विचारधारा की ओर आकर्षित हो गया था और लंबे अरसे से माओवादी संगठन के वैचारिक व मैदानी नेटवर्क से मजबूती से जुड़ा हुआ था। साल 2011 से उसने पश्चिम बंगाल के भीतर संगठन की संपूर्ण गतिविधियों की कमान संभाल रखी थी और मोर्चे का नेतृत्व कर रहा था।
आखिरकार किन परिस्थितियों में उसने हथियार छोड़े, इसे लेकर महत्वपूर्ण खुलासे सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि उसका स्वास्थ्य लंबे समय से खराब चल रहा था। इसके अलावा, विभिन्न सुरक्षा बलों द्वारा लगातार चलाए जा रहे अभियानों के कारण उस पर चौतरफा दबाव बढ़ गया था। इन्ही सब वजहों से उसने आखिरकार जंगल की राह छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। सरेंडर करने से पहले उसने अपने सशस्त्र दस्ते को भी पूरी तरह से भंग कर दिया था और उसके बाद पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए क्यों अहम है यह सरेंडर
असीम मंडल का यह आत्मसमर्पण देश की तमाम सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के लिए एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। चूंकि वह संगठन के शीर्ष नीति-निर्माता स्तर यानी सेंट्रल कमेटी से ताल्लुक रखता था, इसलिए उसके पास संगठन के भीतरी कामकाज का पूरा कच्चा-चिट्ठा मौजूद है। एजेंसियों को पूरी उम्मीद है कि उसके आत्मसमर्पण के बाद प्रतिबंधित संगठन के आंतरिक ढांचे, वित्त पोषण, हथियारों के स्रोतों और आगामी रणनीतियों के बारे में बेहद अहम जानकारियां हाथ लग सकेंगी।
झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में माओवादी हिंसा और गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिहाज से इस घटनाक्रम को एक मील का पत्थर देखा जा रहा है। सुरक्षा बल पिछले कई सालों से इस क्षेत्र में वामपंथी उग्रवाद पर पूरी तरह काबू पाने के लिए लगातार ऑपरेशन चला रहे हैं। खराब सेहत और सुरक्षा बलों के बढ़ते घेरे के बीच असीम मंडल का यह कदम संगठन के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और हताशा को भी उजागर करता है।
कॉलेज के दिनों से जुड़ा था नक्सली गतिविधियों से
असीम मंडल उर्फ आकाश के इस रास्ते पर आगे बढ़ने की शुरुआत उसके शुरुआती शिक्षण संस्थानों के दौर से ही हो गई थी। वह कॉलेज के समय ही चरमपंथी छात्र आंदोलनों और वामपंथी संगठनों के संपर्क में आया था। माना जाता है कि 1980 के दशक के दौरान ही वह इस हिंसक आंदोलन का हिस्सा बन चुका था और धीरे-धीरे संगठन की सीढ़ियां चढ़ते हुए शीर्ष पदों तक पहुंच गया।
साल 2011 में जब कुख्यात माओवादी नेता किशनजी सुरक्षा बलों के साथ हुई एक मुठभेड़ में मारा गया था, तब संगठन की कमान संभाल रहे नेतृत्व ने आकाश को पश्चिम बंगाल क्षेत्र की विशेष जिम्मेदारी सौंपी थी। उसे राज्य सचिव का पद सौंपा गया था। वर्ष 2018 तक उसने बंगाल की सीमा से लेकर झारखंड तक संगठन के प्रभाव को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। इस दौरान पूर्वी सिंहभूम से लेकर पश्चिम सिंहभूम के घने सारंडा जंगलों तक और बंगाल-झारखंड की सीमाओं पर उसका वर्चस्व रहा। जांच एजेंसियों के मुताबिक, उसके दस्ते की संलिप्तता कई बड़ी वारदातों में रही है। इनमें जमशेदपुर के तत्कालीन सांसद सुनील महतो की सनसनीखेज हत्या का मामला भी शामिल है, जिसकी फाइलें आज भी कानूनी पन्नों में दर्ज हैं।























