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ढाई करोड़ का इनामी माओवादी असीम मंडल ने पश्चिम बंगाल में किया आत्मसमर्पण, डेढ़ दशक से थी तलाशझारखंड
17 सित॰ 2026, 12:18 pm (6 घंटे पहले)· 0

ढाई करोड़ का इनामी माओवादी असीम मंडल ने पश्चिम बंगाल में किया आत्मसमर्पण, डेढ़ दशक से थी तलाश

झारखंड और ओडिशा में करोड़ों रुपये के इनामी सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश ने पश्चिम बंगाल में पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया है। खराब स्वास्थ्य और सुरक्षा बलों के भारी दबाव के कारण उसने यह कदम उठाया है।

रांची में प्रतिबंधित माओवादी संगठन के एक बड़े कमांडर के आत्मसमर्पण से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। भाकपा (माओवादी) संगठन के सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश ने पश्चिम बंगाल पुलिस के समक्ष घुटने टेक दिए हैं और आत्मसमर्पण कर दिया है। इस घटनाक्रम की आधिकारिक पुष्टि झारखंड पुलिस मुख्यालय की ओर से भी कर दी गई है। असीम मंडल पर सुरक्षा एजेंसियों का शिकंजा लंबे समय से कसा हुआ था और विभिन्न राज्यों की सरकारों ने उस पर भारी भरकम इनाम घोषित कर रखा था।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस कुख्यात माओवादी पर झारखंड और ओडिशा सरकारों द्वारा कुल 2.20 करोड़ रुपये का संयुक्त इनाम रखा गया था। अकेले झारखंड सरकार ने उसकी गिरफ्तारी या सूचना देने वाले के लिए एक करोड़ रुपये का इनाम तय किया था, जबकि ओडिशा सरकार ने उस पर 1.20 करोड़ रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। डेढ़ दशक से अधिक समय से कानून की गिरफ्त से दूर रहे इस माओवादी नेता की तलाश सुरक्षा बलों को लंबे अर्से से थी।

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पश्चिम मेदिनीपुर का रहने वाला है असीम मंडल

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, असीम मंडल मूल रूप से पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के चंद्रकोना इलाके का रहने वाला है। वह काफी कम उम्र से ही चरमपंथी विचारधारा की ओर आकर्षित हो गया था और लंबे अरसे से माओवादी संगठन के वैचारिक व मैदानी नेटवर्क से मजबूती से जुड़ा हुआ था। साल 2011 से उसने पश्चिम बंगाल के भीतर संगठन की संपूर्ण गतिविधियों की कमान संभाल रखी थी और मोर्चे का नेतृत्व कर रहा था।

आखिरकार किन परिस्थितियों में उसने हथियार छोड़े, इसे लेकर महत्वपूर्ण खुलासे सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि उसका स्वास्थ्य लंबे समय से खराब चल रहा था। इसके अलावा, विभिन्न सुरक्षा बलों द्वारा लगातार चलाए जा रहे अभियानों के कारण उस पर चौतरफा दबाव बढ़ गया था। इन्ही सब वजहों से उसने आखिरकार जंगल की राह छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। सरेंडर करने से पहले उसने अपने सशस्त्र दस्ते को भी पूरी तरह से भंग कर दिया था और उसके बाद पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

सुरक्षा एजेंसियों के लिए क्यों अहम है यह सरेंडर

असीम मंडल का यह आत्मसमर्पण देश की तमाम सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के लिए एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। चूंकि वह संगठन के शीर्ष नीति-निर्माता स्तर यानी सेंट्रल कमेटी से ताल्लुक रखता था, इसलिए उसके पास संगठन के भीतरी कामकाज का पूरा कच्चा-चिट्ठा मौजूद है। एजेंसियों को पूरी उम्मीद है कि उसके आत्मसमर्पण के बाद प्रतिबंधित संगठन के आंतरिक ढांचे, वित्त पोषण, हथियारों के स्रोतों और आगामी रणनीतियों के बारे में बेहद अहम जानकारियां हाथ लग सकेंगी।

झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में माओवादी हिंसा और गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिहाज से इस घटनाक्रम को एक मील का पत्थर देखा जा रहा है। सुरक्षा बल पिछले कई सालों से इस क्षेत्र में वामपंथी उग्रवाद पर पूरी तरह काबू पाने के लिए लगातार ऑपरेशन चला रहे हैं। खराब सेहत और सुरक्षा बलों के बढ़ते घेरे के बीच असीम मंडल का यह कदम संगठन के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और हताशा को भी उजागर करता है।

कॉलेज के दिनों से जुड़ा था नक्सली गतिविधियों से

असीम मंडल उर्फ आकाश के इस रास्ते पर आगे बढ़ने की शुरुआत उसके शुरुआती शिक्षण संस्थानों के दौर से ही हो गई थी। वह कॉलेज के समय ही चरमपंथी छात्र आंदोलनों और वामपंथी संगठनों के संपर्क में आया था। माना जाता है कि 1980 के दशक के दौरान ही वह इस हिंसक आंदोलन का हिस्सा बन चुका था और धीरे-धीरे संगठन की सीढ़ियां चढ़ते हुए शीर्ष पदों तक पहुंच गया।

साल 2011 में जब कुख्यात माओवादी नेता किशनजी सुरक्षा बलों के साथ हुई एक मुठभेड़ में मारा गया था, तब संगठन की कमान संभाल रहे नेतृत्व ने आकाश को पश्चिम बंगाल क्षेत्र की विशेष जिम्मेदारी सौंपी थी। उसे राज्य सचिव का पद सौंपा गया था। वर्ष 2018 तक उसने बंगाल की सीमा से लेकर झारखंड तक संगठन के प्रभाव को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। इस दौरान पूर्वी सिंहभूम से लेकर पश्चिम सिंहभूम के घने सारंडा जंगलों तक और बंगाल-झारखंड की सीमाओं पर उसका वर्चस्व रहा। जांच एजेंसियों के मुताबिक, उसके दस्ते की संलिप्तता कई बड़ी वारदातों में रही है। इनमें जमशेदपुर के तत्कालीन सांसद सुनील महतो की सनसनीखेज हत्या का मामला भी शामिल है, जिसकी फाइलें आज भी कानूनी पन्नों में दर्ज हैं।

सवाल-जवाब

असीम मंडल उर्फ आकाश कौन था?
असीम मंडल प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) संगठन का सेंट्रल कमेटी सदस्य और पश्चिम बंगाल का पूर्व राज्य सचिव था।
असीम मंडल पर कुल कितने का इनाम था?
उस पर झारखंड और ओडिशा सरकारों द्वारा कुल 2.20 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था, जिसमें झारखंड का एक करोड़ और ओडिशा का 1.20 करोड़ शामिल था।
उसने कहाँ और किसके सामने आत्मसमर्पण किया?
उसने पश्चिम बंगाल में पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया है।
उसने हथियार क्यों छोड़े?
खराब स्वास्थ्य और सुरक्षा बलों के लगातार बढ़ते दबाव के कारण उसने जंगल छोड़ने और सरेंडर करने का फैसला किया।
वह किस बड़े मामले में आरोपी रहा है?
उसके दस्ते पर जमशेदपुर के तत्कालीन सांसद सुनील महतो की हत्या सहित कई बड़ी वारदातों में शामिल होने का संदेह है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·5 घंटे पहले

असीम मंडल का छात्र जीवन में ही उग्रवादी विचारधारा से जुड़ना यह दिखाता है कि उच्च शिक्षण संस्थान किस प्रकार चरमपंथी भर्ती के लिए संवेदनशील बन जाते हैं। नक्सल प्रभावित और सीमावर्ती क्षेत्रों के कॉलेजों में केवल सुरक्षा अभियानों से स्थायी समाधान नहीं मिल सकता। ऐसे क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में कौशल विकास, पारदर्शी रोजगार के अवसर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देना बेहद ज़रूरी है, ताकि युवा भटकाव से बचकर मुख्यधारा में बने रहें।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 घंटे पहले

असीम मंडल जैसे शीर्ष केंद्रीय समिति स्तर के माओवादी का आत्मसमर्पण यह स्पष्ट संकेत देता है कि वामपंथी उग्रवाद का वैचारिक और सांगठनिक ढांचा अब बेहद कमजोर हो चुका है। अंतर-राज्यीय सुरक्षा समन्वय और निरंतर दबाव की नीति ने शीर्ष नेतृत्व को हथियार छोड़ने पर मजबूर किया है। झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय इस नेटवर्क का बिखरना सुरक्षा नीति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इससे कैडर का मनोबल गिरेगा और उग्रवादी संगठन के लॉजिस्टिक्स और फंडिंग नेटवर्क को ध्वस्त करने में मदद मिलेगी।

Ravikash Gupta@ravikash·5 घंटे पहले

अर्जुन की बात को आगे बढ़ाते हुए, सुरक्षा के मोर्चे पर मिली यह सफलता आर्थिक और क्षेत्रीय विकास के लिहाज से भी एक बड़ा मोड़ है। शीर्ष नेतृत्व के पतन से माओवादियों का अवैध लेवी और जबरन वसूली का वित्तीय तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा, जो दशकों से इस नेटवर्क को चला रहा था। झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति लौटने से स्थानीय बुनियादी ढांचे, औद्योगिक गतिविधियों और विकास कार्यों को नया बल मिलेगा। खुफिया एजेंसियों द्वारा उनके फंडिंग स्रोतों का खुलासा होने से वामपंथी उग्रवाद के वित्तीय ढांचे को स्थायी रूप से समाप्त करने में मदद मिलेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 घंटे पहले

सेंट्रल कमेटी स्तर के शीर्ष नेता का आत्मसमर्पण यह स्पष्ट करता है कि बंगाल-झारखंड-ओडिशा सीमा पर माओवादी नेटवर्क अब बिखरने की कगार पर है। सरेंडर से पहले सशस्त्र दस्ते को भंग करना संगठन के भीतर गहरे नेतृत्व संकट और घटते जनाधार को दर्शाता है। एक अपराध संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि पुलिस और खुफिया एजेंसियों के लिए अब सबसे अहम चरण शुरू होगा, जहां उसकी निशानदेही पर अंतर-राज्यीय सिंडिकेट, अवैध फंडिंग और बचे हुए चरमपंथी ठिकानों के खिलाफ निर्णायक कानूनी व मैदानी कार्रवाई की जा सकती है।

Rohan Verma@rohan-verma·6 घंटे पहले

करण की बात को आगे बढ़ाते हुए, यह सरेंडर केवल सुरक्षा बलों की रणनीतिक जीत नहीं, बल्कि अंतर-राज्यीय समन्वय और आत्मसमर्पण नीति की प्रभावशीलता का भी प्रमाण है। जब शीर्ष स्तर का कमांडर हथियार डालता है, तो यह दूरदराज के इलाकों में शासन और कानून-व्यवस्था की बढ़ती पैठ को दर्शाता है। अब संबंधित राज्य सरकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस स्थिति का लाभ उठाकर उन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, जन-कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक उपस्थिति को तेज करने की है। खुफिया जानकारियों के आधार पर कार्रवाई के साथ-साथ मजबूत लोक नीति ही उग्रवाद के आधार को स्थायी रूप से समाप्त कर सकती है।

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