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नीरज ने छोड़ी दिल्ली की नौकरी, उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू किया करोड़पति बनने का अनोखा बिजनेसझारखंड
17 सित॰ 2026, 8:13 am (1 दिन पहले)· 1

नीरज ने छोड़ी दिल्ली की नौकरी, उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू किया करोड़पति बनने का अनोखा बिजनेस

झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले एमबीए पास नीरज ने उत्तराखंड के अपने पैतृक गांव लौटकर बुरांश के फूलों से अनोखी गुलाबी चाय बनाने का बिजनेस शुरू किया। आज उनकी इस हर्बल टी का कारोबार करोड़ों रुपये…

झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले नीरज ने अपनी नौकरी को अलविदा कहकर उत्तराखंड के पहाड़ों से एक अनूठा बिजनेस खड़ा कर दिया है। उनके पास अपने पैतृक गांव में कई तरह के फूल और भेड़ें हैं, जिनमें बुरांश का फूल बेहद खास है। इस फूल से एक विशेष गुलाबी चायपत्ती तैयार की जाती है, जो नीले और गुलाबी रंग की होती है और स्वाद में भी काफी बेहतरीन होती है। इस अनोखी चाय की कीमत बाजार में 100 ग्राम के लिए ₹100 तक है, जिससे यह ₹1000 प्रति किलोग्राम के भाव बिकती है। इसके जरिए वह शानदार कमाई कर रहे हैं और उनका यह कारोबार आज एक बड़े मुकाम पर पहुंच चुका है।

फूलों की चाय के अलावा नीरज प्राकृतिक सिल्क का कपड़ा भी तैयार करते हैं, जिसकी कीमत बाजार में ₹80,000 तक पहुंच जाती है। उन्होंने बताया कि उन्होंने घर पर ही भेड़ें पाल रखी हैं और सारा काम स्थानीय स्तर पर ही किया जाता है। आज उनका अपना खुद का स्थापित ब्रांड है और उनके उत्पाद पैन इंडिया स्तर पर सप्लाई किए जाते हैं। इस सफलता के सफर में उन्हें सरकारी योजनाओं का भी भरपूर लाभ मिला है, और वह विशेष रूप से नाबार्ड से जुड़े हुए हैं। सरकारी मदद और अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने इस काम को एक नया आयाम दिया है।

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नाबार्ड से मिलती है आर्थिक मदद और सब्सिडी

सरकारी संस्था नाबार्ड से जुड़ने के फायदों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि जो बुनकर या दस्तकार अपने हाथों से खुद चीजें तैयार करते हैं, उन्हें नाबार्ड के जरिए लोन पर भारी सब्सिडी मिल जाती है। उनके अनुसार इस व्यवस्था के तहत उन्हें 90% तक की सब्सिडी प्राप्त होती है। इसके अलावा देश भर में लगने वाले सरकारी मेलों और प्रदर्शनियों में उन्हें अपने स्टॉल लगाने का मौका बिल्कुल मुफ्त मिलता है। इन दोनों सुविधाओं ने उनके व्यापार को आगे बढ़ाने और देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

उत्पाद की विविधता के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उनके पास ग्राहकों के लिए बुरांश, कफल और मसाला चायपत्ती जैसे कई विकल्प उपलब्ध हैं। मसाला चायपत्ती पहाड़ी इलाकों में पाए जाने वाले प्राकृतिक मसालों को पीसकर बनाई जाती है। वहीं कफल एक गुलाबी रंग का पहाड़ी फूल है, जिसकी खेती उनके अपने क्षेत्र में होती है। वह अपने क्षेत्र में इसकी खेती करवाते हैं और फिर इसे सुखाकर पैकेजिंग का काम पूरा करवाते हैं। यह सारा काम गांव की महिलाओं के द्वारा किया जाता है, जिन्हें वह खुद खास तौर पर ट्रेनिंग देते हैं।

करोड़ों का सालाना टर्नओवर और बढ़ती मांग

उनकी इस खास चायपत्ती की बाजार में जबरदस्त मांग बनी हुई है। उन्होंने बताया कि ₹1000 किलो बिकने वाली इस चाय की मांग इतनी अधिक है कि वह ग्राहकों की जरूरत को पूरा नहीं कर पाते हैं। इस हर्बल टी की खासियत यह है कि कप में इसकी बहुत थोड़ी सी मात्रा ही काफी होती है और इसके लिए अलग से चीनी या किसी अन्य चीज को मिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उनके ग्राहक भारत के हर एक राज्य में मौजूद हैं और आज उनका सालाना टर्नओवर करोड़ों रुपये तक पहुंच चुका है।

दिल्ली में एमबीए की डिग्री के बाद उन्होंने करीब 40 साल नौकरी की, लेकिन उनका मन हमेशा से कुछ अपना करने का था। अपनी खुद की जमीन और गांव में पुश्तैनी खेती-बाड़ी होने के कारण उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न इसका बेहतर उपयोग किया जाए। यहीं से उन्हें यह आइडिया आया कि इस पहाड़ी फूल की चाय को केवल पहाड़ों तक ही क्यों सीमित रखा जाए, बल्कि इसे देश के हर नागरिक तक पहुंचाया जाना चाहिए। इसी सोच के साथ यह सिलसिला शुरू हुआ और आज उनके साथ 200 से अधिक महिलाएं जुड़कर पूरी तरह आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।

सवाल-जवाब

नीरज मूल रूप से किस राज्य के रहने वाले हैं और उनका बिजनेस कहां है?
नीरज झारखंड की राजधानी रांची में रह रहे हैं, जबकि उनका पैतृक गांव और बिजनेस उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है।
यह खास गुलाबी चाय किस फूल से बनाई जाती है?
यह अनोखी गुलाबी चायपत्ती बुरांश के फूलों से तैयार की जाती है, जो नीले और गुलाबी रंग की होती है।
इस चायपत्ती की बाजार में कीमत क्या है?
इस चायपत्ती की कीमत 100 ग्राम के लिए ₹100 तक है, जिससे यह ₹1000 प्रति किलोग्राम के भाव बिकती है।
इस व्यवसाय में किस सरकारी संस्था से मदद मिलती है?
इस व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें नाबार्ड से जोड़ा गया है, जिसके माध्यम से लोन पर सब्सिडी और मुफ्त स्टॉल मिलते हैं।
चाय के अलावा वह और कौन सा उत्पाद बनाते हैं?
चाय के अलावा वह प्राकृतिक सिल्क का कपड़ा भी तैयार करते हैं, जो ₹80,000 तक बिकता है।
इस बिजनेस से कितने लोगों को रोजगार मिला है?
आज उनके इस कारोबार के साथ 200 से अधिक गांव की महिलाएं जुड़ी हुई हैं जो प्रशिक्षित होकर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Ananya Iyer@ananya-iyer·1 दिन पहले

यह सफलता की कहानी दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक पहाड़ी संसाधनों और सरकारी योजनाओं के तालमेल से स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आयाम मिल सकता है। बुरांश और कफल जैसी स्थानीय वनोपज को प्रीमियम हर्बल उत्पादों में बदलकर पैन-इंडिया बाजार तक पहुँचाना और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना यह साबित करता है कि सही दिशा में किया गया नवाचार और सोशल मीडिया या आधुनिक मार्केटिंग का प्रयोग इस तरह के स्टार्टअप्स को भविष्य में ओटीटी पर डॉक्यूमेंट्री या बायोपिक के रूप में भी एक बेहद लोकप्रिय विषय बना सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

यह स्टार्टअप रिवर्स माइग्रेशन और ग्रामीण आर्थिकी का एक बेहतरीन मॉडल है, जहाँ नाबार्ड जैसी संस्थाओं से मिलने वाली 90% सब्सिडी और स्थानीय संसाधनों के उपयोग ने इसे एक स्केलेबल और टिकाऊ बिजनेस बना दिया है। डीटूसी (D2C) ब्रांडिंग और पैन-इंडिया सप्लाई चेन के जरिए पारंपरिक पहाड़ी उत्पादों को प्रीमियम कीमत पर बेचना यह साबित करता है कि सही वित्तीय प्रबंधन और सरकारी योजनाओं के तालमेल से ग्रामीण भारत में भी करोड़ों का टर्नओवर खड़ा किया जा सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

यह मॉडल इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि कैसे सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं का सहयोग ग्रामीण स्तर पर रोजगार सृजन के साथ स्थायी आजीविका के नए द्वार खोल सकता है। जब दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों और महिला श्रमशक्ति को आधुनिक बाज़ार से जोड़ा जाता है, तो पलायन जैसी समस्याओं पर प्रभावी अंकुश लगता है और आर्थिक आत्मनिर्भरता मजबूत होती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

एक क्राइम संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि जब ऐसे स्वरोजगार और ग्रामीण विकास के मॉडल सफल होते हैं, तो यह सीधे तौर पर संगठित अपराध, पलायन और बेरोजगारी जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर लगाम लगाते हैं। नाबार्ड जैसी संस्थाओं की मदद और 90% तक सब्सिडी का यह ढांचा यदि पारदर्शी बना रहे, तो वित्तीय अनियमितताओं की गुंजाइश खत्म होगी और युवा अपराध से दूर रहकर सुरक्षित आजीविका चुनेंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

करण के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी व सीमावर्ती राज्यों में इस तरह के ग्रामीण उद्यम मॉडल रिवर्स माइग्रेशन यानी उल्टे पलायन को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। जब स्थानीय स्तर पर बुरांश और कफल आधारित उत्पादों से महिलाओं को रोजगार मिलता है और पैन-इंडिया बाजार तक पहुंच बनती है, तो यह आर्थिक सुदृढ़ता युवाओं को बड़े महानगरों की ओर पलायन करने से रोकती है। साथ ही, नाबार्ड जैसी संस्थाओं की मदद से जमीनी स्तर पर पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है ताकि हर पात्र दस्तकार तक इसका पूरा लाभ पहुंच सके।

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