झारखंड के घने जंगलों में हाथियों की चहलकदमी सिर्फ वन्यजीवों की मौजूदगी का प्रमाण नहीं, बल्कि उस पूरे इलाके में पर्याप्त वन क्षेत्र और प्रचुर जल स्रोतों का भी संकेत मानी जाती रही है। इसके बावजूद बीते कुछ दशकों में राज्य के कई हिस्सों से जंगली हाथियों के इंसानी बस्तियों में दाखिल होने, फसलों को रौंदने और आम लोगों पर हमले करने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। जब कोई जंगली हाथी अचानक रिहायशी इलाकों की तरफ रुख करता है, तो भारी तबाही और जानमाल के नुकसान की आशंका पैदा हो जाती है। इंसान और प्रकृति का सह-अस्तित्व जितना अनिवार्य है, वन्यजीवों के अप्रत्याशित हमलों से बस्तियों को सुरक्षित रखना भी उतना ही अहम पहलू है। हाथियों के इस बदलते बर्ताव और उनसे जुड़े जमीनी हालात पर पलामू के हाथी शोधकर्ता डॉ० डी एस श्रीवास्तव ने गहरी रोशनी डाली है।
मानवीय दखल और सिकुड़ते प्राकृतिक गलियारों की हकीकत
विकास कार्यों की अंधी दौड़ ने जंगलों के भीतरी तंत्र को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। जंगलों के बीच लगातार बढ़ता इंसानी दखल, बेरोकटोक खनन गतिविधियां, सड़कों का जाल और अनियोजित निर्माण कार्य हाथियों के पारंपरिक आवासों को उजाड़ रहे हैं। हाथियों के पीढ़ियों पुराने आवागमन मार्ग यानी कॉरिडोर कट जाने के चलते ये विशालकाय जानवर अपनी प्राकृतिक राह भटक रहे हैं। जब इनके तय रास्ते बीच से टूट जाते हैं, तो भोजन और पानी की तलाश में हाथियों के झुंड भटकते हुए सीधे इंसानी बस्तियों और खेतों में पहुंच जाते हैं। डॉ० डी एस श्रीवास्तव का मानना है कि इस पूरे संकट को केवल हाथियों द्वारा किए गए नुकसान या उनके उग्र होने के नजरिये से नहीं आंका जाना चाहिए, बल्कि उस दबाव को समझना जरूरी है जो इंसानी गतिविधियों ने उनके घरों और रास्तों पर बनाया है।
झारखंड में हाथियों की ऐतिहासिक मौजूदगी और उनके रूट
झारखंड में हाथियों का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है, हालांकि पहले उनकी बसावट कुछ तय और सीमित जंगलों तक ही केंद्रित थी। पुराने समय में मुख्य रूप से पलामू और सिंहभूम के जंगलों में ही हाथियों के झुंड स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाते थे। पलामू के वन क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके से हाथियों के आने की पुष्टि होती रही है, और शोधकर्ताओं के अनुसार इन हाथियों का स्वभाव और बर्ताव अन्य क्षेत्रों के हाथियों से काफी अलग माना जाता है। इसी तरह सिंहभूम के विस्तृत जंगलों में ओडिशा के मयूरभंज इलाके से हाथियों का प्राकृतिक आवागमन एक तय कॉरिडोर के जरिए सदियों से होता रहा है। वक्त के साथ इनके मूल प्राकृतिक ठिकानों पर जब दबाव बढ़ा, तो हाथियों ने नए रास्तों की तरफ रुख किया, जिसके चलते अब झारखंड के कई जिलों में हाथियों की लगातार मौजूदगी दिखने लगी है।
मुआवजे की व्यवस्था और बुनियादी नुकसान का बड़ा सवाल
इंसान और हाथियों के बीच होने वाले टकराव में जब ग्रामीणों के घर ढहते हैं, फसलें बर्बाद होती हैं या अन्य संपत्तियों का नुकसान होता है, तो मौजूदा नियमों के तहत सरकार द्वारा प्रभावित लोगों को आर्थिक मुआवजा दिया जाता है। लेकिन डॉ० डी एस श्रीवास्तव एक बेहद बुनियादी सवाल उठाते हैं कि जब इंसानी हरकतों की वजह से इन बेजुबानों के घर और प्राकृतिक रास्ते छीने जाते हैं, तो उस विनाश की भरपाई कैसे की जा सकती है। खनन के निरंतर विस्तार, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और निर्माण कार्यों से वन्यजीवों का पूरा पारितंत्र चरमरा गया है। प्राकृतिक वातावरण में चारे और पानी का संकट गहराने पर ये झुंड रिहायशी इलाकों की ओर मुड़ते हैं, जिससे टकराव और हिंसक घटनाएं जन्म लेती हैं।
जागरूकता, निगरानी और स्थायी संरक्षण ही असली हल
मानव और हाथी के इस बढ़ते द्वंद्व को थामने के लिए सरकार और वन विभाग नियमित रूप से निगरानी दल तैनात करते हैं, जागरूकता अभियान चलाते हैं और सुरक्षा उपाय अपनाते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक हाथियों के मूल प्राकृतिक गलियारों को कानूनी और जमीनी तौर पर सुरक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी। हाथियों को महज तबाही मचाने वाले जानवर के रूप में देखने के बजाय उन्हें वन पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न और जरूरी घटक के रूप में स्वीकार करना होगा। यदि उनके ऐतिहासिक रास्तों को अवैध निर्माण और खनन से मुक्त रखा जाए और जंगलों में उनके प्राकृतिक भोजन-पानी की व्यवस्था सुचारू रहे, तो इंसानी बस्तियों और हाथियों के बीच होने वाले खूनी टकराव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।























