मॉनसून और मक्के की आवक शुरू होते ही भारतीय रसोईघरों में भुट्टे की अलग-अलग तैयारियों की महक फैलने लगती है। अधिकांश लोग मक्के को अंगारों पर भूनकर या पानी में उबालकर खाना पसंद करते हैं, लेकिन इसी अनाज से बनने वाला एक पारंपरिक देसी व्यंजन ऐसा भी है जो कम समय और सीमित सामग्रियों में तैयार हो जाता है। इस पारंपरिक व्यंजन को मक्के का छिलका कहा जाता है। यह स्वाद में हल्का मीठा, अंदर से मुलायम और बाहर से हल्का कुरकुरा होता है। जिन परिवारों में पारंपरिक खान-पान को प्राथमिकता दी जाती है, वहां मक्के के मौसम में यह नाश्ते और शाम के भोजन का एक अहम हिस्सा बन जाता है।
सही भुट्टे का चयन क्यों है सबसे बुनियादी शर्त
इस पारंपरिक व्यंजन को सही तरीके से बनाने के लिए सामग्री का चुनाव बेहद सावधानी से करना पड़ता है। यदि मक्का बहुत अधिक पक चुका हो और उसके दाने कड़े या सूखे हो गए हों, तो छिलका बनाने में काफी परेशानी आती है और उसका अपेक्षित स्वाद भी नहीं मिल पाता। इस विधि के लिए दूधिया अवस्था वाला मक्का ही सबसे उपयुक्त माना जाता है। दूधिया मक्का उसे कहते हैं जिसके ऊपर का छिलका बिल्कुल हरा हो और अंदर के दाने दबाने पर नरम, रसदार तथा ताजे महसूस हों।
चंपा देवी ने इस बारे में जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि दाने सख्त होने पर व्यंजन का टेक्सचर बिगड़ जाता है। उन्होंने कहा, "इसके लिए दूधिया अवस्था वाला मक्का सबसे उपयुक्त माना जाता है, यानी ऐसा भुट्टा जिसके ऊपर का छिलका अभी हरा हो और अंदर के दाने नरम व रसदार हों।" ऐसे ही ताजे और रसभरे दानों से तैयार किया गया छिलका खाते समय अपनी प्राकृतिक मिठास छोड़ता है और बेहद स्वादिष्ट लगता है।
मक्का और चावल का सही अनुपात और तैयारी
इस व्यंजन को बनाने के लिए भुट्टे से दानों को सावधानीपूर्वक अलग किया जाता है। इसके बाद इन दानों को साफ पानी में अच्छी तरह धो लिया जाता है ताकि खेत की धूल या रेशे पूरी तरह साफ हो जाएं। यदि मक्के के दाने पहले से निकाल कर रखे जाएं, तो पूरा व्यंजन तैयार करने में केवल 15 से 20 मिनट का समय लगता है। हालांकि, केवल मक्के के दानों से यह घोल तैयार नहीं होता, बल्कि इसकी सही बाइंडिंग और कुरकुरेपन के लिए चावल का इस्तेमाल भी अनिवार्य है।
इस पारंपरिक अनुपात के तहत आधा किलो ताजे मक्के के दानों के साथ लगभग 200 ग्राम फूला हुआ यानी पानी में भिगोया हुआ चावल मिलाया जाता है। जब दोनों सामग्रियां आपस में मिल जाएं, तो उन्हें ग्राइंडर या मिक्सी के जार में डालकर एकदम महीन पीस लिया जाता है। यह बारीक पिसा हुआ पेस्ट ही छिलका बनाने के लिए मुख्य बेस या बैटर का काम करता है। पीसने के बाद इस पेस्ट को एक बर्तन में निकाल कर अच्छी तरह एकसार कर लिया जाता है ताकि मक्का और चावल का अर्क आपस में पूरी तरह घुल-मिल जाए।
तवे पर फैलाने और धीमी आंच पर पकाने की तकनीक
घोल तैयार हो जाने के बाद पकाने की बारी आती है। सबसे पहले गैस चूल्हे पर तवा चढ़ाकर उसे हल्का गर्म होने दिया जाता है। इसके बाद तैयार किए गए गाढ़े मिश्रण को हाथों की सहायता से तवे के बीच में रखा जाता है। हाथों से ही इसे आहिस्ता-आहिस्ता दबाते हुए गोल छिलके का आकार दिया जाता है। इस दौरान हाथों का दबाव एकसमान होना चाहिए ताकि पूरे तवे पर मोटाई बराबर रहे और मिश्रण अच्छी तरह चिपक कर अपनी जगह बना ले।
एक बार आकार देने के बाद गैस की आंच मध्यम रखी जाती है। धीमी से मध्यम आंच पर धीरे-धीरे पकने से मक्के का कच्चापन दूर होता है और नीचे की सतह पर हल्का सुनहरा रंग आने लगता है। साथ ही रसोई में सोंधी और मनमोहक खुशबू फैलने लगती है। आंच को तेज करने से छिलका बाहर से काला पड़ सकता है और भीतर से कच्चा रह सकता है, इसलिए इसे धैर्यपूर्वक पकाना जरूरी होता है।
कुरकुरा होने तक सिकाई और परोसने का पारंपरिक तरीका
जब नीचे की परत अच्छी तरह सिक जाए और किनारों से सुनहरी दिखने लगे, तब इसे तवे पर तब तक सेंका जाता है जब तक कि यह पूरी तरह पककर हल्का क्रिस्पी न हो जाए। दोनों तरफ से संतुलित सिकाई होने के बाद इसे बहुत सावधानी से तवे से उतारकर एक थाली में रख लिया जाता है। गरमागरम उतरे इस छिलके को तुरंत खाने के बजाय थोड़ी देर के लिए छोड़ दिया जाता है ताकि इसकी अत्यधिक भाप निकल जाए और यह हल्का शीतल हो जाए।
हल्का ठंडा होने के बाद इसे खाने का असली आनंद मिलता है। ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रों में इसे ताजे दही, शुद्ध देसी गुड़ अथवा बोदी की सब्जी के साथ परोसा जाता है। मक्के के छिलके की अपनी हल्की कुदरती मिठास जब ठंडे दही की ताजगी, गुड़ के गाढ़े मीठेपन या बोदी की नमकीन-मसालेदार सब्जी के साथ मिलती है, तो इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। मक्के के सीजन में यह सादा लेकिन पौष्टिक देसी खाना हर किसी की पसंद बन जाता है।



















