कोडरमा जिले के चंदवारा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले आरागारो गांव की रहने वाली किरण देवी ने अपनी कड़ी मेहनत के जरिए सफलता की एक मिसाल कायम की है। यह साबित हो चुका है कि यदि किसी व्यक्ति में कुछ कर दिखाने का हौसला हो और उसकी दिशा सही हो, तो एक बेहद छोटी शुरुआत भी बड़े मुकाम पर पहुंच सकती है। आज उनका नाम उन ग्रामीण महिलाओं में शुमार है जिन्होंने खुद के बलबूते अपनी आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
साल 2012 में हुई थी इस कारोबार की शुरुआत
इस पूरी सफलता की नींव आज से करीब चौदह साल पहले यानी वर्ष 2012 में रखी गई थी। उस दौरान सपोर्ट नामक एक संस्था की तरफ से ग्रामीण इलाकों में आजीविका के साधन बढ़ाने के लिए कुछ प्रयास किए जा रहे थे। इसी कड़ी में किरण देवी को मदद के रूप में चार मुर्गे और आठ मुर्गियां सौंपी गई थीं। उस वक्त उनके पास व्यवसाय को विस्तार देने के लिए बड़े पैमाने पर संसाधन या पूंजी नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने मिले हुए इस शुरुआती अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया और पूरी लगन के साथ उस पर काम करना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे ऐसे बढ़ा पक्षियों का कुनबा
शुरुआत में केवल बारह पक्षियों से काम शुरू करने वाली किरण देवी ने उनकी परवरिश में किसी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने मुर्गा-मुर्गियों की उचित देखभाल की और उनके प्रजनन के जरिए धीरे-धीरे इनकी संख्या में इजाफा करना शुरू कर दिया। सही प्रबंधन और उनकी लगातार मेहनत का ही नतीजा था कि उनका यह छोटा सा प्रयास देखते ही देखते एक बड़े कारोबार में तब्दील हो गया। इन चौदह वर्षों के लंबे सफर के दौरान वह अब तक कई हजार मुर्गा-मुर्गियों की बिक्री कर चुकी हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि उनके पोल्ट्री फार्म में लगभग एक हजार मुर्गा-मुर्गियां पल रही हैं।
देसी और सोनाली नस्ल का हो रहा पालन
वर्तमान समय में किरण देवी अपने इस फार्म में मुख्य रूप से दो अलग-अलग प्रकार की मुर्गियों का पालन कर रही हैं। इनमें पहली श्रेणी देसी मुर्गियों की है जबकि दूसरी श्रेणी सोनाली नस्ल की मुर्गियों की है। इन दोनों नस्लों को पालने के पीछे उनका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है और इससे उन्हें कमाई के अलग-अलग स्रोत मिल जाते हैं। उन्होंने इस बारे में विस्तार से बताया कि देसी मुर्गियों के अंडों के जरिए नए चूजे तैयार किए जाते हैं। इसके बाद जब ये चूजे आकार में बड़े हो जाते हैं तो उन्हें बाजार में बेच दिया जाता है। दूसरी तरफ सोनाली नस्ल की मुर्गियों को मुख्य रूप से अंडे के उत्पादन के लिए पाला जा रहा है। इसके साथ ही मुर्गी और मुर्गा की बिक्री से भी उन्हें नियमित तौर पर अच्छी खासी आय प्राप्त हो जाती है।
घर के कामों के साथ ऐसे संभालती हैं फार्म
ग्रामीण परिवेश में जीवन बिताने वाली महिलाओं के लिए घर की जिम्मेदारियों को संभालते हुए कोई अन्य कार्य करना आसान नहीं होता है। इसके बावजूद किरण देवी अपने घर और खेती-किसानी से जुड़े तमाम कार्यों को पूरा करने के साथ-साथ इस पोल्ट्री फार्म का संचालन भी बहुत ही बेहतरीन तरीके से कर रही हैं। उन्होंने अपने दैनिक कामकाज के बारे में बताया कि वह रोज सुबह और शाम के समय कुछ घंटे निकालकर इन मुर्गा-मुर्गियों को दाना-पानी देती हैं और उनकी सेहत पर नजर रखती हैं। इसके बाद वह अपने घर के बाकी जरूरी कामों में लग जाती हैं।
देखभाल के लिए जरूरी हैं ये बातें
मुर्गी पालन के इस व्यवसाय में नियमित तौर पर ध्यान देना और उचित प्रबंधन करना सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। समय पर दाना और पानी उपलब्ध कराना, पक्षियों की शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखना और उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखना इस काम का मुख्य आधार है। किरण देवी ने यह भी साझा किया कि यदि इन छोटे चूजों को सही और समय पर देखभाल मिल जाए, तो वे लगभग नब्बे दिनों के भीतर पूरी तरह से बड़े हो जाते हैं और बिक्री के लिए तैयार हो जाते हैं।
हर महीने हो रही पंद्रह हजार रुपये की आय
किरण देवी बताती हैं कि इस पोल्ट्री फार्म के संचालन से उन्हें हर महीने लगभग पंद्रह हजार रुपये की ठोस आमदनी हो जाती है। इस कमाई की बदौलत वह अपने परिवार की रोजमर्रा की जरूरत का सामान आसानी से खरीद लेती हैं। इसके साथ ही इस पैसों से वह अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाने के अलावा घर के अन्य जरूरी मामलों में भी आर्थिक सहयोग प्रदान करती हैं। सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुआ यह सफर आज उनके परिवार के लिए एक बड़ा संबल बन चुका है।





















