झारखंड के पलामू इलाके में पारंपरिक फसलों से अलग स्ट्रॉबेरी का उत्पादन काश्तकारों के बीच आर्थिक मजबूती का एक नया जरिया बनकर उभर रहा है। नकदी फसल होने के कारण इसमें कमाई की भरपूर संभावनाएं मौजूद हैं, मगर बेहतर पैदावार और आकर्षक मुनाफा हासिल करने के लिए सही कृषि पद्धतियों को अपनाना अनिवार्य माना जाता है। इसी क्रम में मल्चिंग तकनीक का प्रयोग फसल की गुणवत्ता सुधारने, खरपतवार की रोकथाम करने तथा जमीन के भीतर जरूरी नमी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में बेहद असरदार साबित हो रहा है। काश्तकार बाजार से खरीदी जाने वाली कृत्रिम प्लास्टिक शीट के अलावा स्थानीय जैविक सामग्री से भी मल्चिंग कर सकते हैं, जिससे उत्पादन लागत घटती है और मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुधरता है।
रेज्ड बेड पद्धति और जैविक मल्च के दोहरे फायदे
पलामू जिले के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, स्ट्रॉबेरी की व्यवस्थित खेती के लिए खेत में उठी हुई क्यारियां यानी रेज्ड बेड तैयार करना और उन पर मल्चिंग लगाना तकनीकी रूप से अत्यंत उपयोगी रहता है। इस कार्य के लिए प्लास्टिक मल्च अथवा ऑर्गेनिक मल्च में से किसी का भी चयन किया जा सकता है। हालांकि, जैविक मल्च काश्तकारों के बजट और खेत की सेहत दोनों के लिहाज से कई मामलों में अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। इसके तहत खेतों में पेड़ों की सूखी पत्तियां, फसलों का पुआल और अन्य प्राकृतिक जैविक अवशेष बिछाए जा सकते हैं। चूंकि यह सामग्री स्थानीय स्तर पर ही आसानी से मिल जाती है, इसलिए बाहर से सामग्री खरीदने का अतिरिक्त खर्च पूरी तरह बच जाता है।
भूमि की उर्वरा शक्ति और नमी संरक्षण
ऑर्गेनिक मल्च के तकनीकी फायदों की चर्चा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्राकृतिक आवरण भूमि में जल धारण क्षमता को बनाए रखता है, जिसके चलते बार-बार पानी देने या सिंचाई करने की विवशता काफी हद तक कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त, धूप सीधे जमीन पर न पड़ने के कारण अवांछित खरपतवारों का उगना और फैलना भी थम जाता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, यह जैविक परत धीरे-धीरे सड़कर जमीन में समा जाती है और उसमें जैविक कार्बन तथा पोषक तत्वों का इजाफा करती है। इससे खेत की संरचना में उल्लेखनीय सुधार आता है और उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इस विधि में ध्यान रखने योग्य मुख्य बात यह है कि स्ट्रॉबेरी के नाजुक फलों को सड़ांध से सुरक्षित रखने के लिए मल्च की परत को हमेशा साफ-सुथरा और संतुलित मात्रा में बिछाना चाहिए।
प्लास्टिक मल्च की मोटाई और माइक्रोन का पैमाना
जो काश्तकार खेत में प्लास्टिक मल्च शीट बिछाने का विकल्प चुनते हैं, उन्हें उसकी मोटाई यानी माइक्रोन के मानक पर विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। स्ट्रॉबेरी की सामान्य खेती के दौरान प्रायः 25 माइक्रोन मोटाई वाली प्लास्टिक फिल्म का उपयोग व्यावहारिक माना जाता है। यदि फसल का चक्र केवल तीन महीने की अल्पावधि का है, तो वहां 20 माइक्रोन की शीट भी काम कर सकती है। वहीं दूसरी ओर, यदि फसल चक्र लंबा है, तो अधिक समय तक टिकने वाली मजबूत और टिकाऊ शीट को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि वह बीच में ही खराब न हो।
बाजार में लागत और गुणवत्ता की पहचान
डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि बाजार से प्लास्टिक मल्चिंग खरीदते समय सामग्री की मजबूती और टिकाऊपन की जांच अवश्य कर लेनी चाहिए, ताकि वह बिछाते वक्त या मौसम के प्रभाव से जल्दी न फटे। वर्तमान में बाजार में 25 से 30 माइक्रोन मोटाई वाली लगभग 450 मीटर लंबी प्लास्टिक शीट तकरीबन 1500 रुपये के मूल्य पर उपलब्ध हो जाती है। लंबी अवधि की फसल लेने वाले किसानों को टिकाऊपन के लिए ज्यादा माइक्रोन वाली शीट लगानी चाहिए, जबकि जैविक मल्च अपनाने वाले किसान स्थानीय संसाधनों के सहारे अपनी कुल लागत घटाकर लाभ का दायरा और अधिक विस्तृत कर सकते हैं।
























