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जमशेदपुर में मिट्टी के 50 हजार घड़ों से सजा अनोखा दुर्गा पूजा पंडाल, पर्यावरण संरक्षण का संदेशझारखंड
12 अक्तू॰ 2026, 9:09 pm (36 मिनट पहले)· 0

जमशेदपुर में मिट्टी के 50 हजार घड़ों से सजा अनोखा दुर्गा पूजा पंडाल, पर्यावरण संरक्षण का संदेश

जमशेदपुर के कसीडीह में इस साल ठाकुर प्यार सिंह धुरंधर सिंह स्पोर्टिंग क्लब द्वारा एक अनूठा इको-फ्रेंडली दुर्गा पूजा पंडाल तैयार किया जा रहा है। प्लास्टिक और थर्माकोल से पूरी तरह दूर इस पंडाल को बनाने में करीब 50 हजार मिट्टी के घड़ों और बांस का इस्तेमाल किया जा रहा है।

त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही झारखंड के जमशेदपुर में उल्लास का माहौल देखने को मिल रहा है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में हर साल की तरह इस बार भी भव्य और कलात्मक पूजा पंडालों का निर्माण कार्य जोरों पर चल रहा है। इसी सिलसिले में कसीडीह स्थित ठाकुर प्यार सिंह धुरंधर सिंह स्पोर्टिंग क्लब का आगामी दुर्गा पूजा पंडाल शहरवासियों के बीच विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बार इस पंडाल की रूपरेखा आधुनिक कृत्रिम सजावट से कोसों दूर, पूरी तरह से प्रकृति, माटी और भारतीय परंपराओं के इर्द-गिर्द बुनी गई है।

पर्यावरण प्रेम और पारंपरिक संस्कृति की अनूठी मिसाल

इस बार इस आयोजन को पूरी तरह से टिकाऊ, प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है। इस भव्य रचना की सबसे बड़ी विशेषता इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री है, जिसे करीब 50 हजार मिट्टी के घड़ों को आपस में जोड़कर तैयार किया जा रहा है। पारंपरिक रूप से होने वाली पूजा-अर्चना, धूप और आरती के सांस्कृतिक सार से प्रेरणा लेते हुए इस पूरे ढांचे की परिकल्पना की गई है। बांस और मिट्टी के बर्तनों का यह मेल दर्शकों को अपनी मूल जड़ों और प्राकृतिक परिवेश से फिर से जुड़ने की प्रेरणा देगा।

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पश्चिम बंगाल के हुनरमंद कारीगरों की दो महीने की मेहनत

इस विशाल कलाकृति को मूर्त रूप दे रहे कारीगर दीपू सावन ने बताया कि उनकी यह कुशल टीम विशेष तौर पर पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर से जमशेदपुर पहुंची है। लगभग 25 कारीगरों का यह समूह पिछले दो महीनों से लगातार इस अनूठे ढांचे को खड़ा करने में अपना पसीना बहा रहा है। निर्माण कार्य में केवल मिट्टी के घड़ों और बांस का प्रयोग किया जा रहा है ताकि आधुनिक चकाचौंध से अलग हटकर समाज को पर्यावरण सुरक्षा और प्राकृतिक घटकों के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके।

प्लास्टिक और थर्माकोल मुक्त सजावट

वर्तमान समय में जब अधिकांश आयोजनों में थर्माकोल, प्लास्टिक और भारी कृत्रिम लाइटों का अंधाधुंध इस्तेमाल होता है, तब यह पंडाल एक अलग ही मिसाल पेश कर रहा है। आयोजकों का मुख्य उद्देश्य ऐसी सामग्रियों को प्राथमिकता देना है जिससे पर्यावरण को न्यूनतम क्षति पहुंचे। मिट्टी के इन बर्तनों और बांस के जरिए तैयार हो रही यह अनूठी शिल्पकारी पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और कारीगरों की बेजोड़ मेहनत को भी बख़ूबी प्रदर्शित करती है।

मेले जैसा माहौल और पारिवारिक आकर्षण

पंडाल परिसर में केवल मां दुर्गा के अलौकिक दर्शन ही नहीं होंगे, बल्कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को पारंपरिक मेले का भरपूर आनंद उठाने का मौका भी मिलेगा। दर्शनार्थियों के खानपान के लिए कई स्वादिष्ट व्यंजनों की स्टॉल लगाई जा रही हैं और बच्चों के मनोरंजन के लिहाज से विभिन्न प्रकार के झूले भी स्थापित किए जा रहे हैं। इन सभी व्यवस्थाओं के कारण पूरे उत्सव क्षेत्र में एक जीवंत और उत्सवधर्मी रौनक देखने को मिलेगी, जिससे यह स्थल परिवारों के घूमने और खरीदारी करने का प्रमुख केंद्र बन जाएगा।

आधुनिकता के दौर में धरोहर को बचाने का प्रयास

आज के इस तकनीकी युग में जहां दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिकता की अंधी दौड़ में आगे बढ़ रही है, कसीडीह का यह आयोजन हमारी सांस्कृतिक धरोहर की याद दिलाता है। मिट्टी के इन घड़ों से गढ़ी गई यह कलाकृति स्पष्ट संदेश देती है कि विकास के पथ पर आगे बढ़ते हुए भी अपनी प्राचीन संस्कृति और पर्यावरण का संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक है। यह पंडाल न केवल भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मन में प्रकृति के प्रति एक सकारात्मक सोच भी पैदा करेगा।

सवाल-जवाब

जमशेदपुर में यह अनोखा पंडाल कहाँ बनाया जा रहा है?
यह पंडाल जमशेदपुर के कसीडीह स्थित ठाकुर प्यार सिंह धुरंधर सिंह स्पोर्टिंग क्लब द्वारा बनाया जा रहा है।
इस पंडाल को बनाने में किस मुख्य सामग्री का उपयोग हो रहा है?
इस पंडाल को तैयार करने के लिए करीब 50 हजार मिट्टी के घड़ों और बांस का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस पंडाल को बनाने वाले कारीगर कहाँ से आए हैं?
इस पंडाल का निर्माण पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर से आए लगभग 25 कारीगरों की टीम द्वारा किया जा रहा है।
कारीगरों को इस पंडाल को तैयार करने में कितना समय लगा है?
करीब 25 कारीगरों की यह टीम पिछले दो महीनों से इस अनोखे पंडाल को बनाने में जुटी हुई है।
पंडाल के आसपास आगंतुकों के लिए क्या विशेष व्यवस्था है?
दर्शनार्थियों के लिए खाने-पीने की कई दुकानें और बच्चों के मनोरंजन हेतु झूले लगाए जा रहे हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·15 मिनट पहले

पचास हजार मिट्टी के घड़े जुटाना और संभालना आसान नहीं होगा। वैसे सोच अच्छी है, पर भीड़ में टूटने-फूटने का खतरा भी कम नहीं रहेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·15 मिनट पहले

रोहन भाई, बात तो सही है आपकी। पर ये सोचिए कि इतने सारे घड़े पूजा खत्म होने के बाद जाएंगे कहां?

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