पलामू जिले में पशुओं के बीच फैल रही एक संक्रामक बीमारी को लेकर पशु चिकित्सा विभाग ने पशुपालकों को सतर्क किया है। अगर आपकी गाय या भैंस अचानक कम दूध देने लगी है, तो यह सामान्य बात नहीं बल्कि खुरपका-मुंहपका रोग यानी एफएमडी का संकेत हो सकता है। सरकार लगातार पशुओं को इस बीमारी से बचाने के लिए टीकाकरण अभियान चला रही है, फिर भी सही समय पर लक्षण पहचानना पशुपालकों के लिए बेहद जरूरी है।
किन पशुओं को है ज्यादा खतरा
एफएमडी खासतौर पर उन पशुओं में ज्यादा फैलती है जिनके खुर दो हिस्सों में बंटे होते हैं। गाय और भैंस समेत दूध देने वाले तमाम पशु इसकी चपेट में आ सकते हैं। यह बीमारी सिर्फ पशु की सेहत ही नहीं बिगाड़ती, बल्कि सीधा असर उसके दूध उत्पादन पर भी डालती है, जिससे पशुपालकों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।
शुरुआती लक्षणों की पहचान
पलामू जिले के जिला पशुपालन पदाधिकारी प्रभाकर सिन्हा के मुताबिक, एफएमडी से संक्रमित पशु को शुरुआत में हल्का बुखार आता है, जो गंभीर मामलों में 105 से 106 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच सकता है। इसके बाद पशु के मुंह में छाले और घाव बनने लगते हैं, जिससे उसे चारा खाने और पानी पीने में दिक्कत होने लगती है। साथ ही पैरों के खुर के आसपास भी घाव बनने लगते हैं और वहां की त्वचा उखड़ने लगती है। अगर स्थिति और बिगड़े तो इन घावों में कीड़े पड़ने का खतरा भी रहता है। नतीजतन पशु कमजोर होता जाता है और दुधारू पशुओं में दूध उत्पादन घटने लगता है।
मुंह के घाव में साफ-सफाई कैसे रखें
प्रभाकर सिन्हा ने बताया कि पशु के मुंह में घाव हो जाने पर सफाई का खास ख्याल रखना चाहिए। पारंपरिक तरीके के तौर पर नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर तैयार किया गया घोल मुंह साफ करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। पशु को हमेशा पर्याप्त मात्रा में साफ पानी और नरम चारा देना चाहिए, ताकि उसे खाने-पीने में तकलीफ न हो। इसके अलावा फिटकरी और हल्दी जैसे घरेलू नुस्खे भी अपनाए जा सकते हैं।
पैर और खुर के घाव में क्या सावधानी बरतें
अगर पशु के पैरों और खुर में घाव हो गए हैं, तो उसे साफ और सूखी जगह पर रखना बेहद जरूरी है। घाव में संक्रमण फैलने या कीड़े पड़ने की नौबत आने पर बिना देर किए पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। सिन्हा ने साफ तौर पर आगाह किया कि बिना विशेषज्ञ की सलाह के तारपीन तेल या कोई भी मलहम पशु पर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि गलत तरीके से लगाने पर घाव और गहरा हो सकता है।
टीकाकरण ही सबसे भरोसेमंद बचाव
प्रभाकर सिन्हा के मुताबिक एफएमडी से बचने का सबसे कारगर तरीका समय पर टीकाकरण करवाना है। सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम के तहत तय अंतराल पर पशुओं को एफएमडी का टीका लगाया जाता है, और पशुपालकों को हर बार यह टीकाकरण अभियान चलने पर अपने पशु को जरूर टीका लगवाना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एफएमडी एक संक्रामक बीमारी है, इसलिए लक्षण दिखते ही बीमार पशु को बाकी पशुओं से अलग रख देना चाहिए और तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। समय पर पहचान, सही इलाज और नियमित टीकाकरण से न सिर्फ पशु को स्वस्थ रखा जा सकता है, बल्कि दूध उत्पादन में होने वाले नुकसान को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।



















