गांव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं जैसे प्रसिद्ध गीतों के रचनाकार मधु मंसूरी हंसमुख आज झारखंड से लेकर ओडिशा और बंगाल तक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। उनके द्वारा रचे गए यह गीत पर्यावरण संरक्षण और जल, जंगल, जमीन बचाने के अभियानों की पहचान बन चुके हैं। उनके इस कलात्मक योगदान के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान के साथ-साथ झारखंड रत्न और विभूति रत्न से भी नवाजा जा चुका है।
पिता से मिली संगीत की शुरुआती सीख
महज आठ वर्ष की उम्र से गायन की शुरुआत करने वाले इस लोक कलाकार ने जीवन में कभी कोई औपचारिक संगीत प्रशिक्षण नहीं लिया है। उन्होंने संगीत की कोई कक्षा ज्वाइन नहीं की और न ही राग-ताल की कोई शास्त्रीय बारीकी सीखी। उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने पिता से मिली जिन्हें संगीत का गहरा शौक था। वह बताते हैं कि पांच साल की उम्र से ही उनके पिता उन्हें सामने बिठाकर संगीत सिखाते थे और उन्होंने जो कुछ भी सीखा है वह सब अपने पिता से ही सीखा है। उनके पिता पर्यावरण और आसपास के लोगों के दुखों को लेकर बेहद संवेदनशील रहते थे और इन्हीं विषयों पर गीत तैयार करते थे तथा चर्चा करते थे। यही संवेदनशीलता उनकी रचनाओं में भी साफ झलकती है क्योंकि उनका मानना है कि गीत विचारों और संदेशों को दुनिया तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम है।
झारखंड आंदोलन में गीतों का गूंजता स्वर
उनकी रचनाओं में हमेशा जल, जंगल, जमीन के अधिकार और प्रकृति को बचाने का संदेश प्रमुखता से झलकता है। उनके गानों में अपने वजूद की रक्षा और हक की बात होती है, जिस वजह से पड़ोसी राज्यों में भी उनके गीत काफी लोकप्रिय हैं। उनकी एकमात्र इच्छा यही है कि गीतों के माध्यम से झारखंड को आगे बढ़ाया जाए। संगीत के प्रति उनका समर्पण ऐसा है कि वह रोज सुबह तीन बजे उठकर गीत लिखते हैं और उन्हें सुरों में ढालने का अभ्यास करते हैं। नागपुरी क्षेत्रीय भाषा में आधुनिक राग और रंग लाने वाले वह पहले रचनाकार हैं। उनके लिखे गीत झारखंड के हर गांव और गली में गूंजते हैं।
नागपुरी गीतों के आधुनिक पुरोधा
राज्य के अलग राज्य आंदोलन में राजनीतिक दिग्गजों के साथ-साथ सांस्कृतिक कर्मियों ने भी अहम भूमिका निभाई थी, जिसमें उनका योगदान अतुलनीय है। उस संघर्ष के दौरान उनका लिखा गीत झारखंड में खेती बाड़ी, पटना में खलिहान काफी लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने नागपुरी गीतों का वैज्ञानिक वर्गीकरण भी किया है। पचहत्तर वर्ष की उम्र में भी वह आराम करने के बजाय लगातार सक्रिय हैं ताकि नागपुरी गीतों की यह अनमोल परंपरा जीवित रहे और नई पीढ़ी के लोग इससे प्रेरणा लेकर आगे आएं। नागपुरी मंच के प्रेमी और श्रोता उन्हें प्यार से नागपुरी मंच का राजकुमार कहकर पुकारते हैं।


















