राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित रायला कस्बे का धार्मिक परिवेश इन दिनों पूरी तरह भक्ति के रंग में रंगा नजर आ रहा है। यहां स्थित लगभग दो सौ वर्ष पुराने श्री चौथ मातेश्वरी धाम में आयोजित होने वाला वार्षिक नवरात्र मेला क्षेत्रीय जनमानस की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस पावन अवसर पर रायला के स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त आसपास के लगभग 50 गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां भगवती के दर्शन और नमन के लिए पहुंचे। स्थानीय भक्तों में यह दृढ़ विश्वास है कि चौथ माता के चरणों में शीश झुकाने और विधिवत अर्चना करने से पूरे क्षेत्र, समाज और परिवारों में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है।
एक ही परिसर में तीन दिव्य शक्तियों के दर्शन की अनूठी महत्ता
इस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की आध्यात्मिक महत्ता को यहां का अनूठा देव स्वरूप और भी खास बना देता है। मंदिर के पावन परिसर में भक्तों को एक साथ तीन पवित्र देव स्वरूपों के दर्शन का सुअवसर मिलता है। गर्भगृह के मुख्य स्थल पर श्री चौथ मातेश्वरी प्रतिष्ठित हैं, जबकि उनके साथ ही मां चामुंडा की पावन प्रतिमा विराजमान है। इनके ठीक सामने भगवान श्री भैरवनाथ जी का सिद्ध स्थान बना हुआ है। तीन प्रमुख दैवीय स्वरूपों की इस संयुक्त उपस्थिति के चलते इस तीर्थ स्थल के प्रति दूर-दराज के लोगों में अगाध श्रद्धा है। इसके अलावा, नवरात्र पर्व के दौरान पूरे गांव में मां भगवती की पावन जोत निकालने की बरसों पुरानी परंपरा का निर्वहन भी पूरे श्रद्धा भाव और सामूहिक उल्लास के साथ किया जाता है।
ढोल-नगाड़ों के साथ निकाली गई 30 फीट विशाल ध्वज यात्रा
वार्षिक नवरात्र उत्सव के दौरान आयोजित होने वाले इस मेले का मुख्य केंद्र बिंदु 30 फीट ऊंचा भव्य ध्वज रहा। वीर तेजा नवयुग मंडल के कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों द्वारा बीते 16 वर्षों से लगातार इस विशाल ध्वज को मंदिर शिखर पर अर्पित करने का संकल्प निभाया जा रहा है। इस अनुष्ठान के तहत लांबिया गेट से एक विशाल शोभायात्रा प्रारंभ हुई, जिसमें ढोल-नगाड़ों, बैंड-बाजों की मंगल ध्वनि और भक्तों के जयघोष ने संपूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया। दोपहर के समय यह भव्य ध्वज यात्रा श्री चौथ मातेश्वरी के मुख्य द्वार पर पहुंची। इसके बाद मंदिर प्रबंधन समिति और स्थानीय ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से पूरे अंचल की खुशहाली, निरोग जीवन और संपन्नता की मंगल कामना करते हुए इस विशाल ध्वज को माता के दरबार में श्रद्धापूर्वक चढ़ाया।
दूर-दराज के शहरों और बेंगलुरु से भी दर्शन को पहुंचे श्रद्धालु
क्षेत्रीय निवासी सूरज कुमार ने मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी साझा करते हुए बताया कि यह धाम करीब दो शताब्दी पुराना है और इसी प्राचीन गौरव के कारण इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। इस वर्ष नवरात्र के दौरान केवल स्थानीय अंचल ही नहीं, बल्कि राजस्थान के बड़े शहरों जैसे जयपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, नाथद्वारा और कांकरोली से भी भारी तादाद में भक्तजन यहां पहुंचे। इतना ही नहीं, कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से भी श्रद्धालु माता के दरबार में मत्था टेकने रायला पहुंचे। कई भक्त मीलों का सफर पैदल तय करके ध्वज लेकर पहुंचे, तो अनेक श्रद्धालु अपने निजी वाहनों के जरिए माता के दर्शन करने आए। फूलों से की गई विशेष सजावट और मंदिर प्रांगण में की गई रंग-बिरंगी रोशनी ने मेले के पूरे परिवेश को अत्यंत भव्य और मनोहारी बना दिया।
























