झारखंड के देवघर जिले में स्थित रोहिणी कस्बे में एक ऐसी सिलाई की दुकान चल रही है, जिसकी नींव देश की आजादी से भी करीब पौने दो दशक पहले रखी गई थी। पिछले आठ दशकों में भारत के परिधान बाजार में भारी बदलाव आए हैं, फैशन के नए दौर आए और दर्जी से कपड़े सिलवाने के पारंपरिक चलन पर रेडीमेड कपड़ों का दबदबा बढ़ता गया। इस व्यापक बदलाव के बावजूद रोहिणी की इस ऐतिहासिक दुकान पर ग्राहकों का विश्वास आज भी वैसा ही कायम है जैसा शुरुआती दिनों में था। साल 1930 में खुली यह दुकान लगातार चल रही है और आसपास के ग्रामीण अंचलों से लेकर सुदूर इलाकों तक के लोग यहां अपने कपड़े सिलवाने के लिए नियमित रूप से पहुंचते हैं। आम तौर पर दर्जियों के पास कपड़े सिलवाने के लिए ग्राहकों को हफ्तों इंतजार करना पड़ता है, लेकिन इस प्रतिष्ठान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कुछ ही घंटों के भीतर कपड़े तैयार करके थमा दिए जाते हैं।
अंग्रेजी हुकूमत के दौर में 2 रुपये से शुरू हुआ था सिलाई का सफर
इस कारोबार की शुरुआत वर्तमान संचालक मोहम्मद वाजिद के पिता ने वर्ष 1930 में की थी। उस समय पूरा भारत ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था और रोहिणी क्षेत्र में भी अंग्रेजों की बसावट थी। दुकान से कुछ ही दूरी पर अंग्रेज अधिकारी और परिवार रहा करते थे, जिनके कपड़े सिलने का जिम्मा मोहम्मद वाजिद के पिता के पास ही था। उस दौर में श्रम और कारीगरी का मेहनताना आज के मुकाबले बेहद मामूली हुआ करता था। उस जमाने में एक पूरी शर्ट और पैंट की सिलाई केवल दो रुपये में कर दी जाती थी, जबकि महिलाओं के ब्लाउज की सिलाई का शुल्क महज दो आना तय था। समय गुजरने के साथ देश में मुद्रा का मूल्य बदला, महंगाई बढ़ी और सिलाई की दरें भी धीरे-धीरे बढ़ती चली गईं, लेकिन दुकान के भीतर सुई-धागे की हरकत कभी थमी नहीं। पिता के निधन के बाद इस पुश्तैनी काम को मोहम्मद वाजिद के बड़े भाई ने संभाला और फिर बाद में वाजिद ने खुद इस सिलाई परंपरा की बागडोर अपने हाथों में ली।
रोहिणी स्टेट के राजा साहब भी यहीं से सिलवाते थे पोशाकें
मोहम्मद वाजिद के अनुसार, जब उन्होंने स्वयं दुकान का कार्यभार पूरी तरह संभाला, उस समय रोहिणी स्टेट के राजा साहब यानी घटवाल साहब भी अपने परिधान इसी दुकान से तैयार करवाते थे। उस कालखंड में समाज के रसूखदार, प्रशासनिक और राजघराने से जुड़े संभ्रांत लोगों से लेकर सामान्य नागरिक तक सभी इसी दुकान पर अपने कपड़े सिलवाने आते थे। बेहतरीन फिटिंग और भरोसेमंद सेवा के चलते दुकान की प्रतिष्ठा धीरे-धीरे रोहिणी की सीमाओं को लांघकर आसपास के कई देहाती क्षेत्रों में फैल गई। आज भी स्थिति यह है कि रोहिणी कस्बे के अलावा सुदूर देहात के लोग यहां कपड़े सिलवाने खिंचे चले आते हैं। सिलाई दरों में भी वक्त के साथ बड़ा अंतर आया है। जिस शर्ट और पैंट की जोड़ी कभी महज दो रुपये में सिली जाती थी, आज उसी जोड़ी की सिलाई का मेहनताना करीब 550 रुपये हो चुका है। पहनावे की शैलियां बदल गईं, कपड़ों का स्वरूप बदला, मगर इस दुकान पर काम की रफ्तार नहीं थमी।
अब तीसरी पीढ़ी संभाल रही है सिलाई की यह पारिवारिक विरासत
समय के चक्र के साथ अब इस दुकान के संचालन की सीधी जिम्मेदारी मोहम्मद वाजिद के बेटे के हाथों में आ चुकी है। इस तरह एक ही छत के नीचे एक ही परिवार की तीन पीढ़ियां इस पेशे को लगातार आगे बढ़ा रही हैं। दादा ने गुलामी के दौर में इस कारोबार की नींव रखी, फिर बेटों ने इसे विस्तार दिया और अब पोता नई सदी में इस विरासत को संभाल रहा है। आज के उपभोक्तावादी दौर में जब अधिकांश युवा और कामकाजी लोग मॉल व दुकानों से रेडीमेड कपड़े खरीदने को प्राथमिकता देते हैं, तब भी इस पारंपरिक टेलरिंग दुकान पर ग्राहकों की कतारें खत्म नहीं हुई हैं। इस निरंतर आकर्षण का सबसे मजबूत आधार वही पुराना वादा है, जिसके तहत यहां कुछ ही घंटों में कपड़े सिलकर ग्राहकों को सौंप दिए जाते हैं। लगभग एक सदी के अपने ऐतिहासिक सफर में इस प्रतिष्ठान ने कई व्यवस्थागत उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन परिवार का परिश्रम और साख आज भी रोहिणी में जस की तस चमक रही है।


















