रिटायरमेंट की उम्र नजदीक आते ही ज्यादातर लोगों के मन में एक ही सवाल घूमने लगता है, बुढ़ापा आराम से कटेगा या नहीं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले प्रभात का कहना है कि इस सवाल का जवाब आज से नहीं, बल्कि रिटायरमेंट से कम से कम 10 साल पहले ही तैयार कर लेना चाहिए. उनके मुताबिक अगर वक्त रहते पांच जरूरी बातों पर ध्यान दे दिया जाए, तो न पैसों की टेंशन रहती है और न सेहत बिगड़ने का डर.
पैसा जोड़ने की आदत जल्दी डालें
प्रभात का पहला सुझाव पैसों से जुड़ा है. उनका कहना है कि रिटायरमेंट से 10 साल पहले ही एसआईपी यानी सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान शुरू कर देना चाहिए, चाहे रकम सिर्फ 100 रुपये महीने की ही क्यों न हो. उनके अनुसार आज यह रकम मामूली लग सकती है, लेकिन 10 साल तक लगातार निवेश करने पर यह एक ठीकठाक फंड में बदल जाती है. इससे न सिर्फ रिटायरमेंट के बाद हाथ में पैसा रहता है, बल्कि आत्मविश्वास भी बना रहता है कि जरूरत पड़ने पर खुद के दम पर खर्च संभाला जा सकता है.
हड्डियां मजबूत रखने वाला योग जरूरी
पैसों के अलावा शरीर को भी उतनी ही तैयारी की जरूरत होती है. प्रभात के मुताबिक रोजाना योगाभ्यास करना चाहिए, खासकर वे आसन जो हड्डियों को मजबूत बनाते हैं. उनका कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ गिरने और चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है, और मजबूत हड्डियां इस खतरे को काफी हद तक कम कर देती हैं. यही वजह है कि योग को उन्होंने रिटायरमेंट की तैयारी का उतना ही अहम हिस्सा बताया, जितना पैसा जोड़ना.
40 के बाद खानपान पर लगाम जरूरी
प्रभात ने उम्र के चालीसवें साल को एक टर्निंग पॉइंट बताया. उनकी सलाह है कि इस उम्र के बाद मैदा और चीनी जैसी चीजों से जितना हो सके दूरी बना लेनी चाहिए. साथ ही रात का खाना शाम 6 बजे तक निपटा लेना चाहिए. उनके मुताबिक ऐसा करने से शुगर और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां दूर रहती हैं, और जब बीमारियां नहीं आतीं तो अस्पताल के खर्च भी अपने आप घट जाते हैं. यानी सही खानपान सीधे-सीधे जेब पर पड़ने वाले बोझ को भी हल्का कर देता है.
ध्यान और आध्यात्म से मिलती है समझ
प्रभात इसके बाद मानसिक और आध्यात्मिक तैयारी पर आते हैं. उनका सुझाव है कि मेडिटेशन को रोज की आदत बनाया जाए और संतों की आत्मकथाएं पढ़ी जाएं. उनके अनुसार इससे चेतना का स्तर बढ़ता है और एक अलग तरह का ज्ञान मिलता है, जो बुढ़ापे में आने वाली छोटी-छोटी उलझनों को सुलझाने में काम आता है. यानी सिर्फ शरीर और पैसा नहीं, मन को भी उतनी ही तैयारी की जरूरत होती है.
बचपन के शौक पूरे करने का वक्त
प्रभात के मुताबिक रिटायरमेंट अपने आप में कोई बुरी चीज नहीं है, बल्कि यह वह मौका है जब इंसान अपने बचपन के उन शौक को पूरा कर सकता है, जिन्हें सामाजिक जिम्मेदारियों की वजह से पूरा नहीं कर पाया. उन्होंने खुद गार्डनिंग और ट्रैवलिंग को अपने शौक के तौर पर गिनाया और कहा कि अपने पैशन को फॉलो करने से जिंदगी में एक नई ताजगी आती है और जीने का मकसद भी मिल जाता है.
पैसे से भी ऊपर है ज्ञान
सबसे आखिर में प्रभात ने जो बात कही, वह सबसे अहम मानी जा सकती है. उनके मुताबिक पैसे से भी ज्यादा जरूरी ज्ञान का होना है, और इसके लिए मेडिटेशन के साथ-साथ एक गुरु का साथ होना भी जरूरी है. उनका मानना है कि बुढ़ापे में इंसान छोटी-छोटी बातों पर आसानी से चिढ़ जाता है, खासकर तब जब उसकी बात नहीं सुनी जाती या घर-परिवार में पहले जैसी अथॉरिटी नहीं रह जाती. ऐसे मौकों पर ज्ञान ही इंसान को संभालने और शांत रहने में मदद करता है.





















