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टूटे कृत्रिम पैर के सहारे तीरंदाजी में ओलंपिक का सपना संजो रही हैं खूंटी की 13 वर्षीय सुकर्मणीझारखंड
2 नव॰ 2026, 5:44 pm (8 मिनट पहले)· 0

टूटे कृत्रिम पैर के सहारे तीरंदाजी में ओलंपिक का सपना संजो रही हैं खूंटी की 13 वर्षीय सुकर्मणी

झारखंड के खूंटी जिले की आठवीं कक्षा की ट्राइबल छात्रा सुकर्मणी टूटी कृत्रिम पैर टूटने और संसाधनों की किल्लत के बावजूद पैरा नेशनल गेम्स और ओलंपिक में निशाना साधने की तैयारी में जुटी हैं।

झारखंड के खूंटी जिले के कालामाटी स्थित पीएम श्री कस्तूरबा बालिका विद्यालय में पढ़ने वाली 13 साल की ट्राइबल छात्रा सुकर्मणी टूटी शारीरिक चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए तीरंदाजी में अपनी पहचान बनाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही हैं। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली सुकर्मणी का सबसे बड़ा सपना भारतीय तीरंदाज दीपिका कुमारी की तरह ओलंपिक के मंच तक पहुंचना और देश के लिए खेलना है। जीवन की तमाम आर्थिक और शारीरिक दुश्वारियों के बीच वह अपने लक्ष्य पर अडिग हैं और हर दिन अपने हौसले से मैदान में नई लकीर खींच रही हैं।

बचपन के हादसे में गंवाया पैर, अब टूटा सहारा भी

सुकर्मणी जब महज तीन साल की थीं, तब एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में उन्हें अपना एक पैर गंवाना पड़ा था। सालों तक बैसाखी और सीमित गतिशीलता के बीच रहने के बाद 11 साल की उम्र में उन्हें एक आर्टिफिशियल पैर लगाया गया था। उसी कृत्रिम पैर के सहारे उन्होंने चलना सीखा और तीरंदाजी जैसे संतुलन व एकाग्रता वाले खेल में कदम रखा। समय बीतने के साथ अब वह आर्टिफिशियल पैर भी निचले हिस्से से टूट चुका है। मैदान में अभ्यास जारी रखने और चलने-फिरने के लिए फिलहाल उस कृत्रिम पैर को चिपकाकर मरम्मत की गई है, ताकि उनका खेल प्रभावित न हो।

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पैरा नेशनल गेम्स की राह और जिला प्रशासन की पहल

सुकर्मणी का अगला बड़ा लक्ष्य पैरा नेशनल गेम्स में हिस्सा लेना है, जिसका आयोजन केरल के कोच्चि में होना है। इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उन्हें 15 दिसंबर को कोच्चि रवाना होना तय है, लेकिन उससे पहले उनके सामने स्टेट लेवल चैंपियनशिप क्वालिफाई करने की कड़ी चुनौती है। पीएम श्री कस्तूरबा बालिका विद्यालय की वार्डन मीनू बड़ाइक के अनुसार, सुकर्मणी के लिए एक नए और मजबूत आर्टिफिशियल पैर की व्यवस्था करने का काम खूंटी जिला प्रशासन की देखरेख में शुरू किया गया है। इसके लिए खूंटी के डीसी खुद पहल कर रहे हैं, ताकि छात्रा को जल्द से जल्द राहत मिल सके। वहीं स्कूल की रिसोर्स शिक्षक चैताली पाठक ने जानकारी दी कि दिव्यांग बच्चों की जरूरतों का स्कूल प्रबंधन और जिला प्रशासन विशेष रूप से ध्यान रखता है और आवश्यक साधन समय पर मुहैया कराने का प्रयास किया जाता है।

संसाधनों का गंभीर संकट और कोच पर निर्भरता

सुकर्मणी के सामने दोहरी बाधाएं खड़ी हैं। एक तरफ जहां उन्हें आवागमन सुगम बनाने के लिए तत्काल नए कृत्रिम पैर की दरकार है, वहीं दूसरी ओर उनके पास तीरंदाजी का अपना कोई व्यक्तिगत उपकरण या किट नहीं है। अपने अभ्यास के लिए वह पूरी तरह अपने कोच आशीष कुमार और दानिश अंसारी पर निर्भर रहती हैं। जब ये दोनों कोच स्कूल आते हैं और अपने साथ तीर-धनुष लाते हैं, तभी सुकर्मणी को आर्चरी का संसाधन उपलब्ध हो पाता है और वह अभ्यास कर पाती हैं। बुनियादी खेल सामग्री का अभाव उनकी निरंतर तैयारी में बड़ी अड़चन बना हुआ है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि और आर्थिक तंगी की दास्तान

सुकर्मणी खूंटी जिले के मरंगहदा पंचायत स्थित जोरदाग गांव की रहने वाली हैं। उनके माता-पिता गांव में ही रहकर खेतीबाड़ी करते हैं और दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। आर्थिक तंगी के चलते उनके दो बड़े भाइयों में से एक भाई रोजगार की तलाश में मुंबई पलायन कर चुका है, जबकि दूसरा बड़ा भाई खूंटी शहर में ही एक फास्ट फूड की दुकान में काम करता है। बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आने के बावजूद सुकर्मणी अपनी हिम्मत के दम पर खेल जगत में ऊंचा मुकाम हासिल करना चाहती हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारी तंत्र और समाज की मदद इस होनहार ट्राइबल खिलाड़ी को उसके सुनहरे मुकाम तक पहुंचाने में किस हद तक सहायक साबित होती है।

सवाल-जवाब

सुकर्मणी टूटी कौन हैं और वह किस खेल से जुड़ी हैं?
सुकर्मणी टूटी खूंटी जिले के पीएम श्री कस्तूरबा बालिका विद्यालय की आठवीं कक्षा की ट्राइबल छात्रा हैं और वह एक पैरा तीरंदाज हैं।
सुकर्मणी ने अपना पैर किस उम्र में और कैसे गंवाया था?
सुकर्मणी ने महज तीन साल की उम्र में एक हादसे की वजह से अपना एक पैर गंवा दिया था।
उन्हें आर्टिफिशियल पैर कब मिला था और अभी उसमें क्या समस्या है?
उन्हें 11 साल की उम्र में आर्टिफिशियल पैर मिला था, जो अब नीचे से टूट चुका है और फिलहाल चिपकाकर इस्तेमाल किया जा रहा है।
सुकर्मणी को किस आगामी राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेना है?
उन्हें 15 दिसंबर को पैरा नेशनल गेम्स में शामिल होने के लिए केरल के कोच्चि रवाना होना है, जिसके लिए पहले स्टेट लेवल चैंपियनशिप क्वालिफाई करना जरूरी है।
सुकर्मणी के पास तीरंदाजी अभ्यास के लिए क्या संसाधन हैं?
उनके पास अभ्यास के लिए अपनी कोई आर्चरी किट नहीं है; वह अपने कोच आशीष कुमार और दानिश अंसारी द्वारा लाए जाने वाले तीर-धनुष पर निर्भर हैं।
सुकर्मणी के परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी है?
उनके माता-पिता खूंटी के जोरदाग गांव में खेती और मजदूरी करते हैं, उनका एक भाई रोजगार के लिए मुंबई गया है और दूसरा खूंटी में फास्ट फूड की दुकान पर काम करता है।
सुकर्मणी के लिए नए आर्टिफिशियल पैर की व्यवस्था कौन कर रहा है?
खूंटी जिला प्रशासन और वहां के डीसी खुद पहल कर सुकर्मणी के लिए नए आर्टिफिशियल पैर की व्यवस्था करा रहे हैं।
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