झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व प्रशासन ने वन क्षेत्र के आसपास रहने वाले स्थानीय ग्रामीणों को पर्यटन से जोड़ने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। नई व्यवस्था के तहत रिजर्व क्षेत्र के निवासियों को अब जंगल की सैर करने के लिए सामान्य पर्यटकों की तरह भारी-भरकम राशि नहीं चुकानी होगी। स्थानीय लोग अब मात्र 50 रुपये प्रति व्यक्ति का न्यूनतम शुल्क देकर जंगल सफारी का अनुभव ले सकेंगे, जबकि इससे पहले उन्हें भी अन्य सैलानियों की तरह पूरे 1950 रुपये का भुगतान करना पड़ता था। इस रियायती कदम का मुख्य मकसद वन संरक्षण में स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाना और उन्हें अपने ही परिवेश के पर्यटन तंत्र से आत्मीय रूप से जोड़ना है।
इको विकास समिति के वाहनों से होगी ग्रामीणों की यात्रा
प्रबंधन की योजना के अनुसार, इस विशेष सुविधा का संचालन स्थानीय इको विकास समिति के अंतर्गत पंजीकृत सफारी वाहनों के माध्यम से किया जाएगा। छूट की यह दर केवल पलामू टाइगर रिजर्व की सीमाओं में बसे स्थानीय ग्रामीणों के लिए ही मान्य की गई है। बाहर से आने वाले सामान्य सैलानियों के लिए पहले से तय 1950 रुपये का शुल्क पूरी तरह यथावत बना रहेगा। ग्रामीणों से मिलने वाली 50 रुपये की न्यूनतम राशि को सफारी गाड़ियों के दैनिक रखरखाव, तकनीकी देखभाल और स्वच्छता व्यवस्था पर व्यय किया जाएगा, ताकि वाहनों का संचालन निरंतर और सुचारु रूप से जारी रह सके।
बेतला नेशनल पार्क में स्थित किला नाका पर आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में इन नई नीतियों पर आम सहमति बनी। इस संवाद सत्र में डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जैना ने स्थानीय ग्रामीणों और वन कर्मियों के साथ वन्यजीवों की सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और पर्यटन संचालन से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि वन संपदा और वन्यजीवों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए पर्यटन से जुड़ी हर गतिविधि को कड़े नियमों और निगरानी के दायरे में रखकर ही आगे बढ़ाया जाएगा।
ऐतिहासिक पलामू किला परिसर में नए सुरक्षा मानक
इतिहास और संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पलामू किले को लेकर भी प्रवेश व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया गया है। पलामू टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने इस ऐतिहासिक धरोहर के दस्तावेजीकरण का कार्य संपन्न कराकर एक पुस्तक का प्रकाशन किया है। किले के जीर्णोद्धार और दीर्घकालिक संरक्षण के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा गया है, जिस पर झारखंड सरकार भी गंभीरता के साथ काम आगे बढ़ा रही है। चूंकि यह ऐतिहासिक संरचना सीधे तौर पर टाइगर रिजर्व के संवेदनशील वन क्षेत्र के भीतर स्थित है, इसलिए यहां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के कड़े प्रावधान लागू होते हैं।
पूर्व में पर्यटक निजी अथवा पारंपरिक साधनों से सीधे किले के द्वार तक पहुंच जाते थे, लेकिन इस अनियंत्रित आवाजाही पर अब पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। नई व्यवस्था के अंतर्गत किसी भी सैलानी को पलामू किला देखने के लिए अधिकृत जंगल सफारी वाहन में सवार होकर ही जाना होगा। वन विभाग द्वारा लगाए गए स्वचालित कैमरा ट्रैप में इस मार्ग और किले के आसपास चीतल, हाथी, तेंदुआ और बाइसन सहित कई दुर्लभ जंगली जानवरों की नियमित गतिविधियां दर्ज की गई हैं। अधिकारियों का मानना है कि सफारी वाहनों के माध्यम से पर्यटकों की नियंत्रित आवाजाही से वन्यजीवों के प्राकृतिक पर्यावास में अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप रुकेगा।
पर्यटन राजस्व से स्थानीय आजीविका को सीधा सहारा
वन अधिकारियों ने बैठक के दौरान पर्यटन से होने वाले आर्थिक लाभ का ब्योरा साझा करते हुए बताया कि बाहरी पर्यटकों से लिए जाने वाले 1950 रुपये के पैकेज का सबसे बड़ा हिस्सा स्थानीय अर्थव्यवस्था में ही वापस जाता है। इस कुल शुल्क में से लगभग 1450 रुपये सीधे स्थानीय समुदाय और समिति के सदस्यों को मिलते हैं, जिससे गांव के युवाओं और परिवारों को स्थायी आजीविका प्राप्त होती है। शेष 500 रुपये की राशि वाहनों के ईंधन, तकनीकी परिचालन, साफ-सफाई और प्रशासनिक प्रबंधन पर खर्च की जाती है। इस मॉडल का मूल उद्देश्य वन संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाना है।
कचरा और प्लास्टिक फैलाने पर 2000 रुपये का जुर्माना
रिजर्व के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को प्लास्टिक प्रदूषण से बचाने के लिए सख्त दंडात्मक नियम तय किए गए हैं। पलामू टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आने वाले सभी पर्यटन स्थलों और वन मार्गों पर एकल-उपयोग प्लास्टिक के प्रवेश और इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। यदि कोई भी पर्यटक या ग्रामीण जंगल के भीतर प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें या अन्य अपशिष्ट फैलाते हुए पकड़ा जाता है, तो उस पर तत्काल 2000 रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया जाएगा। वन प्रबंधन ने सभी आगंतुकों से स्वच्छता बनाए रखने और वनों की प्राकृतिक सुंदरता व वन्यजीवों के संरक्षण में सक्रिय सहयोग की अपील की है।



















