केरल के मंदिर उत्सवों की शान रहे विख्यात हाथी पल्लाट्टू ब्रह्मदत्तन की मौत हो गई है। अपनी विशाल कद-काठी और बेहद शांत व्यवहार के लिए पहचाने जाने वाले इस हाथी ने वर्षों तक लाखों श्रद्धालुओं और हाथी प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। करीब पांच वर्ष पूर्व सोशल मीडिया पर सामने आए एक बेहद मार्मिक वीडियो ने ब्रह्मदत्तन को पूरे देश में लोकप्रिय बना दिया था, जिसमें उसने अपने महावत के निधन पर जो संवेदना प्रकट की थी, उसने इंसानों और बेजुबान जानवरों के बीच के आत्मीय संबंध को एक नई मिसाल दी थी।
महावत को दी थी आंसुओं से भरी आखिरी सलामी
करीब पांच साल पहले वायरल हुए उस भावुक वीडियो में पल्लाट्टू ब्रह्मदत्तन अपने 74 वर्षीय दिवंगत महावत कुन्नक्कड़ दामोदरन नायर के घर पहुंचा था। महावत का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार से पहले घर के बरामदे में रखा गया था। हाथी संकरी गली से गुजरता हुआ सीधे बरामदे तक आया और पार्थिव देह के सम्मुख पहुंचकर अपनी सूंड को दो बार ऊपर उठाकर दिवंगत महावत को भावभीनी सलामी दी।
उस दौरान महावत के बेटे राजेश ने आगे बढ़कर हाथी को दुलारा और अपना सिर उसके विशाल दांतों पर टिका दिया। वहां उपस्थित लोगों की आंखें इस दृश्य को देखकर नम हो गई थीं। इसके बाद ब्रह्मदत्तन कुछ कदम पीछे हटा और एक बार फिर अपनी सूंड उठाकर अपने पुराने साथी को अंतिम विदाई दी। इस घटनाक्रम का वीडियो इंटरनेट पर तेजी से फैला और लोगों ने इसे बेजुबानों के सच्चे प्रेम और कृतज्ञता का सबसे बड़ा उदाहरण माना।
मेलाम्पारा में आकाशीय बिजली गिरने से दर्दनाक अंत
इंसानों के दिलों को छू लेने वाले उसी ब्रह्मदत्तन का सफर अब हमेशा के लिए समाप्त हो गया। 4 अक्टूबर 2026 को कोट्टायम जिले के एराट्टुपेट्टा के समीप मेलाम्पारा में उसकी मौत हो गई। वह अपने वर्तमान मालिक राजेश पल्लाट्टू के आवास के निकट बने एक अस्थायी शेड में विश्राम कर रहा था, उसी दौरान उस पर आकाशीय बिजली गिर गई। जिस दिन यह दुखद हादसा हुआ, उस दिन संयोगवश 4 अक्टूबर को विश्व पशु दिवस भी था। ब्रह्मदत्तन कुछ ही समय पहले हाथियों की प्राकृतिक ‘मस्त’ अवस्था से बाहर आया था और बीते करीब एक महीने से उसी शेड में आराम कर रहा था।
10 फीट से अधिक ऊंचाई और मंदिर उत्सवों की प्रतिष्ठा
पल्लाट्टू ब्रह्मदत्तन अपने सुडौल और भव्य शारीरिक गठन के लिए विख्यात था। उसकी कुल ऊंचाई लगभग 10 फीट 2 इंच थी। अपनी विशाल काया के बावजूद उसका स्वभाव हमेशा शांत और सौम्य रहता था, जिसके कारण मध्य केरल के प्रतिष्ठित मंदिर आयोजनों में उसकी मौजूदगी अनिवार्य मानी जाती थी।
वह धार्मिक उत्सवों के दौरान देवताओं के विग्रह स्वरूप ‘थिदम्बु’ को श्रद्धापूर्वक अपने मस्तक पर धारण करता था। विश्व प्रसिद्ध त्रिशूर पूरम में परमक्कावु मंदिर के अनुष्ठानों में भी उसने सहभागिता की थी। इसके अलावा साल 2015 के ऐतिहासिक रात के पूरम उत्सव में भी ब्रह्मदत्तन ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।
अरुणाचल प्रदेश के वनों से केरल के मंदिरों तक की यात्रा
ब्रह्मदत्तन का जीवन सफर लगभग 28 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ था। अपने शुरुआती दिनों में वह पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के सघन जंगलों में भारी लकड़ियां ढोने का कार्य करता था। बाद में कोट्टायम के पुथुपल्ली स्थित पापालापरम्बिल हाउस के निवासी दो भाइयों पोथन वर्गीस और चाको द्वारा उसे केरल लाया गया।
तकरीबन 16 वर्ष पूर्व पल्लाट्टू परिवार ने उसके स्वामित्व का दायित्व संभाला, जिसके उपरांत उसे नया नाम पल्लाट्टू ब्रह्मदत्तन दिया गया। समय के साथ वह केरल के सबसे प्रतिष्ठित और पसंदीदा हाथियों की अग्रिम पंक्ति में शामिल हो गया और स्थानीय सांस्कृतिक मेलों की पहचान बन गया।
अंतिम दर्शन के लिए उमड़े हजारों प्रशंसक
हाथी की मौत की खबर फैलते ही 5 अक्टूबर को मेलाम्पारा में अंतिम दर्शन करने के लिए हजारों हाथी प्रेमी और स्थानीय नागरिक एकत्र हुए। उत्सवों में अपनी भव्य उपस्थिति दर्ज कराने वाले इस शांतप्रिय गजराज के असमय चले जाने से केरल भर के पशु प्रेमियों में गहरा शोक व्याप्त है। ब्रह्मदत्तन का नाम केवल मंदिर उत्सवों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने महावत के प्रति प्रदर्शित किए गए अगाध प्रेम और वफादारी के लिए इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा।



















