केरल हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों के परिसर में होने वाले धरना प्रदर्शनों, भूख हड़ताल और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर एक बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि कॉलेज और विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को ज्ञान और शिक्षा प्रदान करने के पवित्र उद्देश्य से स्थापित किए गए हैं, न कि सक्रिय राजनीति का मैदान बनने के लिए। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जो भी छात्र परिसर के भीतर धरने, हड़ताल अथवा सत्याग्रह जैसी गतिविधियों को अंजाम देते हैं, उन्हें संस्थान से निष्कासन, निलंबन या रस्टिकेशन जैसी कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाहियों का सामना करना पड़ सकता है।
संवैधानिक लोकतंत्र और शैक्षणिक माहौल की मर्यादा
अदालत ने शैक्षणिक परिसरों में राजनीतिक दबाव की संस्कृति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में ऐसी बाधाकारी गतिविधियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने विशेष रूप से यह इंगित किया कि शिक्षण संस्थानों के भीतर तो इस तरह के राजनीतिक आचरण की बिल्कुल भी गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। कॉलेज परिसरों को शांतिपूर्ण और अध्ययन के अनुकूल बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुशासनहीनता और आंदोलनकारी आचरण किसी भी छात्र का बुनियादी अधिकार नहीं हो सकता।
पुराने फैसलों और ऐतिहासिक नजीरों का उल्लेख
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने वर्ष 2017 के अपने एक पुराने फैसले, डॉक्टर एंटोनी थॉमस बनाम वीएम मोहम्मद रफीक एवं अन्य, की मिसाल पेश की। इस ऐतिहासिक नजीर का स्मरण कराते हुए कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों को राजनीतिक अखाड़ा बनने से रोकने के लिए पहले भी स्पष्ट कानूनी व्यवस्थाएं दी जा चुकी हैं। पीठ ने दोहराया कि राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए शिक्षण संस्थानों को बंधक बनाने की कतई छूट नहीं दी जा सकती। परिसर की स्वायत्तता और अध्ययन के माहौल को सर्वोपरि रखना प्रशासनिक और कानूनी दायित्व है।
एकल पीठ का आदेश निरस्त, संस्कृत विश्वविद्यालय का प्रकरण
उच्च न्यायालय का यह ताजा फैसला श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय से जुड़े एक विवाद की सुनवाई के बाद सामने आया। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निलंबित किए गए कुछ विद्यार्थियों को सेमेस्टर परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति देने संबंधी एकल पीठ के पूर्व आदेश को अदालत ने पूरी तरह रद्द कर दिया। खंडपीठ ने स्थापित न्यायिक मिसालों को आधार बनाते हुए यह निर्णय सुनाया और विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुशासनात्मक अधिकारों की पुष्टि की, ताकि परिसर में शांति और नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
शांत छात्रों के अध्ययन अधिकारों की रक्षा पर बल
अदालत ने अपने निर्देश में उन विद्यार्थियों के हितों की भी पुरजोर वकालत की जो किसी भी प्रकार के आंदोलन या धरने का हिस्सा नहीं बनते। कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक प्रदर्शनों अथवा हड़तालों के कारण सभ्य और पढ़ाई करने के इच्छुक छात्रों के शिक्षा प्राप्त करने के मौलिक अधिकार का किसी भी सूरत में हनन नहीं होना चाहिए। शैक्षणिक व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित होनी चाहिए और किसी भी राजनीतिक गतिविधि के कारण शिक्षण सत्र, कक्षाएं या परीक्षाएं बाधित नहीं होनी चाहिए।



















