दीपावली के छह दिवसीय महापर्व का शुभारंभ धनतेरस के पावन अवसर से होता है। इस दिन चारों तरफ उत्साह का माहौल रहता है और लोग अपने घरों की साफ-सफाई से लेकर पूजन और खरीदारी में व्यस्त रहते हैं। परंपरा के अनुसार धनतेरस पर सोना, चांदी, नए बर्तन तथा अन्य उपयोगी सामान खरीदने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। धनतेरस का महत्व केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की खरीदारी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह गहरा आध्यात्मिक और सुरक्षात्मक संदेश भी समेटे हुए है। इस दिन की शाम को एक अत्यंत विशिष्ट दीप प्रज्वलित किया जाता है, जिसे यम का दीपक या यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार यदि इस दीपक को संपूर्ण विधि-विधान से जलाया जाए तो पूरे परिवार पर मंडराने वाला अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। यम का दीपक जलाने के लिए शास्त्रों और ज्योतिषीय परंपरा में कुछ अनिवार्य नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना हर गृहस्थ के लिए आवश्यक माना गया है।
धनतेरस पर यमराज और भगवान धन्वंतरि के पूजन का महत्व
धनतेरस की तिथि मूल रूप से आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि और मृत्यु के अधिपति यमराज की पूजा के लिए समर्पित मानी जाती है। देवघर के ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुदगल के अनुसार, धनतेरस पर लोग अपनी आर्थिक सामर्थ्य के मुताबिक खरीदारी करते हैं। मान्यता यह है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएं घर में बरकत लाती हैं और धन-धान्य में निरंतर वृद्धि करती हैं। लेकिन इसके समानांतर संध्याकाल का समय यमराज के पूजन के लिए निर्धारित होता है। शाम ढलते ही परिवार की दीर्घायु और सुरक्षा के लिए यम के नाम का दीपक जलाया जाता है। इस अनुष्ठान का मुख्य उद्देश्य परिवार के सदस्यों को असमय आने वाली विपदाओं तथा अकाल मृत्यु की आशंका से पूर्ण मुक्ति दिलाना है।
यम दीपदान के कड़े नियम और दक्षिण दिशा का विधान
ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि यम का दीपक सामान्य दीपकों की तरह नहीं रखा जाता, बल्कि इसके लिए तय नियमों का कड़ाई से पालन करना पड़ता है। सबसे पहले तेल के चयन पर ध्यान देना जरूरी है। यम का दीपक हमेशा सरसों के तेल या तिल के तेल से ही जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दीपक का स्थान भी अलग होता है; इसे घर के भीतरी भाग में कभी नहीं जलाया जाता, बल्कि घर के मुख्य द्वार से बाहर की तरफ रखा जाता है। दिशा के लिहाज से इसे सदैव दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखने की परंपरा है, क्योंकि दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है।
दीपक जमीन पर सीधे रखने के बजाय उसके नीचे आसन के रूप में थोड़े से साबुत चावल अवश्य रखे जाने चाहिए। इसके पश्चात यमराज का ध्यान और स्मरण करते हुए विधिपूर्वक दीप प्रज्वलित किया जाता है। एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम यह है कि दीपक जलाने के बाद जातक को पीछे मुड़कर बिल्कुल नहीं देखना चाहिए। मान्यता है कि इस संयम और नियमबद्धता से यमराज प्रसन्न होते हैं और पूरे परिवार को सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।
महामृत्युंजय मंत्र के जाप से दूर होगा भय
अकाल मृत्यु के भय के निवारण और परिवार की दीर्घायु के लिए यम दीपदान के साथ-साथ भगवान शिव की आराधना का भी विशेष निर्देश दिया गया है। ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, यदि किसी व्यक्ति के मन में अनहोनी या असमय मृत्यु का डर बना रहता है, तो उसे धनतेरस के दिन भगवान शिव के परम कल्याणकारी महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र का शुद्ध उच्चारण जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और अज्ञात भयों का समूल नाश करता है। इस प्रकार धनतेरस का पावन पर्व भौतिक लाभ के साथ-साथ परिवार के स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगल की कामना का एक अनूठा संगम है। खरीदारी के उल्लास के बीच यम दीपदान के सभी नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करने से घर में खुशहाली और अभय का वातावरण निर्मित होता है।


















