मानसून जब विदाई की कगार पर पहुंचता है, तब ग्रामीण अंचलों के खेतों की मेड़ों, खाली पड़े भूखंडों और नम रास्तों के इर्द-गिर्द प्रकृति खुद कई तरह की वनस्पतियां परोस देती है। विंध्य और बघेलखंड के इलाकों में यह समय उन रानभाजियों के फिर से सक्रिय होने का होता है, जो पीढ़ियों से ग्रामीण परिवारों के पारंपरिक आहार का अटूट हिस्सा रही हैं। जब बारिश के दिनों में मंडियों में हरी सब्जियों की किल्लत बढ़ जाती थी या उनके दाम आसमान छूने लगते थे, तब गांव-घर की रसोई इन्हीं कुदरती भाजियों के सहारे सजी रहती थी। आज भी यह देसी परंपरा कनकौआ, चकौड़ा और चौलाई जैसी जंगली वनस्पतियों के जरिए जीवित है, जिसका स्वाद लोगों को अपने बुजुर्गों और दादी-नानी के दौर की याद दिलाता है।
विंध्य की रसोई में रानभाजियों की पुरानी परंपरा
सतना निवासी मीना द्विवेदी के अनुसार विंध्य क्षेत्र में इस समय बरसात का मौसम समाप्ति की ओर अग्रसर है, जिसके चलते गांवों में कई प्रकार की भाजियां अपने आप बहुतायत में निकल आती हैं। चकौड़ा, चौलाई भाजी और कनकौआ जैसी वनस्पतियां केवल स्वाद का साधन नहीं हैं, बल्कि यह स्थानीय खानपान की सदियों पुरानी विरासत से जुड़ी हुई हैं। पुराने समय से ही परिवार खेतों और आसपास की जमीन से इन पौधों की ताजा पत्तियां चुनकर लाते रहे हैं। इन्हें पूरी तरह घरेलू और पारंपरिक विधि से पकाया जाता है, जो आज भी गांव के चूल्हों की विशेष पहचान बना हुआ है।
कनकौआ भाजी का सही चयन और सफाई का तरीका
इस सब्जी को पकाने के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम सही भाजी का चयन करना है। चूंकि कनकौआ नमी वाली जगहों, रास्तों के किनारे और खेतों की मेड़ों पर खुद-ब-खुद उगती है, इसलिए इसे तोड़ते समय अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। पौधे के केवल ऊपर वाले कोमल और मुलायम पत्तों को ही तोड़ना चाहिए, जबकि कड़े, बहुत मोटे या खराब पत्तों को अलग कर देना चाहिए। तोड़े गए पत्तों से धूल-मिट्टी और गंदगी को पूरी तरह हटाने के लिए उन्हें तीन से चार बार साफ पानी में अच्छी तरह धोना आवश्यक होता है। जब भाजी पूरी तरह साफ हो जाए, तब उसे पानी से निकालकर बारीक काट लिया जाता है।
पारंपरिक बघार और लोहे की कड़ाही में पकाने की विधि
बघेलखंड की पारम्परिक शैली में कनकौआ को लोहे की कड़ाही में पकाना सबसे बेहतर माना जाता है, जिससे इसमें खास सोंधापन आता है। सबसे पहले कड़ाही को गर्म करके उसमें सरसों का तेल डाला जाता है। तेल से धुआं निकलने लगे तब उसमें जीरा, एक चुटकी हींग और थोड़ी मेथी के दाने डाले जाते हैं। इसके तुरंत बाद बारीक कटा लहसुन, प्याज और सूखी लाल मिर्च डालकर तड़का तैयार किया जाता है। प्याज और लहसुन को तब तक भूनना चाहिए जब तक कि वे हल्के सुनहरे न हो जाएं। यहां इस बात का खास ख्याल रखना पड़ता है कि लहसुन किसी भी हाल में जले नहीं, क्योंकि लहसुन का जलना पूरी सब्जी के स्वाद को कड़वा कर सकता है।
भाप में पकने की खासियत और भूनने का देसी अंदाज
तड़का तैयार होने के बाद बारीक कटी हुई कनकौआ भाजी को कड़ाही में मिलाया जाता है। इसके बाद ऊपर से हल्दी, धनिया पाउडर, थोड़ी लाल मिर्च और स्वादानुसार नमक डाला जाता है। कनकौआ भाजी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बाहर से जरा भी पानी डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पकने के दौरान भाजी खुद अपना प्राकृतिक पानी छोड़ती है, और उसी नमी व भाप के सहारे यह गल जाती है। मसालों को मिलाने के बाद कड़ाही को ढक दिया जाता है और धीमी आंच पर पकने दिया जाता है। बीच-बीच में ढक्कन हटाकर सब्जी को चलाना जरूरी है ताकि वह तली में चिपके नहीं और मसाले हर हिस्से में एकसार मिल जाएं।
जब भाजी पूरी तरह गल जाए और पक जाए, तो कड़ाही का ढक्कन हटा दिया जाता है। इसके बाद मध्यम आंच पर लगभग 2 से 3 मिनट तक लगातार चलाते हुए इसे भूना यानी झूरा जाता है। इस प्रक्रिया से सब्जी के भीतर मौजूद अतिरिक्त पानी पूरी तरह सूख जाता है और मसाले भाजी के साथ अच्छी तरह चिपक जाते हैं। यही अंतिम प्रक्रिया सब्जी को वह विशिष्ट देसी सोंधापन देती है जो कनकौआ की पहचान है। तैयार सूखी और चटपटी कनकौआ भाजी को गरमागरम रोटियों के साथ या फिर दाल-चावल के साथ बड़े चाव से खाया जाता है।


















