पशुपालन के क्षेत्र में बेहतर आमदनी हासिल करने के लिए केवल पशुओं का झुंड बढ़ाना ही काफी नहीं होता, बल्कि सही नस्ल की पहचान करना सबसे अहम फैसला साबित होता है। बकरियों की नस्ल अगर उत्तम हो, तो उनकी शारीरिक वृद्धि तेज होती है, प्रजनन क्षमता मजबूत रहती है और मंडियों में उनकी मांग भी काफी ऊंची रहती है। उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में खोद गांव के पशुपालक सोनू पाल ने पिछले पांच वर्षों के अपने जमीनी अनुभव से इस गणित को बखूबी समझा है। उन्होंने अलग-अलग नस्लों को पालकर उनके स्वभाव और बाजार के रुझानों को परखा, जिसके बाद आज उनका बकरी पालन का काम एक व्यवस्थित और लाभदायक व्यवसाय का रूप ले चुका है।
तोतापरी नस्ल बनी पहली पसंद, बेहतर प्रजनन क्षमता से बढ़ता है झुंड
सोनू पाल के बाड़े में मुख्य रूप से तोतापरी, अलवर और देसी नस्ल की बकरियां मौजूद हैं। इन सभी किस्मों के बीच सोनू तोतापरी नस्ल को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इस नस्ल की शानदार प्रजनन क्षमता और बाजार में मिलने वाला ऊंचा भाव है। अपने व्यावहारिक अनुभव के आधार पर वह बताते हैं कि तोतापरी बकरियां औसतन हर छह महीने के अंतराल पर बच्चे देती हैं। इतना ही नहीं, कई बार यह बकरी एक ही ब्यात में तीन बच्चों तक को जन्म दे देती है। कम समय में ज्यादा बच्चे मिलने से पशुपालक के पास पशुओं का कुनबा तेजी से बड़ा होता है, जिससे आगे चलकर बिक्री के लिए बकरों और बकरियों की निरंतर उपलब्धता बनी रहती है।
नस्ल और वजन के आधार पर तय होती है कीमत
बकरियों की बिक्री से मिलने वाली रकम पूरी तरह से उनकी नस्ल, शारीरिक वजन, उम्र और संपूर्ण स्वास्थ्य की स्थिति पर निर्भर करती है। सोनू पाल के मुताबिक, उनके फार्म पर सामान्य और अच्छी बकरियां 8 हजार रुपये, 10 हजार रुपये, 12 हजार रुपये तथा 15 हजार रुपये तक की दरों पर बिकती हैं। वहीं जिन बकरियों की कद-काठी और नस्ल बेहतरीन स्तर की होती है, उनकी कीमत 20 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। जब बाजार में उच्च गुणवत्ता वाले पशुओं की मांग तेज होती है, तब पशुपालकों को अपनी मजबूत नस्ल के दम पर और भी बेहतर मुनाफा हासिल होता है।
देसी और अलवर नस्ल का संतुलन और चारे का किफायती प्रबंधन
सोनू केवल एक ही नस्ल के भरोसे अपना व्यवसाय नहीं चलाते, बल्कि उन्होंने अपने बाड़े में विविधता रखी है। उनके पास देसी और अलवर नस्ल के पशु भी पर्याप्त संख्या में हैं। देसी नस्ल की खासियत यह होती है कि वह स्थानीय जलवायु, मौसम के उतार-चढ़ाव और बीमारियों के प्रति स्वाभाविक रूप से सहनशील होती है। वहीं दूसरी तरफ बाहरी नस्लें अपने बड़े शारीरिक आकार, तेजी से वजन बढ़ाने और अच्छी प्रजनन दर के लिए पसंद की जाती हैं। पशुओं की संख्या 100 के पार पहुंचने पर सबसे बड़ी चुनौती उनके दैनिक चारे की लागत को नियंत्रित करने की होती है। इस खर्च को कम करने के लिए सोनू अपनी बकरियों को रोजाना सुबह और शाम के वक्त खुले इलाकों में चराने के लिए ले जाते हैं। प्राकृतिक चराई से बकरियों को ताजा और हरा चारा मुफ्त में मिल जाता है, जिससे बाजार से सूखा या दाना चारा खरीदने का भारी खर्च काफी हद तक घट जाता है।
खोद गांव के साप्ताहिक बाजार से बिक्री की आसान राह
पशुओं की बिक्री के लिए सोनू को दूर-दराज की बड़ी मंडियों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। उनके अपने गांव खोद में ही लंबे समय से एक प्रसिद्ध स्थानीय पशु बाजार लगता है, जो हर मंगलवार को आयोजित होता है। यह हाट आसपास के सभी पशुपालकों के लिए अपने मवेशी सीधे खरीदारों तक पहुंचाने का एक सुगम माध्यम है। सोनू अपनी तैयार बकरियों को इसी मंगलवार के बाजार में लेकर जाते हैं और सालभर में करीब 100 से 150 बकरियां बेच देते हैं। पांच साल के सफर में उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि उन्नत नस्ल का चुनाव, संतुलित देखभाल, चारे का किफायती प्रबंधन और स्थानीय बाजार की सुविधा मिलकर बकरी पालन को आजीविका का एक मजबूत साधन बना सकती हैं।



















