मकान अथवा इमारत तैयार होने के कुछ ही अरसे बाद दीवारों और छत से प्लास्टर पपड़ी बनकर गिरने लगे, तो यह न केवल घर का रूप बिगाड़ता है बल्कि इमारत की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करता है। अमूमन लोग इसे साधारण खराबी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि असल में यह काम के दौरान बरती गई तकनीकी लापरवाहियों का नतीजा होता है। बहराइच जिले के यादव गांव के रहने वाले अनुभवी मिस्त्री शिवप्रकाश के अनुसार, यदि निर्माण या मरम्मत के वक्त बुनियादी सावधानियां बरती जाएं, तो प्लास्टर कई दशकों तक अपनी पकड़ नहीं छोड़ता।
दीवार की पर्याप्त तराई है पहली और जरूरी शर्त
प्लास्टर के कमजोर पड़ने और परत बनकर छूटने की सबसे बड़ी वजह दीवार की अधूरी या गलत तराई होती है। शिवप्रकाश का कहना है कि जब ईंटें सूखी होती हैं, तो वे प्लास्टर के गीले मसाले से पानी खींच लेती हैं, जिससे सीमेंट अपनी जरूरी रासायनिक मजबूती हासिल नहीं कर पाता। इससे बचाव के लिए प्लास्टर लगाने से कम से कम दो दिन पहले से दीवार अथवा छत पर भरपूर पानी छिड़ककर तराई करनी चाहिए। जब ईंटें पूरी तरह पानी सोखकर संतृप्त हो जाती हैं, तभी वह सतह प्लास्टर के मसाले को कसकर पकड़ने के लिए पूरी तरह तैयार होती है।
तार वाले ब्रश से ईंटों की सतह चमकाना जरूरी
ईंटों पर सीधे मसाला थोपने से पहले उनकी पूरी सफाई करना अनिवार्य है। निर्माण के समय ईंटों पर जमी धूल, मिट्टी या पुरानी निर्माण सामग्री प्लास्टर और दीवार के बीच एक अवरोधक परत बना देती है। शिवप्रकाश के मुताबिक, तार वाले ब्रश का इस्तेमाल करके ईंटों की बाहरी सतह को अच्छी तरह रगड़ना चाहिए। सफाई का स्तर ऐसा होना चाहिए कि दीवार की लाल ईंटें बिल्कुल साफ नजर आने लगें। जब ईंटों की वास्तविक खुरदरी सतह सामने आती है, तब सीमेंट का घोल और मसाला उस पर प्राकृतिक पकड़ बना पाते हैं।
सीमेंट और मौरंग का सटीक अनुपात
प्लास्टर की उम्र और टिकाऊपन पूरी तरह मसाले के सटीक संतुलन पर टिका होता है। इसके लिए 4:1 का पैमाना सबसे उपयुक्त माना गया है, जिसका अर्थ है 4 तसला मौरंग के साथ 1 तसला सीमेंट का मिश्रण। शिवप्रकाश ने जोर देकर कहा कि इस मसाले को बिना नापे अंदाजे से नहीं मिलाना चाहिए। यदि मिश्रण तैयार करने में ढिलाई बरती गई और मसाले में मौरंग का हिस्सा कहीं ज्यादा रह गया, तो उसी कमजोर हिस्से से बाद में पपड़ी बनना और मसाला झड़ना शुरू हो जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य बालू की तुलना में मौरंग और सीमेंट का सही मेल प्लास्टर को कहीं अधिक मजबूती प्रदान करता है।
परत की मोटाई और लंबे समय तक टिकाऊपन
मसाला लगाने के दौरान उसकी मोटाई पर ध्यान देना भी उतना ही अहम है। मिस्त्री के अनुसार, प्लास्टर की मोटाई कम से कम आधा इंच जरूर रखनी चाहिए। आधा इंच से पतला प्लास्टर मौसम के थपेड़े नहीं झेल पाता और बहुत जल्दी चटकने लगता है। जब दो दिन की नियमित तराई, तार वाले ब्रश से ईंटों की रगड़ाई, 4:1 का नापा हुआ मौरंग-सीमेंट अनुपात और आधा इंच की न्यूनतम मोटाई का पालन किया जाता है, तो प्लास्टर पपड़ी बनकर कभी नहीं गिरता। चाहे नया मकान बन रहा हो या पुराने ढांचे का जीर्णोद्धार चल रहा हो, इन बातों पर निगरानी रखकर निर्माण को टिकाऊ बनाया जा सकता है।



















