रसोई में सब्जी बनाने की तैयारी के दौरान कई बार छिले और कटे हुए आलू कुछ ही देर में काले या गहरे भूरे रंग के दिखने लगते हैं। यह बदलाव किसी खराबी की वजह से नहीं, बल्कि एक सामान्य प्राकृतिक क्रिया के कारण होता है जिसे एंजाइमेटिक ब्राउनिंग कहते हैं। जब आलू का छिलका हटता है या उसे टुकड़ों में काटा जाता है, तब उसके भीतरी प्राकृतिक यौगिक और एंजाइम सीधे वायुमंडल की ऑक्सीजन से संपर्क बनाते हैं। इस रासायनिक प्रक्रिया के चलते आलू की बाहरी परत अपना रंग बदलने लगती है। यह प्रक्रिया कितनी तेजी से होगी, यह आलू की विशिष्ट किस्म, उसकी ताजगी, आसपास के तापमान और हवा के संपर्क में आने वाले हिस्से के आकार पर तय होता है।
ठंडे पानी में डुबोकर रखने की विधि
अगर आपको खाना बनाने से काफी पहले आलू काटकर तैयार रखने हैं, तो सबसे आसान तरीका उन्हें किसी साफ बर्तन में ठंडे पानी के भीतर पूरी तरह डुबो देना है। जब आलू पूरी तरह पानी के नीचे रहते हैं, तो उनका वायुमंडलीय ऑक्सीजन से सीधा संपर्क टूट जाता है। ऑक्सीजन न मिलने के कारण रंग बदलने वाली प्रक्रिया रुक जाती है। यह उपाय उन आलुओं के लिए बेहद असरदार है जिन्हें आगे चलकर उबालना हो, तरीदार सब्जी में डालना हो या कुछ खास किस्म के फ्राई बनाने में इस्तेमाल करना हो। हालांकि इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आलुओं को पानी के भीतर अत्यधिक समय तक न छोड़ा जाए। पानी में बहुत ज्यादा देर पड़े रहने से उनका स्वाभाविक स्टार्च और पानी में घुलनशील पोषक तत्व बाहर निकल जाते हैं, जिसका सीधा असर उनके असली स्वाद और पकाने के बाद उनकी बनावट पर पड़ता है।
फ्रिज के तापमान का इस्तेमाल
यदि कटे हुए आलुओं को कई घंटों तक पकाने की योजना नहीं है, तो उन्हें केवल कमरे के सामान्य तापमान पर पानी में रखकर नहीं छोड़ना चाहिए। इसके बजाय पानी से भरे बर्तन को एक साफ ढक्कन से अच्छी तरह ढककर फ्रिज के अंदर रख देना चाहिए। सामान्य कमरे के तापमान पर लंबे वक्त तक कटे आलू छोड़ना सही विकल्प नहीं माना जाता। ठंडा वातावरण रंग बदलने की रासायनिक गति को काफी धीमा कर देता है। फिर भी यह याद रखना जरूरी है कि ठंडा पानी केवल प्रक्रिया को सुस्त करता है, वह हमेशा के लिए आलू को सुरक्षित नहीं रख सकता।
नींबू, सिरका और नमक का प्रभाव
पानी के घोल में नींबू का रस अथवा थोड़ा सा सिरका मिलाने पर पानी की अम्लीयता का स्तर बढ़ जाता है। अम्लीय माध्यम बनते ही रंग बिगाड़ने वाले एंजाइम की सक्रियता काफी हद तक मंद पड़ जाती है। लेकिन इस तरीके का एक दूसरा पहलू भी है, क्योंकि नींबू या सिरके का इस्तेमाल करने से आलुओं के प्राकृतिक स्वाद में हल्का सा खट्टापन शामिल हो सकता है। इसी वजह से रोजमर्रा की सामान्य रसोई में सादा ठंडा पानी और फ्रिज का उपयोग ही सबसे मुफीद रहता है। केवल आलुओं का रंग काला होने से बचाने के उद्देश्य से पानी में अलग से नमक मिलाना आवश्यक नहीं है।
तलने से पूर्व सुखाना क्यों है जरूरी
पानी में सुरक्षित रखे गए कटे आलुओं को अगर गर्म तेल में तलने की तैयारी है, तो उन्हें सीधे कढ़ाई में नहीं डालना चाहिए। सबसे पहले आलुओं को पानी से निकालकर अच्छी तरह छान लें और फिर किसी साफ सूती कपड़े अथवा किचन पेपर टॉवल की मदद से उनकी नमी पूरी तरह पोंछ लें। यदि आलू की सतह पर पानी की बूंदें मौजूद रहीं, तो खौलते तेल में जाते ही तेज छींटे उड़ेंगे। इससे रसोई में दुर्घटना का खतरा रहता है और तलने के बाद आलू का कुरकुरापन तथा गुणवत्ता भी खराब हो सकती है।
क्या काले पड़े आलू खाने के लिए सुरक्षित हैं
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि रंग बदल चुके आलू खाने लायक होते हैं या नहीं। यदि आलू सिर्फ हवा लगने की वजह से हल्के भूरे या गहरे रंग के हुए हैं और उनसे आने वाली महक बिल्कुल सामान्य है, तो केवल रंग बदलने के आधार पर उन्हें खराब नहीं माना जाता। वे पूरी तरह खाने योग्य रहते हैं। दूसरी ओर, यदि आलू छूने में असामान्य रूप से नरम पड़ चुके हों, उनकी सतह चिपचिपी हो गई हो, उन पर फफूंदी नजर आ रही हो या उनमें से अजीब बदबू उठ रही हो, तो यह उनके सड़ने की स्पष्ट निशानी है। ऐसे खराब हो चुके आलुओं को खाने से पूरी तरह बचना चाहिए।



















