कथा वाचन के मंचों से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर तक अनिरुद्धाचार्य की उपस्थिति लगातार चर्चा का केंद्र बनी रहती है। उनके प्रवचनों के अंश, प्रश्नोत्तरी सत्र, श्रद्धालुओं के साथ संवाद और हल्के-फुल्के हास्य के वीडियो इंटरनेट पर व्यापक स्तर पर देखे जाते हैं। इसी व्यापक प्रसार के बीच यह प्रश्न भी उठता रहा है कि क्या सोशल मीडिया पर मिलने वाली अपार लोकप्रियता उनके मुख्य धार्मिक और सेवा कार्यों पर भारी पड़ने लगी है। एक साक्षात्कार के दौरान पत्रकार किशोर अजवानी ने जब उनसे इसी विरोधाभास पर सीधा सवाल किया, तो कथा वाचक ने दर्शकों की व्यक्तिगत पसंद और नजरिए को इसका मुख्य आधार बताया।
प्रसिद्धि के माध्यम पर सीधा संवाद
चर्चा के दौरान यह बात प्रमुखता से सामने आई कि जमीनी स्तर पर किए जाने वाले धार्मिक व सेवा कार्यों की तुलना में इंस्टाग्राम जैसे माध्यमों पर मिलने वाली शोहरत ज्यादा ध्यान खींचती है। इस पर अपना पक्ष रखते हुए अनिरुद्धाचार्य ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर प्रस्तुत की जाने वाली सामग्री किसी एक रंग में नहीं बंधी है। उनके डिजिटल अकाउंट्स पर सामाजिक कल्याण, सेवा प्रकल्पों के विवरण, लोगों की जिज्ञासाओं के समाधान और धार्मिक व्याख्यान सभी कुछ उपलब्ध रहता है। उनका मानना है कि जनता अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार तय करती है कि उसे किस हिस्से से जुड़ना है।
रुचि और नजरिए का व्यक्तिगत चुनाव
अपनी कार्यशैली और डिजिटल उपस्थिति का विश्लेषण करते हुए उन्होंने गौरी गोपाल में संचालित होने वाले विभिन्न सेवा कार्यों का उदाहरण दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि जो लोग परोपकार और सेवा गतिविधियों से प्रेरणा लेना चाहते हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर वही कार्य दिखाई देते हैं। वहीं जो दर्शक मनोरंजन या सहज हंसी-मजाक की तलाश में रहते हैं, वे उस तरह के अंशों को प्राथमिकता देते हैं। इसी तरह आध्यात्मिक चिंतन और श्रीमद्भागवत कथा के गूढ़ दर्शन की खोज करने वाले लोग ज्ञानवर्धक प्रसंगों से जुड़ते हैं। संक्षेप में, एक ही मंच पर उपलब्ध विस्तृत सामग्री में से व्यक्ति केवल वही चुनता है, जो उसके व्यक्तिगत स्वभाव से मेल खाता हो।
परंपरागत ज्ञान और दर्शक की समझ
अपनी बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने प्राचीन लोकोक्ति 'सार-सार को गहि लहे, थोथा दे उड़ाए' का उल्लेख किया। इस विचार का सार यह है कि विवेकशील व्यक्ति किसी भी परिस्थिति या वक्तव्य में से सारगर्भित और काम की बातें ग्रहण कर लेता है, जबकि निरर्थक बातों को छोड़ देता है। उन्होंने कहा कि यही नियम डिजिटल संसार पर भी पूरी तरह लागू होता है। एक ही वीडियो सामग्री को देखने के बाद अलग-अलग दर्शकों की प्रतिक्रियाएं पूरी तरह भिन्न हो सकती हैं। कोई व्यक्ति उसमें छिपे गहरे जीवन संदेश को समझ लेता है, जबकि दूसरा दर्शक केवल सतही मनोरंजन तक ही सीमित रह जाता है। अतः किसी व्यक्ति की छवि केवल प्रस्तुतकर्ता पर नहीं, बल्कि उसे देखने वाले समाज के दृष्टिकोण पर भी निर्भर करती है।



















