सर्पगंधा एक बेहद उपयोगी और महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है जो मुख्य रूप से जंगलों में पनपता है। हालांकि आजकल यह आसानी से नर्सरी में भी मिल जाता है और इसे ऑनलाइन भी मंगवाया जा सकता है, बशर्ते इसकी सही पहचान की जानकारी हो। इस पौधे के फूल और फल दोनों ही गुच्छों में आते हैं जो देखने में बहुत सुंदर लगते हैं, जिस वजह से यह सजावटी पौधे के रूप में भी घरों की शोभा बढ़ाता है। इस पौधे का नाम सर्पगंधा पड़ने के पीछे मुख्य कारण इसकी जड़ों का सांप के आकार जैसा टेढ़ा-मेढ़ा होना है। इस पौधे की सबसे खास पहचान इसके चमेली जैसे पत्ते और गुच्छों में लगने वाले फूल तथा फल हैं। इस पौधे के औषधीय गुणों, इसके उपयोग और क्या इससे सांप-बिच्छू दूर रहते हैं, इन सभी बातों की पूरी जानकारी आगे दी गई है।
पौधे की बनावट और वैज्ञानिक पहचान
वैज्ञानिक भाषा में सर्पगंधा को राउवोल्फिया सर्पेंटिना कहा जाता है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसे चंद्रभागा और पातालगंधा के नाम से भी पुकारा जाता है। यह एक झाड़ीनुमा पौधा है जो पूरे साल हरा-भरा बना रहता है। इस पौधे की लंबाई 60 से 90 सेंटीमीटर तक होती है और इसकी पत्तियां लंबी, चिकनी तथा गहरे हरे रंग की होती हैं। इसके फूल काफी छोटे होते हैं और इनका रंग सफेद या हल्का गुलाबी होता है। इस पूरे पौधे में इसकी जड़ें सबसे ज्यादा औषधीय महत्व रखती हैं। लोग अपनी छतों या बगीचों में रखे गमलों में भी इस पौधे को बहुत सरलता से उगा सकते हैं।
खेती, बाजार भाव और पैदावार के आंकड़े
नर्सरी में सर्पगंधा का एक पौधा 150 रुपये से लेकर 300 रुपये की कीमत पर मिलता है। रोपाई के ठीक 18 महीने यानी डेढ़ साल बाद इसकी जड़ों को निकालकर सुखाया जाता है और बाजार में बेचा जाता है, क्योंकि डेढ़ साल बाद ही इसकी जड़ें उपयोग के लायक बनती हैं। बाजार में इसकी जड़ें 600 रुपये से 800 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकती हैं। कई किसान व्यावसायिक तौर पर इसकी खेती करते हैं। एक एकड़ खेत में पौधे से पौधे की दूरी 6 से 8 इंच रखते हुए कुल 20 हजार पौधे लगाए जा सकते हैं। इस पौधे की जड़ें बहुत ऊंचे दामों पर बिकती हैं और कई बार इनका भाव 70000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाता है। मध्य प्रदेश की नीमच मंडी में यह पौधे और इसकी जड़ें बहुत बड़े पैमाने पर बिकती हैं। इसकी खेती के लिए एक बीघे जमीन में दो किलो बीज की आवश्यकता होती है।
सर्पगंधा के पौधे को लगाने का सबसे सही समय जून, जुलाई और अगस्त का महीना होता है। यह पौधा मुरम मिट्टी को छोड़कर बाकी सभी प्रकार की मिट्टी में आसानी से पनप जाता है। इसे बहुत अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है और यह पथरीली मिट्टी की फसल के अलावा अन्य जगहों पर टिक जाता है। खाद के रूप में इसे पोटाश और फॉस्फोरस की आवश्यकता होती है। चूंकि यह एक दुर्लभ प्रजाति का पौधा है, इसलिए इसकी अच्छी ग्रोथ के लिए समय-समय पर सड़े हुए गोबर की खाद डालनी चाहिए। हालांकि इस पौधे को बहुत ज्यादा पानी और खाद की आवश्यकता नहीं होती है। इसकी जड़ों को सुखाकर उनका पाउडर तैयार किया जाता है और इसी पाउडर का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्माण में किया जाता है।
प्रमुख औषधीय उपयोग और सावधानियां
सर्पगंधा का मुख्य उपयोग अनिद्रा यानी नींद न आने की बीमारी और हाइपरटेंशन यानी हाई ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर समस्याओं के इलाज में किया जाता है। इसकी जड़ के पाउडर का आधा चम्मच गुनगुने पानी के साथ सेवन किया जाता है। इसके अलावा मिर्गी और मानसिक संतुलन से जुड़ी दवाइयां भी इसकी जड़ों से ही तैयार की जाती हैं। पाचन से जुड़ी परेशानियों और सांप के काटने की स्थिति में भी इसे काफी गुणकारी माना जाता है। यह शरीर को शांत और संतुलित रखने में सहायता करती है। हालांकि गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और छोटे बच्चों को सर्पगंधा का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। सर्पगंधा की जड़ के पाउडर का इस्तेमाल किसी भी परिस्थिति में बहुत अधिक मात्रा में नहीं किया जाना चाहिए और इसका सेवन हमेशा डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए।
त्वचा के रोग, पेट की समस्याएं और सांप से जुड़ा मिथक
सर्पगंधा की जड़ के लेप को खुजली, फोड़े-फुंसियों और घावों पर लगाया जाता है क्योंकि इसमें प्राकृतिक रूप से जीवाणुनाशक गुण पाए जाते हैं। इसके सेवन से पेट के कीड़े, दस्त और पेचिश जैसी समस्याओं में बहुत फायदा मिलता है। यह पाचन क्रिया को नियंत्रित करती है और आंतों को आराम पहुंचाती है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि सर्पगंधा के पौधे की तेज और कड़वी गंध की वजह से सांप इससे दूर भागते हैं, लेकिन इस दावे में कोई सच्चाई नहीं है। असलियत यह है कि जब इस पौधे की पत्तियों को हाथ से मसला या कुचला जाता है, तब इसमें से एक अजीब और तीखी महक आती है। बिना तोड़े पत्तियों में कोई बहुत भारी खुशबू नहीं होती, बल्कि मसलने पर ही इसकी खास गंध महसूस होती है। इसलिए सांप इस पौधे से दूर नहीं भागते हैं और यह केवल एक मिथक है।



















