शीत ऋतु की दस्तक के साथ ही ग्रामीण अंचलों में गन्ने से पारंपरिक गुड़ तैयार करने की हलचल तेज हो जाती है। बाजारों में डिब्बाबंद गुड़ और विविध प्रकार के मिष्ठान बहुतायत में उपलब्ध होने के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सदियों पुरानी पारंपरिक पद्धति से ही शुद्ध गुड़ बनाया जाता है। सुल्तानपुर के किसान जगत नारायण पाठक ने गन्ने की कटाई, रस निष्कर्षण और घंटों तक भट्ठी पर पकाने से जुड़ी पूरी ग्रामीण तकनीक की जानकारी साझा की है।
खेतों से कटाई और कोल्हू में रस निष्कर्षण
गुड़ निर्माण की शुरुआत खेतों में तैयार खड़ी गन्ने की फसल की कटाई से होती है। किसान सबसे पहले गन्ने को काटकर साफ करते हैं और फिर उसे कोल्हू अथवा पेराई मशीन में डालकर रस निकालते हैं। इस निकले हुए गन्ने के रस को साफ कपड़े या छलनी से छानकर लोहे के विशाल कड़ाह में डाला जाता है। रस में मौजूद धूल, मिट्टी और कचरे को अलग करना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि रस जितना साफ और ताजा होगा, बनने वाले गुड़ का प्राकृतिक रंग, स्वाद और गुणवत्ता उतनी ही उत्तम रहेगी।
लोहे के विशाल कड़ाह में घंटों तक धीमी और तेज आंच
छानने के बाद गन्ने के रस से भरे विशाल लोहे के कड़ाह को भट्ठी पर तेज आग के ऊपर चढ़ाया जाता है। जैसे ही रस खौलने लगता है, उसकी सतह पर झाग और प्राकृतिक अशुद्धियां तैरने लगती हैं। इन अशुद्धियों को किसान लगातार करछुल की सहायता से बाहर निकालते रहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कड़ाह में रस को निरंतर चलाना अनिवार्य होता है, ताकि गाढ़ा रस तली में चिपककर जले नहीं या उसका स्वाद खराब न हो।
पानी का वाष्पीकरण और रस का गाढ़ा होना
कड़ाह में कई घंटों तक लगातार पकने के कारण रस में मौजूद पानी भाप बनकर उड़ जाता है और तरल धीरे-धीरे गाढ़ा चाशनी जैसा रूप लेने लगता है। किसान अपने पारंपरिक अनुभव के आधार पर रस के गाढ़ेपन और रंग को देखकर यह निर्णय लेते हैं कि उसे आंच से नीचे उतारने का उपयुक्त समय कब आ गया है। इसके बाद खौलते हुए गाढ़े रस को कड़ाह से निकालकर ठंडा करने के लिए एक अलग साफ बर्तन या समतल जगह पर उलट दिया जाता है।
ठंडा करने की कला और भेली का आकार
उतारे गए गर्म और गाढ़े रस को ठंडा करते समय लगातार चलाया जाता है, जिससे गुड़ की रंगत, दानेदार बनावट और चमक सही तरीके से उभरकर आती है। जब यह मिश्रण हल्का जमने की स्थिति में पहुंचता है, तब किसान इसे आवश्यकता अनुसार विभिन्न रूपों में ढालते हैं। इसे पारंपरिक गोल भेली का आकार दिया जाता है अथवा छोटे-छोटे चौकोर या गोल टुकड़ों में जमाया जाता है।
किसानों का कौशल और आजीविका का मुख्य आधार
देसी गुड़ तैयार करने की यह पूरी प्रक्रिया किसान के अथक परिश्रम, धैर्य और वर्षों के अनुभव पर निर्भर करती है। गन्ने की कटाई से लेकर रस निकालने, कड़ाह में पसीने बहाने और अंत में गुड़ जमाने तक किसान लगातार जुटे रहते हैं। पूरी तरह ठंडा और ठोस हो जाने के बाद यह शुद्ध गुड़ स्थानीय बाजारों में बिक्री के लिए भेजा जाता है। ग्रामीण इलाकों में गन्ने से गुड़ तैयार करने का यह पारंपरिक उद्यम कई किसान परिवारों की रोजी-रोटी और आर्थिक संबल का प्रमुख जरिया बना हुआ है।


















