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निमाड़ का पारंपरिक स्वाद चिकोली: गेहूं के आटे और तुवर दाल से तैयार होता है यह देसी व्यंजनजीवनशैली
19 सित॰ 2026, 11:02 pm (48 मिनट पहले)· 0

निमाड़ का पारंपरिक स्वाद चिकोली: गेहूं के आटे और तुवर दाल से तैयार होता है यह देसी व्यंजन

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर और निमाड़ क्षेत्र में बारिश के दिनों में गेहूं के आटे और तुवर दाल से बनी पारंपरिक चिकोली खूब पसंद की जाती है। सीमित सामग्री में आसानी से बनने वाला यह गरमा-गरम व्यंजन 24 घंटे तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर और समूचे निमाड़ अंचल में जैसे ही आसमान में बादल घिरते हैं और फुहारें गिरने लगती हैं, घरों की रसोइयों से एक खास सोंधी महक उठने लगती है। बारिश के इस भीगे मौसम में यहां के परिवारों में गरमा-गरम और चटपटे पारंपरिक पकवान बनाने की पुरानी परंपरा रही है। इसी समृद्ध खान-पान संस्कृति का एक अहम हिस्सा है चिकोली, जो स्थानीय थाली का एक बेहद लोकप्रिय देसी व्यंजन है। गेहूं के आटे और तुवर की दाल के अनोखे मेल से तैयार होने वाली यह डिश स्वाद के मामले में जितनी लाजवाब है, इसे बनाने की प्रक्रिया भी उतनी ही सरल और सहज है।

कम सामग्री और आसान विधि से होती है तैयार

इस पारंपरिक व्यंजन को बनाने के लिए किसी तरह की दुर्लभ या महंगी सामग्री की आवश्यकता नहीं पड़ती, बल्कि यह आम भारतीय रसोई में मौजूद बुनियादी चीजों से ही बन जाती है। स्थानीय जानकार फूलाबाई के अनुसार, चिकोली तैयार करने की शुरुआत साधारण गेहूं के आटे से होती है। सबसे पहले आटे में थोड़ा सा नमक और जरूरत के हिसाब से पानी मिलाकर उसे अच्छी तरह गूंथ लिया जाता है। इसके बाद उस गूंथे हुए आटे की छोटी-छोटी लोइयां तोड़ी जाती हैं और उन्हें बेलन की मदद से हल्का बेल लिया जाता है। बेली गई इन परतों को छोटे-छोटे टुकड़ों के आकार में काटकर अलग रख दिया जाता है, जो आगे चलकर दाल का मुख्य घटक बनते हैं।

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तुवर की दाल के साथ पककर गाढ़ा होता है स्वाद

आटे के टुकड़े तैयार होने के साथ ही दूसरे चूल्हे पर दाल पकाने की तैयारी शुरू की जाती है। तुवर की दाल को साफ पानी से अच्छी तरह धोकर प्रेशर कुकर में उबलने के लिए चढ़ाया जाता है। जब दाल पूरी तरह से गल जाती है, तब उसमें स्वादानुसार नमक और घर में उपलब्ध रोजमर्रा के मसालों का तड़का या मिश्रण मिलाया जाता है। इसके फौरन बाद, पहले से काटकर रखे गए आटे के इन छोटे टुकड़ों को उबलती हुई दाल के भीतर डाल दिया जाता है। दाल की धीमी आंच पर कुछ देर तक पकाने के बाद ये टुकड़े एकदम मुलायम हो जाते हैं। दाल और पके हुए आटे का यह मेल एक गाढ़े और स्वादिष्ट मिश्रण का रूप ले लेता है, जिससे इसका जायका कई गुना बढ़ जाता है।

बरसात के मौसम में निमाड़ के हर घर की पसंद

ठंडी हवाओं और रिमझिम बारिश के बीच भाप निकलती चिकोली का कटोरा हर उम्र के लोगों को अपनी ओर खींच लेता है। बच्चे हों या बुजुर्ग, बुरहानपुर और आसपास के पूरे निमाड़ी इलाके में मॉनसून के दौरान लगभग हर घर में इसे बड़े चाव से परोसा जाता है। स्थानीय निवासियों के मुताबिक, इस पारंपरिक व्यंजन की एक व्यावहारिक खूबी यह भी है कि यदि इसे सही तरीके से तैयार किया जाए और संभालकर सुरक्षित रखा जाए, तो यह करीब 24 घंटे तक खराब नहीं होता। कम खर्च, बेहद कम सामग्री, बनाने का आसान तरीका और जबरदस्त स्वाद ही वे वजहें हैं जिनके चलते आधुनिक दौर में भी चिकोली निमाड़ की ग्रामीण और कस्बाई रसोइयों में अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए है।

सवाल-जवाब

चिकोली किस क्षेत्र का पारंपरिक व्यंजन है?
चिकोली मध्य प्रदेश के बुरहानपुर और निमाड़ अंचल का एक पारंपरिक और लोकप्रिय व्यंजन है।
चिकोली बनाने के लिए किन मुख्य सामग्रियों का उपयोग होता है?
इसे मुख्य रूप से गेहूं के आटे और तुवर की दाल से तैयार किया जाता है, जिसमें नमक और घरेलू मसाले मिलाए जाते हैं।
चिकोली को मुख्य रूप से किस मौसम में बनाया जाता है?
बरसात के मौसम में जब मौसम ठंडा होता है, तब निमाड़ के घरों में गरमा-गरम चिकोली खास तौर पर बनाई जाती है।
तैयार की गई चिकोली को कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है?
सही तरीके से बनाने और सुरक्षित रखने पर चिकोली लगभग 24 घंटे तक खाने योग्य बनी रह सकती है।
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